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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1516
    ऋषिः - सौभरि: काण्व: देवता - अग्निः छन्दः - बृहती स्वरः - मध्यमः काण्ड नाम -
    30

    य꣢स्मा꣣द्रे꣡ज꣢न्त कृ꣣ष्ट꣡य꣢श्च꣣र्कृ꣡त्या꣢नि कृण्व꣣तः꣢ । स꣣हस्रसां꣢ मे꣣ध꣡सा꣢ताविव꣣ त्म꣢ना꣣ग्निं꣢ धी꣣भि꣡र्न꣢मस्यत ॥१५१६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य꣡स्मा꣢꣯त् । रे꣡ज꣢꣯न्त । कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । च꣣र्कृ꣡त्या꣢नि । कृ꣣ण्वतः꣢ । स꣣हस्रसा꣢म् । स꣣हस्र । सा꣢म् । मे꣣ध꣡सा꣢तौ । मे꣣ध꣢ । सा꣣तौ । इव । त्म꣡ना꣢꣯ । अ꣣ग्नि꣢म् । धी꣣भिः꣢ । न꣣मस्यत ॥१५१६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्माद्रेजन्त कृष्टयश्चर्कृत्यानि कृण्वतः । सहस्रसां मेधसाताविव त्मनाग्निं धीभिर्नमस्यत ॥१५१६॥


    स्वर रहित पद पाठ

    यस्मात् । रेजन्त । कृष्टयः । चर्कृत्यानि । कृण्वतः । सहस्रसाम् । सहस्र । साम् । मेधसातौ । मेध । सातौ । इव । त्मना । अग्निम् । धीभिः । नमस्यत ॥१५१६॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1516
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और राजा का विषय है।

    पदार्थ

    (चर्कृत्यानि) अतिशय करने योग्य कर्मों को (कृण्वतः) करते हुए (यस्मात्) जिस जगदीश्वर वा राजा से (कृष्टयः) दुष्ट मनुष्य (रेजन्त) भय के मारे काँपते हैं, उस (सहस्रसाम्) सहस्र गुणों वा सहस्र पदार्थों के दाता (अग्निम्) अग्रनायक, जगदीश्वर वा राजा को, आप लोग (त्मना) स्वयं (धीभिः) बुद्धियों और कर्मों से (सपर्यत) पूजित वा सत्कृत करो, (मेधसातौ इव) जैसे यज्ञ में (अग्निम्) यज्ञाग्नि को याज्ञिक जन (धीभिः) आहुति-प्रदान आदि कर्मों से सत्कृत करते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे न्यायकारी परमेश्वर से वैसे ही न्यायकारी राजा से दण्ड के भय से पापी लोग काँपें। जैसे सज्जनों को परमेश्वर सहस्र गुण व बल प्रदान करता है, वैसे ही राजा राष्ट्रभक्तों को सहस्र लाभ प्रदान करे। प्रजाजन भी परमेश्वर के भक्त जैसे परमेश्वर की पूजा करते हैं वा याज्ञिक लोग जैसे यज्ञाग्नि का हवियों से सत्कार करते हैं, वैसे ही अपने राजा का सत्कार करें ॥२॥

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    पदार्थ

    (चर्कृत्यानि कृण्वतः-यस्मात्) सुन्दर या यथायोग्य कर्मफल रूप पुरस्कार या दण्ड प्रदान कर्मों के करते हुए जिस परमात्मा से (कृष्टयः-रेजन्त) मनुष्य१ भय करते२ हैं (सहस्रसाम्) बहुत सम्भाजक (मेधसातौ) अध्यात्मयज्ञ में (त्मना) आत्मभाव से परमात्मा को (धीभिः) ध्यान धारणा समाधियों से३ या स्तुतिवाणियों से४ (नमस्यत) नमस्कार करो॥२॥

    विशेष

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    विषय

    कर्मयोगी बनकर चमकें

    पदार्थ

    (यस्मात्) = क्योंकि (चकृत्यानि) = अत्यन्त उत्तम कर्मों को या प्रभु-स्तवनों को [चर्कृति:= भृशमुत्तमा क्रिया – द०, praise— Apte] (कृण्वतः) = कृण्वन्तः = करते हुए (कृष्टयः) = उत्पादक काम करनेवाले मनुष्य (रेजन्ते) =[रेज् to shine] =चमकते हैं अथवा शत्रुओं को हिला देते हैं [रेज to shake], कामादि को कम्पित कर देते हैं। (मेधसातौ इव) = पवित्र वस्तुओं की प्राप्ति के निमित्त ही मानो यह जीवन मिला है। इस प्रकार (सहस्त्रसाम्) = अनन्त ऐश्वर्यों के प्राप्त करानेवाले (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को (त्मना) = स्वयं इस मन के द्वारा (धीभिः) = प्रज्ञानों व कर्मों से (नमस्यत) = पूजित करो ।

    जब मनुष्य यह समझ लेता है कि चमकता वही है, जो उत्तम कर्म करता है या प्रभु-स्तवन में लगता है तब वह इस जीवन को भोग भोगने की भूमि नहीं समझता । वह जीवन को कर्मभूमि समझता है और निश्चय करता है कि उसे इस जीवन में पवित्र वस्तुओं का सम्पादन करना है । उसके दृष्टिकोण में जीवन 'मेधसाति' है । पवित्र वस्तुओं की प्राप्ति के निमित्त ही वह प्रज्ञानों व कर्मों से प्रभु की उपासना करता है । वे प्रभु ही तो अन्ततः सब ऐश्वर्यों को प्राप्त करानेवाले हैं । इस प्रकार जीवन को उत्तम प्रज्ञानों, कर्मों व उपासना में बिताता हुआ यह ‘सोभरि' बनता है—जिसने जीवन का 'सु-भरण' किया है ।

    भावार्थ

    कर्त्तव्य कर्मों को करते हुए हम संसार में चमकनेवाले बनें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    (चर्कृत्यानि) समस्त जगत् के कर्तव्य कर्म (कृण्वतः) कराने हारे (यस्मात्) जिससे (कृष्टयः) मनुष्य (रेजन्त) कांपते हैं, भय अनुभव करते हैं. (सहस्रसां) सहस्रों का दान देने हारे उस (अग्निम्) परमेश्वर को (मेघसातौ) ज्ञानबल और मेधा को प्राप्त करने के लिये (धीभिः) अपनी ध्यानधारणावाली बुद्धियों और कर्मों से (त्मना) अपने आत्मा द्वारा (नमस्यत) उपासना करो।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१,९ प्रियमेधः। २ नृमेधपुरुमेधौ। ३, ७ त्र्यरुणत्रसदस्यू। ४ शुनःशेप आजीगर्तिः। ५ वत्सः काण्वः। ६ अग्निस्तापसः। ८ विश्वमना वैयश्वः। १० वसिष्ठः। सोभरिः काण्वः। १२ शतं वैखानसाः। १३ वसूयव आत्रेयाः। १४ गोतमो राहूगणः। १५ केतुराग्नेयः। १६ विरूप आंगिरसः॥ देवता—१, २, ५, ८ इन्द्रः। ३, ७ पवमानः सोमः। ४, १०—१६ अग्निः। ६ विश्वेदेवाः। ९ समेति॥ छन्दः—१, ४, ५, १२—१६ गायत्री। २, १० प्रागाथं। ३, ७, ११ बृहती। ६ अनुष्टुप् ८ उष्णिक् ९ निचिदुष्णिक्॥ स्वरः—१, ४, ५, १२—१६ षड्जः। २, ३, ७, १०, ११ मध्यमः। ६ गान्धारः। ८, ९ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनरपि परमात्मनृपत्योर्विषयमाह।

    पदार्थः

    (चर्कृत्यानि) भृशं कर्तुं योग्यानि कर्माणि [करोतेर्यङ्लुगन्तात् क्तः, ततोऽर्हार्थे यत्।] (कृण्वतः) कुर्वतः (यस्मात्) जगदीश्वरात् नृपतेर्वा (कृष्टयः) दुष्टा जनाः (रेजन्त) अरेजन्त, भयात् कम्पन्ते। [भ्यसते रेजते इति भयवेपनयोः। निरु० ३।२१। लडर्थे लुङ्, अडागमाभावश्छान्दसः।] (सहस्रसाम्) सहस्रगुणानां सहस्रवस्तूनां वा दातारम् (अग्निम्) अग्रनायकं जगदीश्वरं नृपतिं वा, यूयम् (त्मना) आत्मना (धीभिः) बुद्धिभिः कर्मभिश्च (सपर्यत) परिचरत, (मेधसातौ इव) यथा यज्ञे (अग्निम्) यज्ञाग्निम् याज्ञिकाः जनाः (धीभिः) हविष्प्रदानादिभिः कर्मभिः सपर्यन्ति तद्वत् ॥२॥ अत्रोपमालङ्कारः ॥२॥

    भावार्थः

    यथा न्यायकारिणः परमेश्वरात् तथैव न्यायकारिणो नृपतेर्दण्डभयाद् दुष्कर्माणः कम्पन्ताम्। यथा सज्जनेभ्यः परमेश्वरः सहस्रं गुणान् बलानि वा ददाति तथा राष्ट्रभक्तेभ्यो राजा सहस्रशो लाभान् प्रयच्छेत्। प्रजाजना अपि परमेशभक्ताः परमेशमिव, याज्ञिकाश्च यज्ञाग्निमिव स्वकीयं राजानं सत्कुर्युः ॥२॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Men are afraid of God, the Giver of thousands, and the Administrator of the universe. For the acquisition of knowledge and the advancement of intellect, worship Him through soul, with the aid of Yogic practices.

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    Meaning

    From that gift of light the children of earth shine and continue doing their daily duties. O people, do service in homage to Agni, giver of light and a thousand other gifts as in yajnic generosity. Do so with your heart and soul, adore him sincerely by thought and action. (Rg. 8-103-3)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (चर्कृत्यानि कृण्वतः यस्मात्) સુંદર અથવા યથાયોગ્ય કર્મફળરૂપ પુરસ્કાર અથવા દંડ પ્રદાન કર્મો કરતાં જે પરમાત્માથી (कृष्टयः रेजन्त) મનુષ્ય ભય પામે છે. (सहस्रसाम्) બહુજ સંભાજક અનંત ઐશ્વર્યનો દાતા (मेधसातौ) અધ્યાત્મયજ્ઞમાં (त्मना) આત્મભાવથી પરમાત્માને (धीभिः) ધ્યાન, ધારણા, સમાધિઓથી અથવા સ્તુતિ વાણીઓથી (नमस्यत) નમસ્કાર કરો. (૨)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसे न्यायी परमेश्वराला पापी लोक घाबरतात. तसेच न्यायी राजाला दंडाच्या भीतीने पापी लोक घाबरतात जसा परमेश्वर सज्जनांना सहस्र गुण व बल प्रदान करतो तसेच राजाने राष्ट्रभक्तांना सहस्र लाभ प्रदान करावेत. परमेश्वराचे भक्त परमेश्वराची जशी पूजा करतात. किंवा याज्ञिक लोक जसे यज्ञाग्नीचा हवीद्वारे सत्कार करतात, तसेच प्रजेने आपल्या राजाचा सत्कार करावा. ॥२॥

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