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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1185
    ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    43

    नृ꣣च꣡क्ष꣢सं त्वा व꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯पीतꣳ स्व꣣र्वि꣡द꣢म् । भ꣣क्षीम꣡हि꣢ प्र꣣जा꣡मिष꣢꣯म् ॥११८५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नृच꣡क्ष꣢꣯सम् । नृ꣣ । च꣡क्ष꣢꣯सम् । त्वा꣣ । वय꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯पीतम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । पी꣣तम् । स्वर्वि꣡द꣢म् । स्वः꣣ । वि꣡द꣢꣯म् । भ꣣क्षीम꣡हि꣢ । प्र꣣जा꣢म् । प्र꣣ । जा꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् ॥११८५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नृचक्षसं त्वा वयमिन्द्रपीतꣳ स्वर्विदम् । भक्षीमहि प्रजामिषम् ॥११८५॥


    स्वर रहित पद पाठ

    नृचक्षसम् । नृ । चक्षसम् । त्वा । वयम् । इन्द्रपीतम् । इन्द्र । पीतम् । स्वर्विदम् । स्वः । विदम् । भक्षीमहि । प्रजाम् । प्र । जाम् । इषम् ॥११८५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1185
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 8
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।

    पदार्थ

    हे सोम अर्थात् जगत् को पैदा करनेवाले, रस के भण्डार परमात्मन् ! (नृचक्षसम्) मनुष्यों के द्रष्टा, (इन्द्रपीतम्) उपासक जीवात्माओं से तन्मय होकर पिये गये, (स्वर्विदम्) दिव्य प्रकाश वा मोक्षसुख प्राप्त करानेवाले (त्वा) आपको (वयम्) हम आपके उपासक पुकार रहे हैं। हम आपसे (प्रजाम्) सद्गुणरूप सन्तान और (इषम्) अभीष्ट आनन्द-रस की धारा (भक्षीमहि) प्राप्त करें ॥८॥

    भावार्थ

    परमेश्वर का बार-बार ध्यान करके उपासक दिव्य आनन्द-रस को और मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है ॥८॥

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    पदार्थ

    (त्वा) हे सोम—शान्तस्वरूप परमात्मन्! तुझ—(नृचक्षसम्) मनुष्यों के द्रष्टा—कर्मफल प्रदानार्थ अन्तः साक्षी—(इन्द्रपीतम्) आत्मा के पान—धारण करने योग्य—(स्वर्विदम्) सुख प्राप्त कराने वाले—(प्रजाम्-इषम्) प्रजारूप और अन्नरूप को (भक्षीमहि) भजं८ सेवन करें—स्तुति में लावें—तू ही प्रजा है, तू ही अन्न है, तू ही हमारा सब कुछ है॥८॥

    विशेष

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    विषय

    इस सोम को और उस सोम को

    पदार्थ

    हे सोम! (वयम्) = हम (त्वा) = तुझे भक्षीमहि अपने अन्दर ग्रहण करते हैं। किस तुझे – १. (नृचक्षसम्) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाले को [चक्ष्=look after] । शरीर में उत्पन्न सोम [शक्ति] मनुष्य को रोगादि से बचाता है और इस सोम-उत्पादन की व्यवस्था करनेवाले प्रभु तो हमारा पालन करनेवाले हैं ही । २. (इन्द्रपीतम्) = इस सोम का पान जितेन्द्रिय पुरुष के द्वारा होता है— उस प्रभु का भी पान – अपने अन्दर ग्रहण जितेन्द्रिय पुरुष ही कर पाता है । ३. (स्वर्विदम्) = यह पीया हुआ सोम उस (स्वः) = स्वयं देदीप्यमान ज्योति को प्राप्त करानेवाला है और प्राप्त हुई हुई वह ज्योति (स्व:) = सब सुखों को देनेवाली है। ४. (प्रजाम्) = प्रकृष्ट विकास का यह कारण होता है । इस सोम की रक्षा ही सब उन्नतियों का मूल है और प्रभु - चिन्तन हमारे हृदय को विशाल बनानेवाला है । ५. (इषम्) = यह सोम हमारे जीवन को गतिशील बनाता है [इष् गतौ] और वह हृदयस्थ सोम [प्रभु] हमें उत्तम प्रेरणा देते हैं [इष् प्रेरणे] । इस प्रकार इन सोमों के द्वारा हम 'असित’, ‘काश्यप’ व 'देवल' = स्वतन्त्र, ज्ञानी व देव बन पाते हैं ।

    भावार्थ

    हम सोम का पान करें तथा इस सोमपान से उस सोमरूप प्रभु का दर्शन करेंगी।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (सोम) साधक आत्मन् (स्वर्विदः) मोक्ष सुख को प्राप्त करने और जानने हारे (इन्द्रपीतं) ईश्वर के अनुग्रह से, या आत्मा अपने ही रस से तृप्त (नृचक्षसम्) समस्त प्राणियों को समान दृष्टि से देखने हारे (त्वा) तुझको हम (भक्षीमहि) सेवन करें और (प्रजाम्) उत्तम सन्तान और (इषम्) बल, अन्न और सत् ज्ञान को भी (भक्षीमहि) प्राप्त करें।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ प्रतर्दनो दैवोदामिः। २-४ असितः काश्यपो देवलो वा। ५, ११ उचथ्यः। ६, ७ ममहीयुः। ८, १५ निध्रुविः कश्यपः। ९ वसिष्ठः। १० सुकक्षः। १२ कविंः। १३ देवातिथिः काण्वः। १४ भर्गः प्रागाथः। १६ अम्बरीषः। ऋजिश्वा च। १७ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः। १८ उशनाः काव्यः। १९ नृमेधः। २० जेता माधुच्छन्दसः॥ देवता—१-८, ११, १२, १५-१७ पवमानः सोमः। ९, १८ अग्निः। १०, १३, १४, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—२-११, १५, १८ गायत्री। त्रिष्टुप्। १२ जगती। १३ बृहती। १४, १५, १८ प्रागाथं। १६, २० अनुष्टुप् १७ द्विपदा विराट्। १९ उष्णिक्॥ स्वरः—२-११, १५, १८ षड्जः। १ धैवतः। १२ निषादः। १३, १४ मध्यमः। १६,२० गान्धारः। १७ पञ्चमः। १९ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मानं प्रार्थयते।

    पदार्थः

    हे सोम जगत्स्रष्टः रसागार परमात्मन् ! (नृचक्षसम्) नृणां द्रष्टारम्, (इन्द्रपीतम्) इन्द्रैः त्वदुपासकैः जीवात्मभिः आस्वादितम्, (स्वर्विदम्) दिव्यप्रकाशस्य मोक्षसुखस्य वा लम्भकम् (त्वा) त्वाम् (वयम्) तवोपासकाः आह्वयामः इति शेषः। वयं त्वत् (प्रजाम्) सद्गुणसन्ततिम् (इषम्)आनन्दरसधारां च। [इषा अद्भिः इति निरुक्तम् (१०।२६)।] (भक्षीमहि) प्राप्नुयाम। [भज सेवायाम्, भ्वादिः, लिङि छान्दसः शपो लुक्] ॥८॥

    भावार्थः

    परमेश्वरं ध्यायं ध्यायमुपासको दिव्यानन्दरसं मोक्षं च प्राप्तुं क्षमते ॥८॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।८।९।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O soul, may we serve thee, the enjoyer of the bliss of emancipation, satisfied with the favour of God, the Seer of mankind with the same eye. May we gain progeny, strength, food and knowledge!

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    Meaning

    All-watching guardian of humanity, omniscient lord of bliss, adored and self-realised by the soul of humanity, we pray for the gift of food and energy, light and knowledge, and all round happiness for all people of the world, your children. (Rg. 9-8-9)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (त्वा) હે સોમ-શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! તું (नृचक्षसम्) મનુષ્યના દ્રષ્ટા-કર્મફળ પ્રદાન માટે અન્તઃસાક્ષી, (इन्द्रपीतम्) આત્માનું પાન-ધારણ કરવા યોગ્ય, (स्वर्विदम्) સુખ પ્રાપ્ત કરાવનાર, (प्रजाम् इषम्) પ્રજારૂપ અને અન્નરૂપ છે. (भक्षीमहि) ભજં-સેવન કરીએ-સ્તુતિમાં લાવીએ-તું જ પ્રજા છે, તું જ અન્ન છે, તું જ અમારું સર્વસ્વ છે. (૮)

     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वराचे वारंवार ध्यान करून उपासक दिव्य आनंद रस व मोक्ष प्राप्त करण्यास समर्थ होतो. ॥८॥

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