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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 160 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 160/ मन्त्र 3
    ऋषिः - पूरणो वैश्वामित्रः देवता - इन्द्र: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    य उ॑श॒ता मन॑सा॒ सोम॑मस्मै सर्वहृ॒दा दे॒वका॑मः सु॒नोति॑ । न गा इन्द्र॒स्तस्य॒ परा॑ ददाति प्रश॒स्तमिच्चारु॑मस्मै कृणोति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । उ॒श॒ता । मन॑सा । सोम॑म् । अ॒स्मै॒ । स॒र्व॒ऽहृ॒दा । दे॒वऽका॑मः । सु॒नोति॑ । न । गाः । इन्द्रः॑ । तस्य॑ । परा॑ । द॒दा॒ति॒ । प्र॒ऽश॒स्तम् । इत् । चारु॑म् । अ॒स्मै॒ । कृ॒णो॒ति॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य उशता मनसा सोममस्मै सर्वहृदा देवकामः सुनोति । न गा इन्द्रस्तस्य परा ददाति प्रशस्तमिच्चारुमस्मै कृणोति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः । उशता । मनसा । सोमम् । अस्मै । सर्वऽहृदा । देवऽकामः । सुनोति । न । गाः । इन्द्रः । तस्य । परा । ददाति । प्रऽशस्तम् । इत् । चारुम् । अस्मै । कृणोति ॥ १०.१६०.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 160; मन्त्र » 3
    अष्टक » 8; अध्याय » 8; वर्ग » 18; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (यः) जो पुरोहित (उशता) कामना करते हुए (सर्वहृदा) सम्पूर्ण हृद्भाववाले (मनसा) मन से (अस्मै) इस राजा के लिए (देवकामः) अपने देवभूत राजा की कामना को पूरा करता हुआ (सोमं सुनोति) सोतव्य अर्थात् सम्यग् उन्नत करने योग्य राष्ट्र को सम्यग् उन्नत करता है (तस्य गाः) उस पुरोहित की वाणियों को आदेशवचनों को (न परा ददाति) नहीं त्यागता है, अपि तु (अस्मै) इस पुरोहित के लिए (प्रशस्तं चारुम्-इत्) प्रशस्त सेवन करने योग्य सुखकर भेंट को अवश्य (कृणोति) समर्पित करता है ॥३॥

    भावार्थ

    जो पुरोहित राजा की कामना करनेवाला उसके राष्ट्र को समुन्नत करने का उपदेश देता है, राजा को चाहिए कि उसके उपदेश का पालन करे-उल्ल्ङ्घन न करे अपितु उसके लिए अच्छी भेंट समर्पित करे ॥३॥

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    विषय

    प्रशस्त व सुन्दर जीवन

    पदार्थ

    [१] (यः) = जो (उशता मनसा) = कामयमान मन से, चाहते हुए मन से (सर्वहृदा) = पूरे दिल से (देवकामः) = उस महान् देव प्रभु की कामनावाला होता हुआ, (अस्मै) = इस प्रभु की प्राप्ति के लिये (सोमं सुनोति) = सोम को अपने में उत्पन्न करता है । (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (तस्य) = उसकी (गाः) = इन्द्रियरूप गौवों को (न पराददाति) = कभी उससे दूर नहीं कर देता, उन्हें विषयों का शिकार नहीं होने देता। एवं सोमरक्षण का प्रथम परिणाम यही होता है कि मनुष्य प्रभु-प्रवण बनता है, उसकी इन्द्रियाँ विषयों से व्यावृत्त रहकर ठीक बनी रहती हैं । [२] इस प्रकार वे प्रभु (अस्मै) = इस सोमरक्षण करनेवाले के लिये (इत्) = निश्चय से (प्रशस्तम्) = प्रशंसनीय व (चारुम्) = सुन्दर जीवन को (कृणोति) = करते हैं । इसका जीवन प्रशस्त व सुन्दर बनता है। 'प्रभु की ओर झुकाव हो, इन्द्रियाँ सशक्त हों' बस यही प्रशस्त व सुन्दर जीवन है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोमरक्षण से हमारी इन्द्रियाँ सशक्त रहेंगी और हमारा जीवन प्रशस्त व सुन्दर बनेगा ।

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    विषय

    समर्थ होकर दानशील पर प्रभु की कृपा।

    भावार्थ

    (यः) जो (देव-कामः) दाता प्रभु य की इच्छा करने वाला (अस्मै) इसके लिये (सर्व-हृदा) पूर्ण हृदय से (उशता मनसा) कामनायुक्त चित्त से (सोमं सुनोति) ऐश्वर्य उत्पन्न करता है, (इन्द्रः तस्य गाः) वह ऐश्वर्यवान् उसके वाणियों वा भूमियों को (न परा ददाति) नहीं टालता, नहीं नष्ट करता, और (अस्यै प्रशस्तम् इत् चारु कृणोति) उस प्रजाजन के लिये प्रशंसनीय सुन्दर मार्ग, वा धन उत्पन्न करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः पूरणो वैश्वामित्रः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः- १, ३ त्रिष्टुप्। २ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ४, ५ विराट् त्रिष्टुप्॥ पञ्चर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (यः) यः पुरोहितः (उशता सर्वहृदा-मनसा) कामयमानेन सर्वहृद्भावेन मनसा (अस्मै) अस्मै राज्ञे (देवकामः) स्वस्य देवभूतस्य राज्ञः कामनां पूरयन् सन् (सोमं सुनोति) सोतव्यं समुन्नेतव्यं राष्ट्रं समुन्नयति (तस्य गाः न परा ददाति) तस्य पुरोहितस्य वाचो न त्यजति (अस्मै प्रशस्तं चारुम्-इत् कृणोति) अस्मै प्रशंसनीयं सुन्दरं खलु सुखं करोति ॥३॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Whoever is loyal and dedicated with enthusiastic mind and total devotion of heart and soul, and creates and matures the soma of universal value for Indra and the social order, the lord never ignores his words of prayer, never alienates his property and possessions, in fact he recognises his services with honour and makes him feel proud and blest.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो पुरोहित राजाची कामना करणारा असून, त्याचे राष्ट्र समुन्नत करण्याचा उपदेश करतो. त्याच्या उपदेशाचे राजाने पालन करावे. उल्लंघन कधी करू नये तर त्याला उत्तम भेट (वस्तू) द्यावी. ॥३॥

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