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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 20
ऋषिः - वत्सः काण्वः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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आ꣢꣫दित्प्र꣣त्न꣢स्य꣣ रे꣡त꣢सो꣣ ज्यो꣡तिः꣢ पश्यन्ति वास꣣र꣢म् । प꣣रो꣢꣫ यदि꣣ध्य꣡ते꣢ दि꣣वि꣢ ॥२०॥
स्वर सहित पद पाठआ꣢त् । इत् । प्र꣣त्न꣡स्य꣢ । रे꣡त꣢꣯सः । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । प꣣श्यन्ति । वासर꣢म् । प꣣रः꣢ । यत् । इ꣣ध्य꣡ते꣢ । दि꣣वि꣢ ॥२०॥
स्वर रहित मन्त्र
आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि ॥२०॥
स्वर रहित पद पाठ
आत् । इत् । प्रत्नस्य । रेतसः । ज्योतिः । पश्यन्ति । वासरम् । परः । यत् । इध्यते । दिवि ॥२०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 20
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 10
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 2;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 10
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 2;
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विषय - वासर ज्योति का दर्शन
पदार्थ -
(यत् दिवि) = जिस दिन (पर:)= क्लेश, कर्म, विपाकादि से परे होनेवाला वह प्रभु (इध्यते)= दीप्त किया जाता है (आत् इत्)= ठीक उसी समय प्(रत्नस्य रेतस:)= उस सनातन शक्ति की प्रभु की (वासरम्)=बसानेवाली (ज्योतिः)=ज्योति को (पश्यन्ति)= देखते हैं।
गत मन्त्र में ज्ञानपूर्वक कर्म करने का वर्णन था। 'मनुष्य उन कर्मों को अपनी शक्ति से होता हुआ न समझ ले, इसलिए इस मन्त्र में कहा गया है कि सनातन शक्ति तो वह प्रभु ही है। उसी से शक्ति प्राप्त कर जीव भी कर्म किया करता है। 'परन्तु बुरे कर्म भी उसी से हो रहे हैं, यह सोचकर जीव उनके फल से छूट नहीं सकता, क्योंकि वह प्रभु तो 'वासर-ज्योति' है। वह तो निवासक है, न कि ध्वंसक। उस प्रभु ने ‘निर्माणात्मक कार्यों' के करने के लिए ही शक्ति दी है–उजाड़ने के लिए नहीं। वह प्रभु निवासक ज्योति है। यह देखकर जीव भी शक्ति का प्रयोग बसाने में करे, नकि उजाड़ने में, तभी वह प्रभु का प्रिय बनेगा और इस मन्त्र का ऋषि 'वत्स' होगा
भावार्थ -
उस वासर ज्योति का दर्शन कर हम शक्ति का प्रयोग निर्माण के लिए नकि ध्वंस के लिए।
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