ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 101 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 101/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वसिष्ठः कुमारो वाग्नेयः देवता - पर्जन्यः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    हे परमात्मन् ! (तिस्रः, वाचः) ज्ञानप्रद कर्मप्रद, उपासनाप्रद इन तीनों वाणियों को (प्रवद) कहिये, (याः) जो वाणियें (ज्योतिः, अग्राः) अपने प्रकाश से सर्वोपरि हैं और (एतत्, ऊधः) नभोमण्डलरूपी इस स्तनमण्डल से (मधुदोघम्) अमृतरूपी ओषधियों को (दुहे) दुहती हैं और (सः) वह पर्जन्य (वत्सं, कृण्वन्) विद्युत् को वत्स बनाता हुआ और (ओषधीनां, गर्भम्) नाना प्रकार की ओषधियों में गर्भ धारण करता हुआ (सद्यो, जातः) तत्काल उत्पन्न हुआ (वृषभः) “वर्षणाद्वृषभः” मेघ (रोरवीति) अत्यन्त शब्द करता है ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मन्त्र में स्वभावोक्ति अलङ्कार से परमात्मा ने यह उपदेश किया है कि विद्युत् शक्ति को वत्स और आकाशस्थ मेघमण्डल को ऊधस्थानी बनाकर ऋत्विजों को ऋचारूपी हस्तों द्वारा दोग्धा बनाया है। तात्पर्य यह हैं कि वर्षाऋतु में ऋत्विजों को उद्गाता आदिकों के उच्च स्वरों से वेदमन्त्रों को गायन करना चाहिये, ताकि वृष्टि सुखप्रद और समय सुखप्रद प्रतीत हो ॥१॥

    पदार्थ -

    हे भगवन् ! (तिस्रः, वाचः) ज्ञानप्रदकर्मप्रदोपासना-प्रदात्मकं वाक्त्रयं (प्रवद) उपदिश। (याः) या वाचः (ज्योतिः, अग्राः) उत्कर्षातिशयेन राजमानाः (एतत् ऊधः) एतन्नभोमण्डलात्मकस्तनमण्डलात् (मधुदोघम्) अमृत-स्वरूपा ओषधीः (दुहे) दुहन्ति च तथा (सः) स पर्जन्यः (वत्सम्, कृण्वन्) विद्युतमेव वत्सं कुर्वन् तथा च (ओषधीनाम्, गर्भम्) नानाविधौषधिषु गर्भं धारयन् (सद्यः, जातः) तदानीमेवोत्पद्यमानः (वृषभः) वर्षणशीलो मेघः (रोरवीति) अभीक्ष्णं शब्दायते ॥१॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top