ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 55/ मन्त्र 3
ऋषिः - कृशः काण्वः
देवता - प्रस्कण्वस्य दानस्तुतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
श॒तं वे॒णूञ्छ॒तं शुन॑: श॒तं चर्मा॑णि म्ला॒तानि॑ । श॒तं मे॑ बल्बजस्तु॒का अरु॑षीणां॒ चतु॑:शतम् ॥
स्वर सहित पद पाठश॒तम् । वे॒णूम् । श॒तम् । शुनः॑ । श॒तम् । चर्मा॑णि । म्ला॒तानि॑ । श॒तम् । मे॒ । ब॒ल्ब॒ज॒ऽस्तु॒काः । अरु॑षीणाम् । चतुः॑ऽशतम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
शतं वेणूञ्छतं शुन: शतं चर्माणि म्लातानि । शतं मे बल्बजस्तुका अरुषीणां चतु:शतम् ॥
स्वर रहित पद पाठशतम् । वेणूम् । शतम् । शुनः । शतम् । चर्माणि । म्लातानि । शतम् । मे । बल्बजऽस्तुकाः । अरुषीणाम् । चतुःऽशतम् ॥ ८.५५.३
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 55; मन्त्र » 3
अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
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अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Hundred clusters of trees, hundred other such gifts of generosity, hundred shields well polished, hundred bundles of grass and four hundred fields of shining fertile land, that’s the gift of generous Indra.
मराठी (1)
भावार्थ
ऐश्वर्यवानाच्या अशा प्राकृतिक व परिष्कृत अनेक शक्ती आहेत. ॥३॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(शतम्) सैकड़ों (वेणून्) वीणा (शतं शुनः) अनेक श्वान, (शतं म्लातानि चर्माणि) सैकड़ों साफ किये हुए चमड़े, (शतम्) सैकड़ों (बल्बजस्तुकाः) विशेष प्रकार की घास के गुच्छे (अरुषीणाम्) चमकती हुई [भूमियों की] (चतुःशतम्) चार सौ संख्या॥३॥
भावार्थ
जो व्यक्ति धन व सम्पदा से युक्त है उनकी ऐसी-ऐसी प्राकृतिक व परिष्कृत विभूतियाँ हैं॥३॥
विषय
परमेश्वर के जीव जनों पर अपार दान।
भावार्थ
( शतं वेणून् ) सौ अर्थात् अनेक वीणाएं, ( शतं शुनः ) सौ, अर्थात् अनेक कुत्ते ( शतं म्लातानि चर्माणि ) सैकड़ों बनाये हुए चमड़े, और ( शतं बल्बजस्तुकाः ) सौ मूंज की सी गुच्छों वाली बनभूमियां और ( अरुषीणां चतुःशतम् ) दीप्तियुक्त चमकती कान्ति वाली भूमियों की ४ सौ संख्या। ये सब जिस प्रकार ऐश्वर्यवान् पुरुष के अधीन होती हैं वैसे (मे) मेरे भी हों। अर्थात् यह राजसी सैकड़ों बाजे, सैकड़ों कुत्तों के समानस्वामिभक्त प्रहरी वा सेवक, सैकड़ों रक्षार्थ ढालें, और सैंकड़ों बन भूमियें, और सैकड़ों चारों ओर पके खेत ये सब ऐश्वर्यवान् वीर राजा की विभूति हैं वे हमें प्राप्त हों।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कृशः काण्व ऋषिः॥ प्रस्कण्वस्य दानस्तुतिर्देवता॥ छन्दः—१ पादनिचृद् गायत्री। २, ४ गायत्री। ३, ५ अनुष्टुप्॥ पञ्चर्चं सूक्तम्॥
विषय
सृष्टि की विविधता
पदार्थ
[१] गतमन्त्र में सैकड़ों सूर्यों का उल्लेख था । इस सूर्य की किरणें ही (शतं वेणून्) = सैकड़ों वेणुओं को धारण करती हैं। वेणु यहाँ वनस्पति का प्रतीक है- वनस्पति मात्र को ये सूर्य किरणें ही धारण करती हैं। (शतं शुनः) = सैकड़ों कुत्तों को ये धारण करती हैं। 'श्वा' शब्द यहाँ पशुओं का प्रतीक हैं। (शतं) = सैकड़ों प्रकार के (म्लातानि) = कमाये हुए (चर्माणि) = चमड़े इन सूर्यकिरणों द्वारा ही प्राप्त कराये जाते हैं। प्रत्येक पशु का चर्म अलग-अलग ही प्रकार का है। [२] प्रभु ने (मे) = मेरे लिए (शतं) = सैकड़ों (बल्बजस्तुका) = तृणों के गुच्छों का निर्माण किया है। (अरुषीणां चतुःशतम्) = आरोचमान ज्वालाओं के भी चार सौ भेद हैं। ज्वालाएँ भी भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं।
भावार्थ
भावार्थ-प्रभु ने हमारे उपयोग के लिए इस विविध सृष्टि का निर्माण किया है। नाना प्रकार की वनस्पतियाँ, नाना पशु, तथा नाना प्रकार के चमड़े व तृणगुच्छ तथा नाना प्रकार की ज्वालाएँ प्रभु द्वारा निमत्त हुई हैं।
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