Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 541
ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
5

अ꣡या꣢ प꣣वा꣡ प꣢वस्वै꣣ना꣡ वसू꣢꣯नि माꣳश्च꣣त्व꣡ इ꣢न्दो꣣ स꣡र꣢सि꣣ प्र꣡ ध꣢न्व । ब्र꣣ध्न꣢श्चि꣣द्य꣢स्य꣣ वा꣢तो꣣ न꣢ जू꣣तिं꣡ पु꣢रु꣣मे꣡धा꣢श्चि꣣त्त꣡क꣢वे꣣ न꣡रं꣢ धात् ॥५४१॥

स्वर सहित पद पाठ

अ꣣या꣢ । प꣣वा꣢ । प꣣वस्व । एना꣢ । व꣡सू꣢꣯नि । माँ꣣श्चत्वे꣢ । इ꣣न्दो । स꣡र꣢꣯सि । प्र । ध꣣न्व । ब्रध्नः꣢ । चि꣣त् । य꣡स्य꣢꣯ । वा꣡तः꣢꣯ । न । जू꣣ति꣢म् । पु꣣रुमे꣡धाः꣢ । पु꣣रु । मे꣡धाः꣢꣯ । चि꣣त् । त꣡क꣢꣯वे । न꣡र꣢꣯म् । धा꣣त् ॥५४१॥


स्वर रहित मन्त्र

अया पवा पवस्वैना वसूनि माꣳश्चत्व इन्दो सरसि प्र धन्व । ब्रध्नश्चिद्यस्य वातो न जूतिं पुरुमेधाश्चित्तकवे नरं धात् ॥५४१॥


स्वर रहित पद पाठ

अया । पवा । पवस्व । एना । वसूनि । माँश्चत्वे । इन्दो । सरसि । प्र । धन्व । ब्रध्नः । चित् । यस्य । वातः । न । जूतिम् । पुरुमेधाः । पुरु । मेधाः । चित् । तकवे । नरम् । धात् ॥५४१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 541
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 5; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 7;
Acknowledgment

पदार्थ -

(अया) = इस (पवा) = पावन क्रिया से (एना वसूनि) = इन वास के साधनभूत शरीर मन व बुद्धि आदि को (पवस्व) = पवित्र कर। गत मन्त्र में 'गोन्योधा' = ज्ञान के प्लावनबाले बनने का उल्लेख है, ‘सह’=परमेश्वर के साथ रहने का संकेत है और 'वरिवः कृण्वन्'=उसकी पूजा करने का वर्णन है। यही वस्तुतः अपने को पवित्र बनाने की प्रक्रिया है। इसी मार्ग पर चलने से मनुष्य इस शरीर की अंगभूत वसुओं को पवित्र बनाए रख सकता है। 'अया पवा' में 'अया' शब्द सर्वनाम होता हुआ गत मन्त्र की पावन - क्रिया का ही संकेत करता है। हमें ज्ञान व भक्ति से अपने को पूर्ण पवित्र बनाने का ध्यान करना है।

प्रभु कहते हैं कि अपने को पवित्र बनाकर हे (इन्दो) = शक्तिशाली जीव! तू (मांश्चत्वे) = कर्म में तथा (सरसि) = [सरं इति वाङ्नाम- नि० १.११.५५] ज्ञान में (प्रधन्व) = प्रकर्षेण गतिवाला हो । निघण्टु में [१.१४.१८] 'मांश्चत्व' का अर्थ 'अश्व' दिया है। यह अश्व कर्म का प्रतीक है। (‘अनध्वाजिनां जरा') = 'न चलना' घोड़ों को बूढ़ा कर देता है। इससे 'अश्व' को कर्म का प्रतीक बनाया गया है। ‘मांश्चत्व' शब्द मन् तथा चर् धातु के मेल से बना है, कर्म सदा मनपूर्वक करने योग्य है, इसलिए भी इसे 'मांश्चत्त्व' कहा गया है। ज्ञानाधि- देवता को 'सरस्वती' कहते हैं, अतः स्पष्ट है कि 'सरस्' नाम ज्ञान का है। मनुष्य के पवित्रता से शक्ति का सम्पादन करके मननपूर्वक कर्म तथा मनुष्य को अपना जीवन ऐसा बनाना है कि (ब्रध्नः चित्) = वह महान् परमात्मा ही (यस्य) = उसका (वातो न) = प्राण की भाँति हो । [He must live in God]। प्रभु को वह अपना जीवन समझे । प्रभु स्वाभाविकी क्रियावाले हैं, क्रिया इसका भी स्वभाव बन जाए। वस्तुतः (पुरुमेधा:) = पालक पूरक बुद्धिवाला मनुष्य (चित्) = निश्चय से (तकवे) = गति के लिए (जूतिम्) = वेग को (न रन्धात्) = कभी पृथक नहीं करता, अर्थात् बड़ी स्फूर्ति के साथ यह सदा कार्यों में लगता है। कार्यों में लगे रहने से इसके जीवन में दो परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं। यह शरीर में रोगों को उत्पन्न नहीं होने देता हुआ ‘आङ्गिरस' बना रहता है और मन में बुरी भावनाओं को कुचलने में समर्थ होकर 'कुत्स' कहलाता है । 

भावार्थ -

मैं सदा मननपूर्वक कार्य करनेवाला बनूँ, ज्ञान में मैं विचरूँ तथा प्रभु ही मेरे
प्राण हों ।

इस भाष्य को एडिट करें
Top