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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 99
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - अग्निः
छन्दः - उष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
3
अ꣢ग्ने꣣ वा꣡ज꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शा꣢नः सहसो यहो । अ꣣स्मे꣡ दे꣢हि जातवेदो꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥९९॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡ग्ने꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । ई꣡शा꣢꣯नः । स꣣हसः । यहो । अस्मे꣡इ꣢ति । दे꣣हि । जातवेदः । जात । वेदः । म꣡हि꣢꣯ । श्र꣡वः꣢꣯ ॥९९॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो । अस्मे देहि जातवेदो महि श्रवः ॥९९॥
स्वर रहित पद पाठ
अग्ने । वाजस्य । गोमतः । ईशानः । सहसः । यहो । अस्मेइति । देहि । जातवेदः । जात । वेदः । महि । श्रवः ॥९९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 99
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 11;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 11;
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विषय - प्रार्थना - त्रयी
पदार्थ -
हे (अग्ने)-आगे ले-चलनेवाले प्रभो! आप (गोमतः) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले [प्रशंसायां मतुप्] (वाजस्य)=बल को (अस्मे) = हमें (देहि) = दीजिए | आप (ईशानः) = स्वामी हैं। इन शब्दों में यह पहली प्रार्थना है कि हम शक्तिशाली हों और शक्तिशाली होकर इन्द्रियों को वश में रखते हुए उन्हें निर्मल बनाये रक्खें। शक्ति ही न हो और शक्ति के अभाव में इन्द्रियाँ शान्त बनी रहें यह वैदिक आदर्श नहीं। इसके लिए जहाँ सौम्य भोजन व सौम्य व्यायाम [भ्रमण, तैरना, आसन आदि] उपयोगी हैं, वहाँ 'अग्ने' और 'ईशान:' शब्द भी आवश्यक संकेत कर रहे हैं कि हमारे सामने आगे बढ़ने का लक्ष्य हो, साथ ही हम ध्यान रक्खें कि हमें 'ईशान' बनना है न कि दास । हमारा सदा यही जप हो कि 'आगे बढ़ना है, ईशान बनना है।' यह जप हमें धर्म के मार्ग पर चलने में सहायक होगा हमारी शक्ति हमें असंयमी न बनने देगी।
२. ('यहो') = हे महान् प्रभो! (अस्मे) हमें (सहसः) = सहनशक्ति (देहि) = दीजिए | हममें सहिष्णुता हो। छोटी-छोटी बातों से हम क्षुब्ध न हो जाएँ। सहिष्णुता होने पर प्रायः सब सामाजिक व पारिवारिक झगड़ों का अन्त हो जाता है।
'यहो' शब्द हमें संकेत दे रहा है कि हम महान् बनें। महान् बनने पर हममें सहनशक्ति जागेगी।
३. हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो! (अस्मे)=हमें (महि)= प्रशंसनीय (श्रवः) = उत्तम ज्ञान (देहि) = प्राप्त कराइए। हमारा कोई भी कर्म निन्दनीय न हो । वस्तुतः ज्यों-ज्यों हम अपना ज्ञान बढ़ाएँगे त्यों-त्यों हमारे कर्म प्रशस्त होते जाएँगे । ('न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते') =ज्ञान के समान पवित्र करनेवाली अन्य कोई वस्तु नहीं है।
इस प्रकार अपनी इन्द्रियों को पवित्र बनानेवाला व्यक्ति इस मन्त्र का ऋषि ‘गोतम' कहलाता है। यह भोगों, क्रोध और निन्द्य कर्मों को छोड़ता है। इस प्रकार छोड़नेवालों में श्रेष्ठ स्थान में गिना जाकर यह 'राहूगण' कहलाता है।
भावार्थ -
हम भोगों तथा असहिष्णुता को छोड़ें और निन्द्य कर्मों का भी त्याग करें।
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