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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 607
ऋषिः - गृत्समदः शौनकः देवता - अपांनपात् छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
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स꣢म꣣न्या꣡ यन्त्युप꣢꣯यन्त्य꣣न्याः꣡ स꣢मा꣣न꣢मू꣣र्वं꣢ न꣣꣬द्य꣢꣯स्पृणन्ति । त꣢मू꣣ शु꣢चि꣣ꣳ शु꣡च꣢यो दीदि꣣वा꣡ꣳस꣢म꣣पा꣡न्नपा꣢꣯त꣣मु꣡प꣢ य꣣न्त्या꣡पः꣢ ॥६०७॥

स्वर सहित पद पाठ

स꣢म् । अ꣣न्याः꣢ । अ꣣न् । याः꣢ । य꣡न्ति꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । अन्याः꣢ । अ꣣न् । याः꣢ । स꣣मान꣢म् । स꣣म् । आन꣢म् । ऊ꣣र्व꣢म् । न꣣द्यः꣢꣯ । पृ꣣णन्ति । त꣢म् । उ꣣ । शु꣡चि꣢꣯म् । शु꣡चयः꣢꣯ । दी꣣दिवाँ꣡स꣢म् । अ꣣पा꣢म् । न꣡पा꣢꣯तम् । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । आ꣡पः꣢꣯ ॥६०७॥


स्वर रहित मन्त्र

समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति । तमू शुचिꣳ शुचयो दीदिवाꣳसमपान्नपातमुप यन्त्यापः ॥६०७॥


स्वर रहित पद पाठ

सम् । अन्याः । अन् । याः । यन्ति । उप । यन्ति । अन्याः । अन् । याः । समानम् । सम् । आनम् । ऊर्वम् । नद्यः । पृणन्ति । तम् । उ । शुचिम् । शुचयः । दीदिवाँसम् । अपाम् । नपातम् । उप । यन्ति । आपः ॥६०७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 607
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3;
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पदार्थ -

गत मन्त्र में मानव जीवन के विकास का उल्लेख था। उस विकास के मार्ग पर चलनेवाले मनुष्यों की संख्या विरल होती है। प्रस्तुत मन्त्र में 'अन्या:' शब्द का प्रयोग इसी भावना को द्योतित कर रहा है। (अन्याः) = कोई एक ही (आपः) = [आपो वै नरसूनवः] नर- सन्तान अर्थात् मनुष्य (संयन्ति) = प्रभु के आदेशानुसार मिलकर चलते हैं। ('सं गच्छध्वं सं वदध्वम्') = ऋग्वेद की समाप्ति पर प्रकृति का ज्ञान देने के पश्चात् प्रभु ने आदेश दिया था । 'मिलकर चलेंगे' तभी प्रकृति हमारा हित करेगी, 'फटकर चलेंगे' तो यह प्रकृति हमें फाड़ देगी। प्रकृति में न फँसेंगे तो हमारा परस्पर मेल होगा - तभी हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनेंगे। मन्त्र में आगे कहते हैं कि (अन्या:) = ऐसे विरल पुरुष ही (उपयन्ति) = उस प्रभु के समीप प्राप्त होते हैं। ये इहलोक में प्रभु के समीप रहते हैं- शरीर छोड़ने के बाद उस प्रभु के समीप पहुँच ही जाते हैं। ‘इस जीवन में वे प्रत्येक क्रिया करते हुए उस प्रभु का विस्मरण नहीं करते' यही प्रभु के समीप रहने की भावना है। सोते, खाते, पीते ये सदा उस प्रभु का नाम स्मरण करते हैं। (नद्यः) = सदा प्रभु के गुणों का गान करनेवाले [नद् स्तुतौ] ये उपासक (समानम्) = वृद्धि और क्षय से रहित सदा एकरस (ऊर्वम्) = अत्यन्त विस्तृत उस सर्वव्यापक प्रभु में (स्पृणन्ति) = [स्पृ-to live] निवास करते हैं। (तम्) = उस (शुचिम्) = पवित्र, निर्मल, अपापविद्ध प्रभु को (दीदिवांसम्) = ज्ञान की ज्योति से दीप्त होते हुए प्रभु को, (अपां न पातम्) = कर्मों को कभी न नष्ट होने देनेवाले प्रभु को, स्वाभाविकी ज्ञान, बल व क्रियावाले उस परमात्मा को उ निश्चय से (शुचय:) = पवित्र जीवनोवाले (आपः) = ज्ञान के द्वारा अपने जीवन को व्यापक - विशाल बनानेवाले [आप्-व्याप्तौ] कर्मशील [आप्=कर्म] व्यक्ति ही (उपयन्ति) = समीपता से प्राप्त होते हैं। 

ज्ञान से मनुष्य का दृष्टिकोण विशाल बनता है। इस समय इसके कर्म स्वार्थ की संकुचित दृष्टि से न किये जाकर सर्वभूतहित की दृष्टि से किये जाते हैं, अतः व्यापकता को लिये हुए होते हैं। ये व्यापक कर्म ही इसे प्रभु का सच्चा भक्त बनाते हैं। प्रकृति में विचरते हुए भी ये प्रकृति में नहीं उलझते, परिणामतः प्रकृति से सदा ऊपर उठे रहते हैं और उस प्रभु में जीवन-यापन करते हैं। यही जीवन्मुक्ति कहलाती है - यही सदेह होते हुए भी विदेह होना होता है। शरीर छोड़ने के पश्चात् ('सह ब्रह्मणा विपश्चिता') = ये उस ज्ञानी ब्रह्म के साथ विचरते हैं।

यह प्रभु का सच्चा स्तोता होने से 'गृत्स' कहलाता है - मनः प्रसाद को अनुभव करता हुआ यह 'मद' होता है और गतिशील कर्मनिष्ठ होने से यह 'शौनक' है। 

भावार्थ -

हम भी उन विरल व्यक्तियों में गिने जाएँ जो मिलकर चलते हैं, प्रभु के उपासक हैं, प्रभु में निवास करते हैं और अपने जीवन को पवित्र, ज्ञान से दीप्त व कर्मनिष्ठ बनाते हैं।

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