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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 987
ऋषिः - उरुचक्रिरात्रेयः देवता - मित्रावरुणौ छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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पा꣣तं꣡ नो꣢ मित्रा पा꣣यु꣡भि꣢रु꣣त꣡ त्रा꣢येथाꣳ सुत्रा꣣त्रा꣢ । सा꣣ह्या꣢म꣣ द꣡स्यू꣢न् त꣣नू꣡भिः꣢ ॥९८७॥

स्वर सहित पद पाठ

पात꣢म् । नः꣣ । मित्रा । मि । त्रा । पायु꣡भिः꣢ । उ꣣त꣢ । त्रा꣣येथाम् । सु꣣त्रात्रा꣢ । सु꣣ । त्रात्रा꣢ । सा꣣ह्या꣡म꣢ । द꣡स्यू꣢꣯न् । त꣣नू꣡भिः꣢ ॥९८७॥


स्वर रहित मन्त्र

पातं नो मित्रा पायुभिरुत त्रायेथाꣳ सुत्रात्रा । साह्याम दस्यून् तनूभिः ॥९८७॥


स्वर रहित पद पाठ

पातम् । नः । मित्रा । मि । त्रा । पायुभिः । उत । त्रायेथाम् । सुत्रात्रा । सु । त्रात्रा । साह्याम । दस्यून् । तनूभिः ॥९८७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 987
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

प्रस्तुत मन्त्र में ‘मित्रावरुणा' को 'मित्रा' शब्द से ही कह दिया है, क्योंकि अपान भी अन्ततः प्राण का ही एक रूप है। शरीर में प्राण ही विविध रूपों में कार्य करता हुआ भिन्न-भिन्न नामोंवाला होता है। १. हे (मित्रा) = प्राणापानो ! (नः) = हमें (पायुभिः) = अपने रक्षणों से (पातम्) = सुरक्षित करो । २. (उत) = और हे (सुत्रात्रा) = उत्तमता से रोगों से त्राण करनेवाले प्राणापानो ! हमें (त्रायेथाम्) = आप सब रोगों से बचाओ। ३. आपकी कृपा से हम (तनूभिः) = अपने शरीरों से- शरीरों के रक्षणों के उद्देश्य से (दस्यून्) = काम- क्रोधादि नाशक वृत्तियों को (साह्याम) = पूर्णरूप से पराभूत करें । काम-क्रोधादि को जीतकर ही हम अपने स्थूलशरीर को रोगों से और सूक्ष्मशरीर को कुविचारों से बचा पाते हैं । प्राणापान की साधना से हम नीरोगता प्राप्त करके तथा शक्ति व प्रकाश से युक्त होकर जीवन

में प्राणापान की ही भाँति निरन्तर कार्य करनेवाले 'उरुचक्रि' बनते हैं और राग, द्वेषादि मल तथा बुद्धि की कुण्ठतारूप तीनों दोषों से दूर होकर 'आत्रेय' होते हैं । एवं, प्राणापान की कृपा से हम 'उरुचक्रि आत्रेय' बन पाते हैं ।

भावार्थ -

प्राणापान की साधना हमें 'काम, क्रोध, लोभ' से ऊपर उठाकर 'अ-त्रि' बनने के योग्य करे ।

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