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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1167
    ऋषिः - वत्सः काण्वः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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    पु꣣रुत्रा꣢꣫ हि स꣣दृङ्ङ꣢꣫सि꣣ दि꣢शो꣣ वि꣢श्वा꣣ अ꣡नु꣢ प्र꣣भुः꣢ । स꣣म꣡त्सु꣢ त्वा हवामहे ॥११६७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पु꣣रुत्रा꣢ । हि । स꣣दृ꣢ङ् । स꣣ । दृ꣢ङ् । अ꣡सि꣢꣯ । दि꣡शः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡नु꣢꣯ । प्र꣣भुः꣢ । प्र꣣ । भुः । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । त्वा꣣ । ह꣣वा꣡म꣢हे ॥११६७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि दिशो विश्वा अनु प्रभुः । समत्सु त्वा हवामहे ॥११६७॥


    स्वर रहित पद पाठ

    पुरुत्रा । हि । सदृङ् । स । दृङ् । असि । दिशः । विश्वाः । अनु । प्रभुः । प्र । भुः । समत्सु । स । मत्सु । त्वा । हवामहे ॥११६७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1167
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 12; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमात्मा की स्तुति करते हुए उसका आह्वान किया गया है।

    पदार्थ

    हे अग्नि अर्थात् सर्वान्तर्यामी परमात्मन् ! आप (पुरुत्रा) सभी के प्रति (सदृङ्) समदर्शी (असि) हो। (विश्वाः दिशः अनु) सब दिशाओं में अर्थात् सब क्षेत्रों में (प्रभुः) समर्थ हो। हम (समत्सु) आन्तरिक तथा बाह्य देवासुर-संग्रामों में (त्वा) आपको (हवामहे) पुकारते हैं ॥२॥

    भावार्थ

    जो पक्षपात से रहित, सब बातों में समर्थ परमेश्वर विपत्ति के समय शक्ति-प्रदान द्वारा रक्षा करता है, उसमें सबको ध्यान लगाना चाहिए ॥२॥

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    पदार्थ

    (पुरुत्राः-हि सदृङ्-असि) हे अग्रणी परमात्मन्! तू बहुत प्रकार से त्राणकर्ता है निश्चय समानद्रष्टा है—त्राण करने में तू समदर्शी है (विश्वाः-दिशः-अनु प्रभुः) सारी दिशाओं के प्रति—प्रभु सारी दिशाओं का स्वामी है (त्वा समत्सु हवामहे) तुझे सम्यक् मोद—आनन्द*105 प्रसङ्गों के निमित्त आमन्त्रित करते हैं—बुलाते हैं—तू प्रमोद आनन्द का देने वाला है॥२॥

    टिप्पणी

    [*105. “समदो धा....सम्मदो वा मदतेः” [निरु॰ ९.१७]।]

    विशेष

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    विषय

    वत्स का प्रभु-स्मरण, हर्ष की पवित्रता

    पदार्थ

    ‘वदतीति वत्सः' इस व्युत्पत्ति से वेदमन्त्रों से प्रभु का स्तवन करनेवाला कहता है कि — १ . (हि) = निश्चय से (पुरुत्रा) = आप पालन और पूरण करनेवाले [पुरु=पृणाति] तथा त्राण [रक्षा] करनेवाले हैं, २. (सदृङ् असि) = आप सभी को समान दृष्टि से देखनेवाले हैं। किसी भी प्रकार के पक्षपात से युक्त न होकर आप सभी का समानरूप से पालन करनेवाले हैं। कार्यानुसार सबके लिए उचित व्यवस्था कर रहें हैं। ३. (विश्वा: दिश: अनु) = सम्पूर्ण दिशाओं में (प्रभुः) = आप ही शासन करनेवाले हैं। सर्वत्र आपका ही साम्राज्य है । ४. (समत्सु) = [समक्षे वा अत्तेः–नि० ९.१७] मिलकर भोजनों के समय में [सम्मदो वा मदतेः – नि० ९.१७] अथवा सम्मिलित हर्ष के अवसरों पर (त्वा) = आपको (हवामहे) = पुकारते हैं, आपका स्मरण करते हैं। सम्मिलित भोजनों व सम्मिलित गानादि गोष्ठियों के अवसरों पर प्रभु-स्मरण इसलिए आवश्यक है कि हम उन कर्मों में मर्यादा के अन्दर रहें, कहीं सीमा का उल्लंघन न कर जाएँ।

    भावार्थ

    भोजनों में, गानों में, हर्ष के सब अवसरों पर प्रभु-स्मरण करें, जिससे मर्यादोल्लंघन न हो । हर्ष नशे में परिवर्तित न होकर उसकी अपनी पवित्रता बनी रहे ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (अग्ने) परमात्मन् ! (पुरुत्रा) समस्त प्रजाओं को आप (सदृङ्) समान दृष्टि से देखने वाले (असि) हो। (विश्वा दिशः, अनु) समस्त दिशाओं में (प्रभुः) आप ही ईश्वर, उत्तम सामर्थ्यवान् हो। (समत्सु) आनन्द, उत्सवों, यज्ञों और संग्रामों के अवसरों पर (त्वा) तेरी ही (हवामहे) याद करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ वृषगणो वासिष्ठः। २ असितः काश्यपो देवलो वा। ११ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ४ यजत आत्रेयः। ५ मधुच्छन्दो वैश्वामित्रः। ७ सिकता निवावरी। ८ पुरुहन्मा। ९ पर्वतानारदौ शिखण्डिन्यौ काश्यप्यावप्सरसौ। १० अग्नयो धिष्ण्याः। २२ वत्सः काण्वः। नृमेधः। १४ अत्रिः॥ देवता—१, २, ७, ९, १० पवमानः सोमः। ४ मित्रावरुणौ। ५, ८, १३, १४ इन्द्रः। ६ इन्द्राग्नी। १२ अग्निः॥ छन्द:—१, ३ त्रिष्टुप्। २, ४, ५, ६, ११, १२ गायत्री। ७ जगती। ८ प्रागाथः। ९ उष्णिक्। १० द्विपदा विराट्। १३ ककुप्, पुर उष्णिक्। १४ अनुष्टुप्। स्वरः—१-३ धैवतः। २, ४, ५, ६, १२ षड्ज:। ७ निषादः। १० मध्यमः। ११ ऋषभः। १४ गान्धारः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मानं स्तुवन् तमाह्वयति।

    पदार्थः

    हे अग्ने सर्वान्तर्यामिन् परमात्मन् ! त्वम् (पुरुत्रा) बहुषु, सर्वेष्वेवेति भावः। [देवमनुष्यपुरुषपुरुमर्त्येभ्यो द्वितीयासप्तम्योर्बहुलम्। अ० ५।४।५६ इत्यनेन पुरुशब्दात् सप्तम्यर्थे त्रा प्रत्ययः।] (सदृङ्) समानद्रष्टा (असि) वर्तसे। (विश्वाः दिशः अनु) सर्वाः दिशः अनुलक्ष्य, सर्वेषु क्षेत्रेष्वित्यर्थः (प्रभुः) समर्थोऽसि। वयम् (समत्सु) आन्तरेषु बाह्येषु च देवासुरसंग्रामेषु। [समदः इति संग्रामनाम। निघं० २।१७।] (त्वा) त्वाम् (हवामहे) आह्वयामः ॥२॥

    भावार्थः

    यः पक्षपातरहितः सर्वत्र समर्थः परमेश्वरो विपत्काले शक्तिप्रदानेन रक्षति स सर्वैर्ध्यातव्यः ॥२॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ८।११।८, ४३।२१ उभयत्र ‘विशो॒ विश्वा॒’ इति पाठः।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, Thou art alike towards all Thy subjects. Thou art Lord through all the regions. We invoke Thee for aid in battles and on difficult occasions!

    Translator Comment

    In battles: In our struggle against immoral forces like lost and anger.

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    Meaning

    You are the universal eye watching the entire humanity of the world as master and ruler. As such, O lord, we invoke and call upon you in our battles of life. (Rg. 8-11-8)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (पुरुत्रा हि सदृङ् असि) હે અગ્રણી પરમાત્મન્ ! તું અનેક રીતે ત્રાણ-રક્ષા કરનાર છે, નિશ્ચય સમાન દ્રષ્ટા છે-રક્ષા કરવામાં તું સમદર્શી છે. (विश्वाः दिशः अनु प्रभुः) સમસ્ત દિશાઓ પ્રત્યે પ્રભુ સર્વ દિશાઓનો સ્વામી છે. (त्वा समत्सु हवामहे) તને સમ્યક્ મોદ-આનંદ પ્રસંગોને માટે આમંત્રિત કરીએ છીએ-બોલાવીએ છીએ. તું પ્રમોદ-આનંદનો આપનાર છે. (૨)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो पक्षपातरहित असून सर्व गोष्टींमध्ये समर्थ परमेश्वर विपत्तीमध्ये शक्ती प्रदान करतो व रक्षण करतो त्याच्याठायी सर्वांनी ध्यान लावले पाहिजे. ॥२॥

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