ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 20/ मन्त्र 9
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
स ईं॒ स्पृधो॑ वनते॒ अप्र॑तीतो॒ बिभ्र॒द्वज्रं॑ वृत्र॒हणं॒ गभ॑स्तौ। तिष्ठ॒द्धरी॒ अध्यस्ते॑व॒ गर्ते॑ वचो॒युजा॑ वहत॒ इन्द्र॑मृ॒ष्वम् ॥९॥
स्वर सहित पद पाठसः । ई॒म् । स्पृधः॑ । व॒न॒ते॒ । अप्र॑तिऽइतः । बिभ्र॑त् । वज्र॑म् । वृ॒त्र॒ऽहन॑म् । गभ॑स्तौ । तिष्ठ॑त् । हरी॒ इति॑ । अधि॑ । अस्ता॑ऽइव । गर्ते॑ । व॒चः॒ऽयुजा॑ । व॒ह॒तः॒ । इन्द्र॑म् । ऋ॒ष्वम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
स ईं स्पृधो वनते अप्रतीतो बिभ्रद्वज्रं वृत्रहणं गभस्तौ। तिष्ठद्धरी अध्यस्तेव गर्ते वचोयुजा वहत इन्द्रमृष्वम् ॥९॥
स्वर रहित पद पाठसः। ईम्। स्पृधः। वनते। अप्रतिऽइतः। बिभ्रत्। वज्रम्। वृत्रऽहनम्। गभस्तौ। तिष्ठत्। हरी इति। अधि। अस्ताऽइव। गर्ते। वचःऽयुजा। वहतः। इन्द्रम्। ऋष्वम् ॥९॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 20; मन्त्र » 9
अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 10; मन्त्र » 4
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अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 10; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
स इन्द्रो वृत्रहणं वज्रं गभस्तौ सूर्य इव बिभ्रदप्रतीतः स्पृध ईं वनते हरी अस्तेव गर्तेऽधि तिष्ठत् तथा त्वं यौ वचोयुजा ऋष्वमिन्द्रं वहतस्तौ यानेषु युङ्क्ष्व ॥९॥
पदार्थः
(सः) (ईम्) जलम् (स्पृधः) स्पर्द्धन्ते येषु तान् (वनते) सम्भजति (अप्रतीतः) शत्रुभिरज्ञातः (बिभ्रत्) धरन् (वज्रम्) (वृत्रहणम्) येन वृत्रं हन्ति तत् (गभस्तौ) किरणे (तिष्ठत्) तिष्ठति (हरी) अश्वाविव धारणाकर्षणे (अधि) (अस्तेव) प्रेरकः सारथिरिव (गर्ते) गृहे। गर्त इति गृहनाम। (निघं०३.४) (वचोयुजा) यौ वचसा युङ्क्तस्तौ (वहतः) (इन्द्रम्) विद्युतमिव राजानम् (ऋष्वम्) महान्तम् ॥९॥
भावार्थः
राजा सदैव स्वमन्त्रं गोपयेद् यदा कार्यं सिद्ध्येत् तदैव जना प्रसिद्धं जानीयुः शस्त्राणि धृत्वा सेनाः सुशिक्ष्य महदैश्वर्यं प्राप्नुयात् ॥९॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
(सः) वह प्रताप से युक्त राजा (वृत्रहणम्) जिससे मेघ का नाश करता है उस (वज्रम्) वज्र को (गभस्तौ) किरण में सूर्य जैसे (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (अप्रतीतः) शत्रुओं से नहीं जाना गया (स्पृधः) स्पर्द्धा करते हैं जिनमें उनका और (ईम्) जल का (वनते) सेवन करता है और (हरी) घोड़े जैसे धारण और आकर्षण को, वैसे वा (अस्तेव) प्रेरणा करनेवाला सारथि जैसे वैसे (गर्ते) गृह में (अधि, तिष्ठत्) स्थित होता है, वैसे आप जो (वचोयुजा) वचन से युक्त करते वे दोनों (ऋष्वम्) बड़े (इन्द्रम्) बिजुली के सदृश राजा को (वहतः) पहुँचाते हैं, उनको वाहनों में युक्त करिये ॥९॥
भावार्थ
राजा सदा ही अपने विचार को छिपावे, जब कार्य सिद्ध होवे तभी लोग प्रकट जानें और शस्त्रों को धारण कर सेनाओं को उत्तम प्रकार शिक्षा देकर बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होवे ॥९॥
विषय
न्यायासन पर विराजे अधिकारी के कर्तव्य।
भावार्थ
( सः ) वह राजा ( गभस्तौ ) हाथ में ( वज्रं विभ्रत् ) शस्त्र वा राजदण्ड धारण किये, ( अप्रतीतः ) शत्रुओं से अज्ञात रहकर वा अन्यों से (अप्रति-इतः ) मुक़ाबले पर भी न जीता जाकर ( ई स्पृधः वनते ) इन अपने से स्पर्धा करने वाले शत्रुओं को विनाश करे, वा परस्पर स्पर्धा करनेवाले वादिप्रतिवादियों के धन आदि का न्यायपूर्वक विभाग करे। ( अस्ता इव गर्त्ते अधि हरी अतिष्ठत) जिस प्रकार शूरवीर धनुर्धर पुरुष रथ पर चढ़कर अपने दोनों अश्वों पर शासन करता है उसी प्रकार राजा ( गर्त्ते अधि) न्यायासन पर विराज कर (हरी अधि तिष्ठत्) वादी प्रतिवादी दोनों पक्ष के मनुष्यों पर शासन करें। उस समय ( ऋष्वम् इन्द्रम् ) उस महान्, पूज्य, इन्द्रासन पर विराजते राजा को ( वचोयुजा ) वाणियों से परस्पर पर अभियोग करने वाले दो वकील सत्य निर्णय पर पहुंचावें । इसी प्रकार वह राजा (गर्ते अधि हरी तिष्ठत्) रथ पर सवार होकर अश्वों पर वश करे, और वाणी द्वारा अन्यों को कार्य में लगाने में समर्थ वा राजा के आज्ञाकारी दो विद्वान् जन उस महान् ( इन्द्रं ) ऐश्वर्य युक्त राष्ट्र वा राष्ट्रपति को ( वहतः ) धारण करें, उसका कार्य सम्पादन करें ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषि: । इन्द्रो देवता ॥ छन् १ अनुष्टुप् । २,३, ७, १२ पाक्तः। ४, ६ भुरिक पंक्तिः । १३ स्वराट् पंक्ति: । १७ निचृत्पंक्तिः॥ ५, ८, ६, ११ निचृत्रिष्टुप् ।। सप्तदशर्चं सूक्तम् ।।
विषय
शत्रु विजय व प्रभु प्राप्ति
पदार्थ
[१] (सः) = वह प्रभु-भक्त (ईम्) = निश्चय से (गभस्तौ) = हाथ में (वृत्रहणम्) = वृत्र [वासना] के विनाशक (वज्रम्) = वज्र को (बिभ्रत्) = धारण करता हुआ, (अप्रतीतः) = शत्रुओं से आक्रान्त न होता हुआ (स्पृधः) = इन स्पर्धा करते हुए शत्रुओं को वनते जीतता है, इन शत्रुओं का हिंसन करके विजय को प्राप्त करता है । [२] काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं को जीतकर (हरी तिष्ठत्) = अपने ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्वों का अधिष्ठाता बनता है। यह (गर्ते अधि) = इस शरीर रथ पर (अस्ता इव) = शत्रुओं पर बाण फेंकनेवाले के समान स्थित होता है। शत्रुओं को ज्ञान के बाणों से आहत करता हुआ यह अपने से दूर रखता है। कामदेव यदि 'मन्मथ' का रूप धारण करके अपने पञ्चबाणों से इसके ज्ञान को नष्ट करने का यत्न करता है, तो यह ज्ञान के बाणों से काम को विनष्ट करने के लिए यत्नशील होता है। अब ये (वचोयुजा) = इन्द्र के आदेश के अनुसार शरीर-रथ में जुतनेवाले ये इन्द्रियाश्व (इन्द्रम्) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को (ऋष्वं वहतः) = उस महान् प्रभु के समीप प्राप्त कराते हैं। वशीभूत इन्द्रियाँ प्रभु प्राप्ति का साधन बनती हैं।
भावार्थ
भावार्थ- हम क्रियाशीलता रूप वज्र को धारण करते हुए वासना को विनष्ट करें। इन्द्रियों को वशीभूत करके प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें ।
मराठी (1)
भावार्थ
राजाने आपले विचार सदैव गुप्त ठेवावेत. जेव्हा कार्य पूर्ण होईल तेव्हाच लोकांसमोर प्रकट करावे. शस्त्रे-अस्त्रे बाळगून सेनेला उत्तम शिक्षित करून खूप ऐश्वर्य प्राप्त करावे. ॥ ९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, glorious ruler, enemies unknown, takes on and wins over the rivals and contenders and, wielding the cloud-breaking thunderbolt in hand and settled in his dominion seat of power, he aims like an archer and rides his chariot driven by word-controlled horse powers which drive the mighty ruler over the expanse of his dominion.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The subject of kings duties is further elaborated.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
That king holding in his hand the thunderbolt-like powerful weapon which destroys the foes, like the sun in its rays, not known by enemies, meets his competitors and takes water in proper quantity. As a charioteer drives the horses and sits in his house afterwards, so yoke or harness the horses in the form of the power of upholding and attraction with the words who carry the king like electricity.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
A king should keep his plans as secret, when (until) a work is accomplished then only should men know about it. He should wear weapons, train his armies well and attain great prosperity.
Foot Notes
(अप्रतीतः) शत्र ुभिरज्ञातः । अ + प्रति + इत इण-गतौ (अदा.)। = Not known by enemies. (अस्तेव)प्रेरकः सारथिरिव । असु-क्षेपणे (दिवा) | = Like a charioteer. (हरी) अश्वाविव धारणाकर्षणे । = - The power of upholding and attraction acting like horses. (हरी) अस्श्वाविव धारणाकर्षणे (NG 3,4) the house.
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