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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 222
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः
देवता - विष्णुः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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इ꣣दं꣢꣫ विष्णु꣣र्वि꣡ च꣢क्रमे त्रे꣣धा꣡ नि द꣢꣯धे प꣣द꣢म् । स꣡मू꣢ढमस्य पाꣳसु꣣ले꣡ ॥२२२॥
स्वर सहित पद पाठइ꣣द꣢म् । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । वि । च꣣क्रमे । त्रेधा꣢ । नि । द꣣धे । पद꣢म् । स꣡मू꣢꣯ढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले꣢ ॥२२२॥
स्वर रहित मन्त्र
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पाꣳसुले ॥२२२॥
स्वर रहित पद पाठ
इदम् । विष्णुः । वि । चक्रमे । त्रेधा । नि । दधे । पदम् । समूढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले ॥२२२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 222
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 11;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 11;
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विषय - कहीं हम केवल कूड़ा तो जमा नहीं कर रहे?
पदार्थ -
इस मन्त्र का ऋषि 'मेधातिथि काण्व' (इदं त्रेधा पदम्) = गत मन्त्र में वर्णित तीन प्रकार से पग (निदधे) = रखता है। ये तीन पग मस्तिष्क में ज्ञानकाण्ड को भरना, भुजाओं में कर्मकाण्ड को भरना और अभिगतजानु होकर हृदय में उपासना की भावना को भरना थे। यदि यह ऐसा न करके केवल ज्ञान को अपना ध्येय बनाता तो इसकी यह उन्नति अधूरी होती । इसी प्रकार केवल कर्म व केवल उपासना को अपनानेवाले व्यक्ति भी अपूर्ण विकासवाले होते हैं। ठीक विकास तो उसी का हुआ जिसने कि शरीर, मन व बुद्धि अथवा कर्म, श्रद्धा व ज्ञान तीनों को अपना ध्येय बनाया । वस्तुतः इसी ने (विचक्रमे) = विशेष पुरुषार्थ किया-व्यापक उन्नति की। इस व्यापक उन्नति को करने के कारण यह (विष्णु:) = [विष्- व्याप्तौ] विष्णु नामवाला हुआ ।
इस संसार में मनुष्य जब केवल ज्ञान को अपनाता है तो वैज्ञानिकों की भाँति ऐसे अस्त्र बनाता है, जो संसार का विनाश कर दें। यह कूड़े के ढेर को ही तो जुटाना है। जो व्यक्ति केवल कर्मकाण्ड का उपासक बन यज्ञों को ही महत्त्व देता है, वह अभिचार यज्ञों को करने में लगता है। ये भी तो यज्ञों का मल ही हैं। केवल श्रद्धा व उपासना के मार्ग पर चलनेवाले व्यक्ति परमेश्वर के नाम पर दूसरे का खून करते हैं। इन्होंने भी प्रेम को न अपनाकर द्वेष को अपनाया, इस प्रकार इनके भी भाग में कूड़े का ही जमा करना रहा । वस्तुतः इस पांसुले = धूल को ही अपनानेवाले लोगों से भरे संसार में (अस्य) = इस व्यापक उन्नति करनेवाले विष्णु ने ही (सम् ऊढम् ) = प्रभु की आज्ञा को सम्यक् शिरोधार्य किया और जीवन यात्रा का ठीक निर्वहण किया । वस्तुतः यही मेधया अतति बुद्धिमत्ता से चला, अतः इसका नाम मेधातिथि है। यही इस मन्त्र का ऋषि है।
भावार्थ -
इस संसार में हम धूल जमा करनेवाले ही न बने रहें ।
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