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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 706
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
2
य꣢त्र꣣꣬ क्व꣢꣯ च ते꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्षं꣢ दधस꣣ उ꣡त्त꣢रम् । त꣢त्र꣣ यो꣡निं꣢ कृणवसे ॥७०६॥
स्वर सहित पद पाठय꣡त्र꣢꣯ । क्व꣢ । च꣣ । ते । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । द꣣धसे । उ꣡त्त꣢꣯रम् । त꣡त्र꣢꣯ । यो꣡नि꣢꣯म् । कृ꣣णवसे ॥७०६॥
स्वर रहित मन्त्र
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम् । तत्र योनिं कृणवसे ॥७०६॥
स्वर रहित पद पाठ
यत्र । क्व । च । ते । मनः । दक्षम् । दधसे । उत्तरम् । तत्र । योनिम् । कृणवसे ॥७०६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 706
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - जो अन्त मता, सो गता
पदार्थ -
प्रभु जीव से कहते हैं कि (यत्र क्व च) = जहाँ कहीं भी (ते मन:) = तेरा मन होता है, अर्थात् जो भी भावना तेरे अन्दर प्रयाणकाल में प्रबल होती है (तत्र) = वहाँ ही, उसके अनुसार ही तू (योनिम्) = अपने जन्म-स्थान को (कृणवसे) = करता है – बनता है । यह एक सामान्य सिद्धान्त है कि मनुष्य अपने इस जीवन में जिन भी भावनाओं से भरा रहता है, अन्त में उसी का उसे स्मरण होता है और तदनुसार ही वह अगला जीवन प्राप्त करता है । अन्त में प्रभु का स्मरण करता है, तो प्रभु को पाता है । अन्त में प्रभु का ही स्मरण हो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन को सदा प्रभु की भावना से ओत-प्रोत करें। एवं, प्रभु कहते हैं 'जहाँ भी तेरा मन होता है, वहीं तू जन्म पाता है और उस उस जीवन में उन्नति के लिए उत्तरम् (दक्षम् दधसे) = उत्कृष्ट बल को धारण करता है।'' दक्षम्' उस बल व शक्ति को कहते हैं जो वृद्धि व उन्नति का कारण होता है ।
हमें अपनी भावना के अनुसार ही योनि व शक्ति प्राप्त होती है, अतः हम अपने जीवन को सदा उत्कृष्ट भावनाओं से भरें, जिससे अन्त में उसी भावना से ओत-प्रोत हुए हुए यहाँ से जाएँ और उत्कृष्ट जन्म का लाभ करें ।
भावार्थ -
हम प्रणव का जप करते हुए प्राणों को छोड़ने की तैयारी करें, जिससे इस जन्म के अन्त में प्रभु की गोद में पहुँच सकें।
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