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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 208
ऋषिः - सुकक्ष आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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श्रु꣣तं꣡ वो꣢ वृत्र꣣ह꣡न्त꣢मं꣣ प्र꣡ शर्धं꣢꣯ चर्षणी꣣ना꣢म् । आ꣣शि꣢षे꣣ रा꣡ध꣢से म꣣हे꣢ ॥२०८॥

स्वर सहित पद पाठ

श्रु꣣त꣢म् । वः꣣ । वृत्रह꣡न्त꣢मम् । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯मम् । प्र । श꣡र्ध꣢꣯म् । च꣣र्षणीना꣢म् । आ꣣शि꣡षे꣣ । आ꣣ । शि꣡षे꣢꣯ । रा꣡ध꣢꣯से । म꣣हे꣢ ॥२०८॥


स्वर रहित मन्त्र

श्रुतं वो वृत्रहन्तमं प्र शर्धं चर्षणीनाम् । आशिषे राधसे महे ॥२०८॥


स्वर रहित पद पाठ

श्रुतम् । वः । वृत्रहन्तमम् । वृत्र । हन्तमम् । प्र । शर्धम् । चर्षणीनाम् । आशिषे । आ । शिषे । राधसे । महे ॥२०८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 208
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 5
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 10;
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पदार्थ -

मन्त्र का ऋषि ‘सुकक्ष आङ्गिरस' = ज्ञानरूप उत्तम शरण स्थानवाला, वीर्यवान्, रसमय अङ्गोंवाला सुकक्ष कहता है कि १. (आशिषे) = शुभ आशीर्वादों [blesings, benedictions] के लिए २. (राधसे)=[राध्=संसिद्धि] सफलता के लिए और ३. (महे)= महत्त्व की प्राप्ति के लिए (श्रुतम्) = उस प्रभु का सदा श्रवण करो, जोकि (वः) = तुम्हारे (वृत्रहन्तमम्) = ज्ञान को आवृत करनेवाली वासनाओं का विनाश करनेवाला है और (चर्षणीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों का (प्रशर्धम्)=उत्कृष्ट बल है।

मन्त्रार्थ से स्पष्ट है कि मनुष्य के दो कर्त्तव्य हैं १. प्रभु के गुण-स्तवन को सुनना और २. सदा कार्यशील बनकर ‘चर्षणि' नाम को सार्थक करना । यदि मनुष्य प्रभु के गुणों का श्रवण करता है तो प्रभु उसकी वासनाओं को विनष्ट करते हैं और जब मनुष्य श्रमशील होता है तो यह श्रम उसकी शक्ति को बढ़ाता है। श्रम करनेवाले के प्रभु भी सहायक होते हैं और श्रमशीलता वासनाओं से बचने में सहायक होती है।

जब मनुष्य प्रभु का सेवक व श्रमशील बनता है तब उसे सदा शुभ आशीर्वाद प्राप्त होते हैं, वह संसार में कभी असफल नहीं होता अपितु महत्त्व प्राप्त करता है। 'प्रभु स्मरण के साथ कार्यों में लगे रहना' कारण बनता है और आशीर्वाद, साफल्य व महत्त्व उसके कार्य होते हैं।

भावार्थ -

हम उन विरल व्यक्तियों में होने का प्रयत्न करें जो क्रियाशीलता द्वारा सदा प्रभु-स्तवन में लगे हैं।

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