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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1833
ऋषिः - अवत्सारः काश्यपः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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स꣣ह꣢ र꣣य्या꣡ नि व꣢꣯र्त꣣स्वा꣢ग्ने꣣ पि꣡न्व꣢स्व꣣ धा꣡र꣢या । वि꣣श्व꣡प्स्न्या꣢ वि꣣श्व꣢त꣣स्प꣡रि꣢ ॥१८३३॥

स्वर सहित पद पाठ

स꣣ह꣢ । र꣣य्या꣢ । नि । व꣣र्तस्व । अ꣡ग्ने꣢꣯ । पि꣡न्व꣢꣯स्व । धा꣡र꣢꣯या । वि꣣श्व꣡प्स्न्या꣢ । वि꣣श्व꣢ । प्स्न्या꣢ । विश्व꣡तः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ ॥१८३३॥


स्वर रहित मन्त्र

सह रय्या नि वर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया । विश्वप्स्न्या विश्वतस्परि ॥१८३३॥


स्वर रहित पद पाठ

सह । रय्या । नि । वर्तस्व । अग्ने । पिन्वस्व । धारया । विश्वप्स्न्या । विश्व । प्स्न्या । विश्वतः । परि ॥१८३३॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1833
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 6; सूक्त » 7; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

घर में लौटने के तीन उपायों का गत मन्त्र में संकेत किया था। चौथे उपाय का प्रतिपादन प्रस्तुत मन्त्र करते हैं (रय्या सह) = धन के साथ (निवर्तस्व) = तू अपने घर लौट आ, परन्तु इसके लिए तू हे (अग्ने) = पथ पर आगे बढ़नेवाले जीव ! (धारया) = धारण करनेवाले धन से (पिन्वस्व) = परिवाहित [overflow] हो। जैसे एक भरे तालाब से पानी प्रवाहित होता रहता है, इसी प्रकार तुझसे भी धन का प्रवाह बहे और वह सबका धारण करनेवाला हो । वह धारा = धारण-प्रक्रिया कैसी हो ? (विश्वतः परि) = चारों ओर (विश्वप्स्न्या) = सबको भोजन देनेवाली है। [प्स=food] । तू पक्षपात व भेदभाव को छोड़कर अपने धन से सबका धारण करनेवाला बन | तेरा धन चन्द्रमा की चाँदनी की भाँति हो । जिस प्रकार चन्द्रमा चाण्डाल के गृह से अपनी ज्योत्स्ना को संकुचित नहीं कर लेता, उसी प्रकार तू भी अपने धन से सभी का धारण करनेवाला बन । ‘इसका धारण करना है, और इसका नहीं' ऐसा भेदभाव वहाँ न हो । चारों ओर सभी से भोगने योग्य तेरा धन हो । जो धन औरों का धारण करता है वह धन भी मनुष्य को प्रभु के समीप ले जानेवाला होता है। दूसरे शब्दों में दान हमारे भवबन्धनों का अवदान [खण्डन] करके हमें प्रभु को प्राप्त कराता है । यही दान तो यज्ञ की चरम सीमा है— इसी के द्वारा देवताओं ने उस यज्ञरूप विष्णु की उपासना की थी। जो व्यक्ति इस प्रकार अपने धन से भूखे को रोटी देता है और प्यासे को पानी पिलाता है तथा रोगी की चिकित्सा करता है वह सचमुच प्रभु के आदेश का पालन करता हुआ सच्चे अर्थों में 'प्रजापति' बनता है। यह प्रजापति ही उस महान् प्रजापित को पाने का अधिकारी होता है ।

भावार्थ -

मेरा धन सभी भूखों को भोजन देनेवाला हो और इस प्रकार मुझे प्रभु का प्रिय बनाये।

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