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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 734
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
इ꣣द꣡म् व꣢सो सु꣣त꣢꣫मन्धः꣣ पि꣢बा꣣ सु꣡पू꣢र्णमु꣣द꣡र꣢म् । अ꣡ना꣢भयिन्ररि꣣मा꣡ ते꣢ ॥७३४॥
स्वर सहित पद पाठइ꣣द꣢म् । वसो । सुत꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ । सु꣡पू꣢꣯र्णम् । सु । पू꣣र्णम् । उद꣡र꣢म् । उ꣣ । द꣡र꣢꣯म् । अ꣡ना꣢꣯भयिन् । अन् । आ꣣भयिन् । ररिम꣢ । ते꣣ ॥७३४॥
स्वर रहित मन्त्र
इदम् वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन्ररिमा ते ॥७३४॥
स्वर रहित पद पाठ
इदम् । वसो । सुतम् । अन्धः । पिब । सुपूर्णम् । सु । पूर्णम् । उदरम् । उ । दरम् । अनाभयिन् । अन् । आभयिन् । ररिम । ते ॥७३४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 734
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 2; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 2; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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विषय - प्रभु का उपहार
पदार्थ -
प्रियमेध ऋषि से प्रभु कहते हैं कि हे (वसो) = उत्तम निवास करने के लिए प्रयत्नशील जीव ! (इदम्) = यह (अन्धः) = आध्यायनीय – सर्वथा ध्यान देने योग्य वीर्य-शक्ति [सोम] (सुतम्) = मैंने तुझमें पैदा कर दी है। (पिब) = तू इसका पान कर, इसे अपने अन्दर ही व्याप्त करने के लिए प्रयत्न कर। पी हुई यह शक्ति (सुपूर्णम्) = उत्तम प्रकार से तेरा पालन व पूरण करनेवाली होगी । तेरे शरीर पर रोगों का आक्रमण न होगा, मन में ईर्ष्या-द्वेष उत्पन्न न होंगे तथा बुद्धि में कुण्ठता न आएगी । तेरा पूरण तो करेगी ही (उत) = और (अरम्) = वह तेरे जीवन को अलंकृत कर देगी । वीर्य शरीर को शक्ति सम्पन्न करता है, मन को निर्मल व बुद्धि को तीव्र । एवं, यह शरीर, मन व बुद्धि तीनों को ही शोभान्वित करता है। इसके अतिरिक्त इस वीर्य-रक्षा का सबसे महान् लाभ तो यह है कि मनुष्य निर्भीक बनता है। प्रभु कहते हैं कि (अनाभयिन्) = हे निर्भीक प्रियमेध! ते (ररिम) = तुझे हम सर्वोत्तम भेंट प्राप्त कराते हैं। प्रभु की जीव के प्रति अनन्त देनों में यह सर्वोत्तम देन है। इसी पर अन्य सारी उन्नति निर्भर है
भावार्थ -
सुरक्षित वीर्य हमारा पालन व पूरण करता है, यह हमारे जीवन को अलंकृत करता | है और हमें निर्भीक बनाता है ।