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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 608
ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - रात्रिः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
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आ꣡ प्रागा꣢꣯द्भ꣣द्रा꣡ यु꣢व꣣ति꣡रह्नः꣢꣯ के꣣तू꣡न्त्समी꣢꣯र्त्सति । अ꣡भू꣢द्भ꣣द्रा꣡ नि꣣वे꣡श꣢नी꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ ज꣡ग꣢तो꣣ रा꣡त्री꣢ ॥६०८

स्वर सहित पद पाठ

आ꣢ । प्र । आ । अ꣣गात् । भद्रा꣢ । यु꣣वतिः । अ꣡ह्नः꣢꣯ । अ । ह्नः꣣ । केतू꣢न् । सम् । ई꣣र्त्सति । अ꣡भू꣢꣯त् । भ꣣द्रा꣢ । नि꣣वे꣡श꣢नी । नि꣣ । वे꣡श꣢꣯नी । वि꣡श्व꣢꣯स्य । ज꣡ग꣢꣯तः । रा꣡त्री꣢꣯ ॥६०८॥


स्वर रहित मन्त्र

आ प्रागाद्भद्रा युवतिरह्नः केतून्त्समीर्त्सति । अभूद्भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री ॥६०८


स्वर रहित पद पाठ

आ । प्र । आ । अगात् । भद्रा । युवतिः । अह्नः । अ । ह्नः । केतून् । सम् । ईर्त्सति । अभूत् । भद्रा । निवेशनी । नि । वेशनी । विश्वस्य । जगतः । रात्री ॥६०८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 608
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 3; मन्त्र » 7
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3;
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पदार्थ -

प्रस्तुत मन्त्र में वामदेव गोतम प्रार्थना करता है कि (आ) = सब प्रकार से (प्र) = खूब (आगात्) = आये। कौन? (रात्री) = रात। कैसी रात? जो १. (भद्रा) = भद्र है २. (युवति:) = युवति है, ३. (अह्वः) = अहन् के (केतून्) = ज्ञानों को, विचारों को (समीर्त्सति) = दबा देती है [ stored up, shelved कर देती है ] - दाखिल दफ्तर कर देती है। ४. जो (विश्वस्य जगतः) = सारे जगत् को (निवेशनी) = निवेश देनेवाली है – जिसमें मैं ही मैं रह जाऊँ ऐसी भावना नहीं है।

इस ‘रात्रि’ का स्वरूप क्या है? इस विषय में ('रात्रिर्वै संयच्छन्दः') = [यजु: ० १५.५] यह वाक्य बड़ा महत्त्वपूर्ण है- 'संयम की इच्छा [छन्द] ' ही यह 'रात्री' है। ('वारुणि रात्रि:') = इस ब्राह्मणग्रन्थ के वाक्य का भी अभिप्रय यही है । वरुण 'पाशी' हैं - जो मनुष्य अपने को पाशों में—व्रतों के बन्धनों में जकड़ता है वह इस रात्री को अपनाता है। शत० ९.२.३.३० में कहते हैं कि ‘रात्रिर्वै कृष्णा शुक्लवत्सा तस्या असौ आदित्यो वत्सः'–कृष्णा=इन्द्रियों को विषयों से वापस आकृष्ट करनेवाली संयमवृत्ति ही रात्रि है, यह सफेद वत्स - पुत्रवाली है, 'आदित्य' ही इसका पुत्र है। इस संयमवृत्ति को अपनाने से मनुष्य उस आदित्यवर्ण प्रभु को देख पाता है। इस कारण ही [‘राथन्तरी वै रात्रि: ' ऐ० ५.३०] रात्रि को राथन्तरी = शरीररूप रथ को उत्तम बनानेवाली कहा गया है।

(भद्राः) = यह रात्रि सचमुच (भद्रा) = अभद्र मनुष्य का कल्याण करनेवाली है। शतपथ [१३. १.४.३] में इसे 'क्षेमो रात्रि' शब्दों में कल्याणकर प्रतिपादित किया है। यह प्रतिदिन आनेवाली रात्रि भी मनुष्य का कल्याण करती है। रोगी अपनी पीड़ा को भूल जाता है । वस्तुत: सब विकल्पों से मुक्त कर रात्रि मनुष्य का कल्याण करती ही है। प्रस्तुत 'संयम' रूप रात्रि भी इसी प्रकार मनुष्य का कल्याण करनेवाली है।

(युवतिः–) यह संयमरूप रात्रि युवति है। [यु मिश्रण, अमिश्रण] - नाना प्रकार की ईर्ष्या, द्वेष की भावनाओं से यह हमें पृथक् कर देती है। संयमी पुरुष के जीवन में 'भेदवृत्ति' समाप्त हो जाती है ।

(अहन्) =‘अहन्’ शब्द दिन का वाचक है। यहाँ यह बड़ी कठिनता से नष्ट [हन्] करने योग्य अहंकार का वाचक है। पुत्रैषणा और वित्तैषणा को जीत लेना आसान है पर लोकैषणा को जीतना सुगम नहीं। अहंभाव Last infirmity of the noble mind है- बड़े-बड़े व्यक्तियों में भी यह निर्बलता उपलभ्य है। वेद में इसे 'नमूचि' नाम दिया है- पीछा न छोड़नेवाला।

संयम की रात्रि इस अभिमान के विचारों को दबा डालती है। सोमो रात्रिः [श. ३.४.४.१५] इन शब्दों में याज्ञवल्क्य इस रात्रि को विनीत बतला रहे हैं। जैसे प्रस्तुत रात्रि में मनुष्य को अपने धनादि का अभिमान नहीं रहता, उसी प्रकार इस संयम की रात्रि में भी वह इस अभिमान से ऊपर उठ आता है।

(विश्वस्यः) - इस संयम-रात्रि में मनुष्य केवल अपने आनन्द का ध्यान कभी नहीं करता । यह सभी के आनन्द में आनन्द का अनुभव करता है। संयम की रात्रि में भी मैं केवल अपने सुख का ध्यान नहीं करता। संयम की रात्रि 'उपरमयति ध्रुवी करोति' [निरुक्त] मुझे शान्त बनाती है, मैं डाँवाडोल नहीं रहता। भोगों की इच्छा से आन्दोलित न होने से मैं सभी के सुख में सुखी होता हूँ।

इस प्रकार यह रात्रि मुझे उत्तम गुणोंवाला बनाकर 'वामदेव' बनाती है - इसके द्वारा मैं प्रशस्तेन्द्रिय ‘गोतम' बनता हूँ।

भावार्थ -

मैं संयम की रात्रि द्वारा कल्याण प्राप्त करूँ, औरों से एकत्व अनुभव करूँ, अहंकार की वृत्ति को दबा दूँ तथा सभी के सुख में सुख अनुभव करूँ।

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