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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 85 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 85/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अत्रिः देवता - वरुणः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    इ॒मामू॒ नु क॒वित॑मस्य मा॒यां म॒हीं दे॒वस्य॒ नकि॒रा द॑धर्ष। एकं॒ यदु॒द्ना न पृ॒णन्त्येनी॑रासि॒ञ्चन्ती॑र॒वन॑यः समु॒द्रम् ॥६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒माम् । ऊँ॒ इति॑ । नु । क॒विऽत॑मस्य । मा॒याम् । म॒हीम् । दे॒वस्य॑ । नकिः॑ । आ । द॒ध॒र्ष॒ । एक॑म् । यत् । उ॒द्ना । न । पृ॒णन्ति॑ । एनीः॑ । आ॒ऽसि॒ञ्चन्तीः॑ । अ॒वन॑यः । स॒मु॒द्रम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इमामू नु कवितमस्य मायां महीं देवस्य नकिरा दधर्ष। एकं यदुद्ना न पृणन्त्येनीरासिञ्चन्तीरवनयः समुद्रम् ॥६॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इमाम्। ऊँ इति। नु। कविऽतमस्य। मायाम्। महीम्। देवस्य। नकिः। आ। दधर्ष। एकम्। यत्। उद्ना। न। पृणन्ति। एनीः। आऽसिञ्चन्तीः। अवनयः। समुद्रम् ॥६॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 85; मन्त्र » 6
    अष्टक » 4; अध्याय » 4; वर्ग » 31; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्मनुष्याः किङ्कुर्युरित्याह ॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या ! य इमां कवितमस्य देवस्य मायामु महीं कोऽपि नु नकिराऽऽदधर्ष यद्या उद्ना नैनीरासिञ्चन्तीरवनय एकं समुद्रं पृणन्ति ता यूयं यथावद्विजानीत ॥६॥

    पदार्थः

    (इमाम्) (उ) (नु) (कवितमस्य) अतिशयेन कवेः (मायाम्) मेघाम् (महीम्) वाणीम् (देवस्य) (नकिः) (आ) (दधर्ष) आधृष्णोति (एकम्) (यत्) याः (उद्ना) उदकेन (न) इव (पृणन्ति) पूरयन्ति (एनीः) एन्यो मृगस्त्रिय इव धावन्त्यः (आसिञ्चन्तीः) समन्तात् सिञ्चन्त्यः (अवनयः) अवन्ति यास्ता नद्यः। अवनय इति नदीनामसु पठितम्। (निघं०१.१३) (समुद्रम्) सागरम् ॥६॥

    भावार्थः

    ये मनुष्या महाविदुषां सकाशान्महतीं प्रज्ञां वाचं च प्राप्यान्यान् प्रापयन्ति त एव जगति धन्याः सन्ति ॥६॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! जो (इमाम्) इस (कवितमस्य) अतिशय कविजन (देवस्य) विद्वान् की (मायाम्) बुद्धि को (उ) और (महीम्) वाणी को कोई भी (नु) शीघ्र (नकिः) नहीं (आ, दधर्ष) दबाता है और (यत्) जो (उद्ना) जल से (न) जैसे वैसे (एनीः) हरिणियों के सदृश दौड़तीं और (आसिञ्चन्तीः) चारों और सींचती हुईं (अवनयः) रक्षा करनेवाली नदियाँ (एकम्) एक (समुद्रम्) समुद्र को (पृणन्ति) पूर्ण करती हैं, उनको आप लोग यथावत् जानिये ॥६॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य बड़े विद्वानों के समीप से बड़ी बुद्धि और वाणी को प्राप्त होकर अन्यों के लिये प्राप्त कराते हैं, वे ही संसार में धन्य होते हैं ॥६॥

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    विषय

    सर्व देवमय प्रभु ।

    भावार्थ

    भा०- ( कवि-तमस्य ) समस्त क्रान्तदर्शी विद्वानों के बीच में सर्वश्रेष्ठ ( देवस्य ) दानशील, सर्वविजयी, तेजस्वी राजा और प्रभु की ( इमाम् उ नु महीं मायाम् ) इस बड़ी भारी बुद्धि और निर्माण-चातुरी को ( नकिः आ दधर्ष ) कोई भी तिरस्कार नहीं कर सकता, (यत्) कि ( एनी: अवनयः ) जिस प्रकार सदा बहती हुई नदियें भी ( आ सिञ्चन्तीः ) सब ओर से जल सेंचती हुई भी ( समुद्रं उद्ना न पृणन्ति ) समुद्र को जल से नहीं भर पातीं उसी प्रकार ( एनीः ) सब ओर से प्राप्त, ( अवनयः ) ये भूमिवासिनी प्रजाएं या भूमियें भी (एकं समुद्रं ) एक समुद्र के समान अथाह बलशाली राजा को (आ सिञ्चन्ती: ) सब प्रकार से संचती हुई, अभिषेक करती हुई भी ( न पृणन्ति ) ऐश्वर्य से पूर्ण नहीं कर पातीं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अत्रिर्ऋषिः ॥ वरुणो देवता ॥ छन्दः - १, २ विराट् त्रिष्टुप् । ३, ४, ६,८ , निचृत्त्रिष्टुप् । ५ स्वराट् पंक्ति: । ७ ब्राह्मयुष्णिक् ।। अष्टर्चं सूक्तम् ।।

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    विषय

    क्या ही आश्चर्य है ?

    पदार्थ

    [१] (इमां उ) = इस ही (नु) = अब (कवितमस्य) = उस कान्तप्रज्ञ (देवस्य) = प्रकाशमय प्रभु की (महीं मायाम्) = महती माया को (नकि: आदधर्ष) = कोई भी हिंसित नहीं कर पाता। उस महान् प्रभु की, यह मन्त्र के उत्तरार्ध में वर्णित, माया ही अत्यन्त महान् है (यत्) = कि, [२] (एकं समुद्रम्) = इस एक समुद्र को (एनी:) = ये शुभ्रवर्णवाली गतिशील (आसिञ्चन्ती:) = चारों ओर से सींचती हुईं (अवनय:) = नदियाँ (उद्ना) = उदक से (न पृणन्ति) = नहीं भर देती हैं । निरन्तर समुद्र में नदियाँ पड़ रही हैं, पर समुद्र उसी रूप में है। 'कभी यह भरकर ऊर्ध्वप्रवाहवाला हो जाये' ऐसी बात नहीं । क्या ही विचित्र व्यवस्था है ?

    भावार्थ

    भावार्थ- चारों ओर से निरन्तर गतिवाली नदियों से भरा जाता हुआ भी यह समुद्र भर नहीं जाता। क्या ही विचित्र व्यवस्था है ?

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे मोठ्या विद्वानाकडून महान बुद्धी व वाणीची प्राप्ती करतात व ती इतरांनाही प्राप्त करवून देतात. तीच जगात धन्य असतात. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    This great power of the most creative lord, who can challenge and violate? None, just as all the streams and rivers flooding the lands and rushing on do not fill the ocean with water.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What should men do is taught further.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men ! no one is able to counteract the wisdom and the venerable Divine Speech of the most sagacious God, whereby the buried water shedding rivers running like the female deer fill the ocean with water. You should know them well.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Blessed are those persons who having acquired great wisdom and speech from the great scholars, teach it to others.

    Foot Notes

    (एनीः) एन्योः मृगस्त्रिय इव धावन्त्य: । = Running like the female deer.(अवनयः) अवन्ति यास्ता नद्यः अवनय इति नदीनाम (NG 1, 13) = Rivers (वष्टि ) कामयते । वश-कान्तौ । कान्तिः-कामना = Desire.

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