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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 951
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
3
इ꣡न्द्रा꣢य नू꣣न꣡म꣢र्चतो꣣क्था꣡नि꣢ च ब्रवीतन । सु꣣ता꣡ अ꣢मत्सु꣣रि꣡न्द꣢वो꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ नमस्यता꣣ स꣡हः꣢ ॥९५१॥
स्वर सहित पद पाठइ꣡न्द्रा꣢꣯य । नू꣣न꣢म् । अ꣣र्चत । उक्था꣡नि꣢ । च꣣ । ब्रवीतन । ब्रवीत । न । सुताः꣡ । अ꣡मत्सुः । इ꣡न्द꣢꣯वः । ज्ये꣡ष्ठ꣢꣯म् । न꣣मस्यत । स꣡हः꣢꣯ ॥९५१॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन । सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः ॥९५१॥
स्वर रहित पद पाठ
इन्द्राय । नूनम् । अर्चत । उक्थानि । च । ब्रवीतन । ब्रवीत । न । सुताः । अमत्सुः । इन्दवः । ज्येष्ठम् । नमस्यत । सहः ॥९५१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 951
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
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विषय - ज्येष्ठ-सहः
पदार्थ -
१. (इन्द्राय) = परमैश्वर्य-सम्पन्न प्रभु के लिए (नूनम्) = निश्चय से (अर्चत) = अर्चना करो। २. (च) = और उस प्रभु के लिए ही (उक्थानि) = स्तोत्रों का (ब्रवीतन) = उच्चारण करो । वेदमन्त्रों के द्वारा प्रभु का गुणगान करो। ३. (सुताः) = उत्पन्न हुए-हुए (इन्दवः) = सोमकण तुम्हें (अमत्सुः) = आनन्दित करें । इन्हीं की रक्षा होने पर हमारा प्रभु की ओर झुकाव होता है और हम ज्ञान-प्राप्ति में प्रवृत्त होते हैं। ४. तुम उस (ज्येष्ठं सहः) = सर्वश्रेष्ठ बल के लिए (नमस्यत) = नमस्कार करो ।
भावार्थ -
प्रभु-पूजा हमें 'इन्द्र' बनाती है । स्तोत्रों का उच्चारण हमें ज्ञानैश्वर्य प्राप्त कराता है । सोमकण जीवन में उल्लास का कारण बनते हैं और इनकी रक्षा से उत्तम शक्ति प्राप्त होती है ।
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