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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1435
    ऋषिः - कविर्भार्गवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    29

    प꣡व꣢स्व वृ꣣ष्टि꣢꣫मा सु नो꣣ऽपा꣢मू꣣र्मिं꣢ दि꣣व꣡स्परि꣢꣯ । अ꣣यक्ष्मा꣡ बृ꣢ह꣣ती꣡रिषः꣢꣯ ॥१४३५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प꣡व꣢꣯स्व । वृ꣣ष्टि꣢म् । आ । सु । नः꣣ । अपा꣢म् । ऊ꣣र्मि꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । अ꣣यक्ष्माः꣢ । अ꣣ । यक्ष्माः꣢ । बृ꣣हतीः꣢ । इ꣡षः꣢꣯ ॥१४३५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पवस्व वृष्टिमा सु नोऽपामूर्मिं दिवस्परि । अयक्ष्मा बृहतीरिषः ॥१४३५॥


    स्वर रहित पद पाठ

    पवस्व । वृष्टिम् । आ । सु । नः । अपाम् । ऊर्मिम् । दिवः । परि । अयक्ष्माः । अ । यक्ष्माः । बृहतीः । इषः ॥१४३५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1435
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में जगत्स्रष्टा परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है।

    पदार्थ

    हे सोम ! हे सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ! आप (दिवः परि) उच्च आत्मलोक से (नः) हमारे लिए (अपाम् ऊर्मिम्) दिव्य धाराओं की तरङ्गरूप (वृष्टिम्) वर्षा को (सु आ पवस्व) भली-भाँति चारों ओर से प्रवाहित करो, साथ ही (अयक्ष्माः) नीरोग अर्थात् वासना आदि से रहित (बृहतीः इषः) उच्च महत्त्वाकाञ्क्षाओं को (आ पवस्व) हमारे अन्दर उत्पन्न करो ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे जगदीश्वर अन्तरिक्ष से वर्षा तथा भूमि पर आरोग्यकारी अन्न उत्पन्न करता है, वैसे ही वह हमारे अन्दर आनन्द की वर्षा और उच्च महत्त्वाकाञ्क्षाओं को जन्म दे ॥१॥

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    पदार्थ

    (नः) हे सोम—परमात्मन्! तू हम उपासकों के लिये (वृष्टिम्-आपवस्व) सुखवृष्टि को ले आ—समन्तरूप से प्राप्त करा (अपाम्-ऊर्मिंदिवस्परि सु) हम मुमुक्षुजनों की१ स्तुतितरङ्ग को अमृतधाम में२ पहुँचा, इस प्रकार (बृहतीः-इषः) ऊँची कामनाएँ-कमनीय वस्तुएँ (अयक्ष्माः) रोग से—क्षय से रहित हों॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—कविः (स्तुतिवक्ता उपासक)॥ देवता—पवमानः सोमः (धारारूप में प्राप्त होने वाला शान्तस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥<br>

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    विषय

    सात्त्विक, सर्वोत्तम अन्न

    पदार्थ

    वैदिक संस्कृति का एक सिद्धान्त है जिसे सामान्यभाषा में “जैसा अन्न वैसा मन' इन शब्दों में कहा गया है । उपनिषद् ने इसे ('आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः') इन शब्दों में कहा है कि 'आहार की शुद्धि होने पर अन्तःकरण की शुद्धि होती है, अन्त:करण की शुद्धि में अपने स्वरूप व लक्ष्य का स्मरण रहता है और स्मृति रहने पर वासना-ग्रन्थियों का विनाश हुआ करता है'। इस तत्त्व को जानकर मन्त्र का ऋषि 'कविभार्गव' [तत्त्वद्रष्टा व तेजस्वी] सात्त्विक अन्न के लिए प्रार्थना करता है । वह यह भी समझता है कि 'सर्वोत्तम अन्न' वृष्टि-जन्य है, अतः वृष्टि के लिए प्रार्थना करता हुआ वह कहता है कि -

    हे सोम प्रभो ! (नः) = हमारे लिए (वृष्टिम्) = वृष्टि को (सु) = उत्तम प्रकार से आ चारों ओर [निकामे निकामे] उस-उस इष्ट स्थान में (आपवस्व) = क्षरित कीजिए – बरसाइए । (दिवः) = द्युलोकों से (अपाम् उर्मिम्) = जलों के संघातों को (परि) [ पवस्व ] = टपकाइए । इस प्रकार (अ-यक्ष्मा:) = शरीर को रोगों से आक्रान्त न होने देनेवाले स्वास्थ्यप्रद तथा (बृहती:) = वृद्धि के कारणभूत- हृदय को विशाल बनानेवाले (इषः) = अन्नों को हमें प्राप्त कराइए ।

    भावार्थ

    वृष्टिजलों से उत्पन्न सात्त्विक अन्नों से १. हमारे शरीर नीरोग बनें, और २. हमारे हृदय विशाल हों ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे पवमान सोम, सर्वप्रेरक, सूर्य ! (नः) हमारे प्रति (सु) सुष्ठु, उत्तम रीति से (वृष्टिं) सुखों और जलों की वृष्टि की (आपवस्व) सब ओर से वर्षा करो। और (दिवः) द्यौलोक और मूर्धादेश से (अपां) बलों, प्रज्ञानों और कर्मों की (ऊर्मिम्) तरङ्ग या ऊपर उठने वाली परम्परा को (परि-पवस्व) सब ओर से प्रेरित कर। और (बृहती) पुष्टिकारक, अति अधिक (अयक्ष्माः) यक्ष्म अर्थात् चिपट जानेहारे सूक्ष्म रोग कीटों से रहित (इषः) अन्नों और इष्टदेव और विद्वानों की, उत्तम संगति के नाशक दुर्विचारों से रहित मन की सत्कामनाओं को प्रेरित करो।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ कविर्भार्गवः। २, ९, १६ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ३ असितः काश्यपो देवलो वा। ४ सुकक्षः। ५ विभ्राट् सौर्यः। ६, ८ वसिष्ठः। ७ भर्गः प्रागाथः १०, १७ विश्वामित्रः। ११ मेधातिथिः काण्वः। १२ शतं वैखानसाः। १३ यजत आत्रेयः॥ १४ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १५ उशनाः। १८ हर्यत प्रागाथः। १० बृहद्दिव आथर्वणः। २० गृत्समदः॥ देवता—१, ३, १५ पवमानः सोमः। २, ४, ६, ७, १४, १९, २० इन्द्रः। ५ सूर्यः। ८ सरस्वान् सरस्वती। १० सविता। ११ ब्रह्मणस्पतिः। १२, १६, १७ अग्निः। १३ मित्रावरुणौ। १८ अग्निर्हवींषि वा॥ छन्दः—१, ३,४, ८, १०–१४, १७, १८। २ बृहती चरमस्य, अनुष्टुप शेषः। ५ जगती। ६, ७ प्रागाथम्। १५, १९ त्रिष्टुप्। १६ वर्धमाना पूर्वस्य, गायत्री उत्तरयोः। १० अष्टिः पूर्वस्य, अतिशक्वरी उत्तरयोः॥ स्वरः—१, ३, ४, ८, ९, १०-१४, १६-१८ षड्जः। २ मध्यमः, चरमस्य गान्धारः। ५ निषादः। ६, ७ मध्यमः। १५, १९ धैवतः। २० मध्यमः पूर्वस्य, पञ्चम उत्तरयोः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्रादौ जगत्स्रष्टा परमेश्वरः प्रार्थ्यते।

    पदार्थः

    हे सोम ! हे सर्वान्तर्यामिन् परमेश्वर ! त्वम् (दिवः परि) उच्चात् आत्मलोकात् (नः) अस्मभ्यम् (अपाम् ऊर्मिम्) दिव्यधाराणां तरङ्गरूपाम् (वृष्टिम्) वर्षाम् (सु आ पवस्व)सम्यक् समन्तात् प्रवाहय। किञ्च (अयक्ष्माः) नीरोगाः, वासनादिरहिताः इत्यर्थः (बृहतीः इषः) महतीः आकाङ्क्षाः (आ पवस्व) अस्मासु आस्रावय, जनयेत्यर्थः ॥१॥

    भावार्थः

    यथा जगदीश्वरोऽन्तरिक्षाद् वृष्टिम् भूमावारोग्यकराण्यन्नानि चोत्पादयति तथैव सोऽस्मास्वानन्दवृष्टिमुत्कृष्टा महत्त्वाकाङ्क्षाश्च जनयेत् ॥१॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, pour down the rain upon us, pour a wave of water from the sky, and plenteous store of food free from pulmonary consumption!

    Translator Comment

    See verse 352.

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    Meaning

    Soma, lord of peace and plenty, give us holy showers of waters, wave on wave of the rain, and give us abundant food, energy and knowledge free from pollution and negativities. (Rg. 9-49-1)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (नः) હે સોમ-પરમાત્મન્ ! તું અમારા-ઉપાસકોને માટે (वृष्टिम् आपवस्व) સુખ વૃષ્ટિને લઈ આવ-સમગ્રરૂપથી પ્રાપ્ત કરાવ. (अपाम् ऊर्मिदिवस्परि सु) અમારા-મુમુક્ષુજનોનાં સ્તુતિ તરંગોને અમૃતધામમાં પહોંચાડ, આ રીતે (बृहतीः इषः) શ્રેષ્ઠ કામનાઓ-ઇચ્છનીય વસ્તુઓ (अयक्ष्माः) રોગથીક્ષયથી રહિત બને. (૧)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसा जगदीश्वर अंतरिक्षातून वृष्टी व भूमीवर आरोग्यकारी अन्न उत्पन्न करतो, तसेच तो आमच्यामध्ये आनंदाचा वर्षाव व उच्च महत्त्वाकांक्षांना जन्म देतो. ॥१॥

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