Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 572
ऋषिः - अग्निश्चाक्षुषः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
3

सो꣡मः꣢ पुना꣣न꣢ ऊ꣣र्मि꣢꣫णाव्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति । अ꣡ग्रे꣢ वा꣣चः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥५७२॥

स्वर सहित पद पाठ

सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । अ꣡व्य꣢꣯म् । वा꣡र꣢꣯म् । वि । धा꣣वति । अ꣡ग्रे꣢꣯ । वा꣣चः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡नि꣢꣯क्रदत् ॥५७२॥


स्वर रहित मन्त्र

सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति । अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ॥५७२॥


स्वर रहित पद पाठ

सोमः । पुनानः । ऊर्मिणा । अव्यम् । वारम् । वि । धावति । अग्रे । वाचः । पवमानः । कनिक्रदत् ॥५७२॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 572
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 7
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 10;
Acknowledgment

पदार्थ -

जो व्यक्ति संसार के घटनाचक्र को बारीकी से देखता है वह 'चाक्षुष' है। यह कहीं भी न उलझता हुआ आगे बढ़ता जाता है, 'अग्नि' है। यह (सोमः) = शक्ति का पुञ्ज तथा विनीत (पुनान:) = अपने को निरन्तर पवित्र बनाने के स्वभाववाला (ऊर्मिणा) = अपने हृदय में उत्कर्ष को प्राप्त करने की उमंगों से (अव्यम्) = [अवनं अवः, तत्र साधुः] सर्वोत्तम रक्षणीय ज्ञान की (वारम्) = रुकावट अर्थात् कामादि वासनाओं को (विधावति) = विशेषरूप से शुद्ध कर डालता है-सफाया कर देता है। इन वासनाओं को समाप्त करके ही यह (वाचः अग्रे) = वाणी के - ज्ञान के शिखर पर पहुँचता है। यह (पवमानः) = औरों को भी पवित्र बनाने के हेतु से (कनिक्रदत्) = उन ज्ञानवाणियों का खूब उच्चारण करता है - इस ज्ञान का औरों को भी उपदेश देता है। 

भावार्थ -

स्वयं ज्ञानी बनकर औरों को ज्ञान प्राप्त कराना ही मानव का लक्ष्य होना चाहिए।

इस भाष्य को एडिट करें
Top