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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 630
ऋषिः - सार्पराज्ञी
देवता - सूर्यः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
6
आ꣡यं गौः पृश्नि꣢꣯रक्रमी꣣द꣡स꣢दन्मा꣣त꣡रं꣢ पु꣣रः꣢ । पि꣣त꣡रं꣢ च प्र꣣य꣡न्त्स्वः꣢ ॥६३०॥
स्वर सहित पद पाठआ꣢ । अ꣣य꣢म् । गौः । पृ꣡श्निः꣢꣯ । अ꣣क्रमीत् । अ꣡स꣢꣯दत् । मा꣣त꣡र꣢म् । पु꣣रः꣢ । पि꣣त꣡र꣢म् । च꣣ । प्रय꣢न् । प्र꣣ । य꣢न् । स्व३रि꣡ति꣢ ॥६३०॥
स्वर रहित मन्त्र
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः । पितरं च प्रयन्त्स्वः ॥६३०॥
स्वर रहित पद पाठ
आ । अयम् । गौः । पृश्निः । अक्रमीत् । असदत् । मातरम् । पुरः । पितरम् । च । प्रयन् । प्र । यन् । स्व३रिति ॥६३०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 630
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 5; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5;
Acknowledgment
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 5; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5;
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विषय - जिज्ञासु
पदार्थ -
(अयम्) = यह (गौः) = [गच्छति इति] पुरुषार्थशील - आलस्य से सदा दूर रहनेवाला (पृश्नि:) = [प्रच्छ ज्ञीप्सायम्] ज्ञानप्राप्ति की प्रबल इच्छावाला (आ) = समन्तात् (अक्रमीत्) = क्रमण करता है। वेद में पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने के कारण जीव को 'पञ्चौदनः' कहा है। यह पञ्चौदन ‘पञ्चधा विक्रमताम्' 'पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से पुरुषार्थ करे' ऐसा वेद का आदेश है। यह पृश्नि- जिज्ञासु ऐसा ही करता है। ज्ञान 'परिप्रश्नेन' = नानाविध प्रश्नों [allround questioning] के करने से ही प्राप्त होता है। यह पृश्नि (पुरः) = सर्वप्रथम (मातरम्) = वेदमाता को [स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्] (असदत्) = प्राप्त करता है उसे समझने का प्रयत्न करता है। (च) = और इस वेदज्ञान के मार्ग से (पितरम्) = उस रक्षक प्रभु को (प्रयन्) = प्रकर्षेण प्राप्त होता है, जो प्रभु (स्वः) = स्वयं प्रकाशमान हैं।
प्रभु की प्राप्ति की कामनावाले को निम्न बातें करनी चाहिएँ
१. (गौः) = वह गतिशील हो, ‘पौरुषं नृषु' मनुष्यों में पौरुष ही प्रभु का रूप है।
२. (पृश्नि:) = उसके अन्दर प्रबल जिज्ञासा हो । जिज्ञासु भक्त ही अन्त में ज्ञानी भक्त बनता है।
३. (आ अक्रमीत्) = यह सब ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञानप्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करे। इस ज्ञान से इसे कण-कण में प्रभु की महिमा के दर्शन होंगे।
४. (असदत् मातरं पुरः) = यह सर्वप्रथम वेदमाता को अपनाये, क्योंकि 'सर्वे वेदाः यत्पदमामनन्ति'=सारे वेद उस प्रभु का प्रतिपादन करते हैं। यह वेदवाणी माता की भाँति कल्याणी है-हमारे जीवन का निर्माण करके ज्ञान को बढ़ाकर हमें प्रभुदर्शन कराती है। ऐसा करने पर हमें उस प्रभु का दर्शन होता है - वह ज्योतिर्मय रूप में हमारे हृदयों में प्रकट होता है। हमें पग-पग पर उस प्रभु के रक्षण-विधानों का आभास मिलता है और हम उसे 'पिता' के रूप में देखते हैं।
प्रस्तुत मन्त्र का देवता 'आत्मा' है। इस आत्मा का दर्शन उसी को होता है जो अपने जीवन को 'सार्प'= गतिशील बनाता है और 'राज्ञी' इस गतिशीलता से अपने जीवन को दीप्त बनाता है। एवं, ऋषि का नाम ‘सार्पराज्ञी' हो गया है।
भावार्थ -
जिज्ञासु को ही प्रभु का ज्ञान होता है।
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