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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1835
ऋषिः - गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
शि꣡क्षे꣢यमस्मै꣣ दि꣡त्से꣢य꣣ꣳ श꣡ची꣢पते मनी꣣षि꣡णे꣢ । य꣢द꣣हं꣡ गोप꣢꣯तिः꣣ स्या꣢म् ॥१८३५॥
स्वर सहित पद पाठशि꣡क्षे꣢꣯यम् । अ꣣स्मै । दि꣡त्से꣢꣯यम् । श꣡ची꣢꣯पते । श꣡ची꣢꣯ । प꣣ते । मनीषि꣡णे꣢ । यत् । अ꣣ह꣢म् । गो꣡प꣢꣯तिः । गो । प꣣तिः । स्या꣢म् ॥१८३५॥
स्वर रहित मन्त्र
शिक्षेयमस्मै दित्सेयꣳ शचीपते मनीषिणे । यदहं गोपतिः स्याम् ॥१८३५॥
स्वर रहित पद पाठ
शिक्षेयम् । अस्मै । दित्सेयम् । शचीपते । शची । पते । मनीषिणे । यत् । अहम् । गोपतिः । गो । पतिः । स्याम् ॥१८३५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1835
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - मनीषी ही ज्ञान का अधिकारी है
पदार्थ -
उल्लिखित उपालम्भ को दुहराता हुआ ही यह 'गोषूक्ति' कहता है- हे (शचीपते) = [शची=१. वाणी, २. शक्ति] वाणियों के पति, शक्तिशाली प्रभो ! (यत्) = यदि (अहम्) = मैं (गोपतिः) = वेदवाणियों का पति (स्याम्) = होऊँ तो (अस्मै) = इस (मनीषिणे) = मन का शासन करनेवाले बुद्धिमान् के लिए (शिक्षेयम्) = इन वाणियों का अवश्य शिक्षण करूँ [शिक्ष= to teach], (दित्सेयम्) = अवश्य देने की इच्छा करूँ । यह तो है ही नहीं कि आप वेदवाणियों के पति न हों, यह भी नहीं कि आपमें सामर्थ्य न हो । यही हो सकता है कि मेरे मनीषित्व में कुछ कमी हो । वस्तुतः मन का शासन किये बिना ज्ञान की प्राप्ति सम्भव भी तो नहीं, परन्तु हे प्रभो ! मुझे मनीषी बनने की शक्ति भी तो आपको ही देनी है। आपकी कृपा से मैं मनीषी बनूँ, जिससे आप मुझे वेदवाणी देने की इच्छा करें।
भावार्थ -
मनीषी ही ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी है। हम मनीषी=मन के शासक बनें और वेदज्ञान को प्राप्त करें ।
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