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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1525
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    22

    आ꣡ नो꣢ अग्ने र꣣यिं꣡ भ꣢र सत्रा꣣सा꣢हं꣣ व꣡रे꣢ण्यम् । वि꣡श्वा꣢सु पृ꣣त्सु꣢ दु꣣ष्ट꣡र꣢म् ॥१५२५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ꣢ । नः꣣ । अग्ने । रयि꣢म् । भ꣣र । स꣡त्रासाह꣢म् । स꣣त्रा । सा꣡ह꣢꣯म् । व꣡रे꣢꣯ण्यम् । वि꣡श्वा꣢꣯सु । पृ꣣त्सु꣢ । दु꣣ष्ट꣡र꣢म् । दुः꣣ । त꣡र꣢꣯म् ॥१५२५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यम् । विश्वासु पृत्सु दुष्टरम् ॥१५२५॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आ । नः । अग्ने । रयिम् । भर । सत्रासाहम् । सत्रा । साहम् । वरेण्यम् । विश्वासु । पृत्सु । दुष्टरम् । दुः । तरम् ॥१५२५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1525
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में फिर जगदीश्वर से प्रार्थना है।

    पदार्थ

    हे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! आप (नः) हमारे लिए (सत्रासाहम्) एक साथ अनेक विपदाओं को दूर करनेवाले, (वरेण्यम्) वरणीय, विश्वासु पृत्सु) सब सङ्ग्रामों में (दुष्टरम्) दुस्तर, अच्छेद्य (रयिम्) वीरतारूप ऐश्वर्य को (आभर) प्रदान करो ॥३॥

    भावार्थ

    परमवीर परमेश्वर का ध्यान करके हम वीरगणों में अग्रगण्य होते हुए सब विपदाओं तथा सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को पराजित कर देवें ॥२॥

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    पदार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन्! तू (नः) हमारे लिये (सत्रासाहं वरेण्यं रयिम्) सब को४ सुगमता से सहन करनेवाले वरणीय अध्यात्म ऐश्वर्य को (विश्वासु पृत्सु) सारी संघर्ष स्थितियों में५ (आभर) आभरित कर॥२॥

    विशेष

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    विषय

    वह सदा वरणीय शक्ति

    पदार्थ

    हे (अग्ने) = सर्वशत्रु संहारक रुद्ररूप अग्ने! आप (न:) = हमें (आ) = सब प्रकार से (रयिम्) = उस शक्ति को [वीर्यं वै रयिः–श० १३.४.२.१३] (भर) = प्राप्त कराइए, जो १. (सत्रासाहम्) - सदा शत्रुओं का पराभव करनेवाली

    है, २. (वरेण्यम्) = वरणीय है, चाहने योग्य है, ३. (विश्वासु पृत्सु) = सब संग्रामों में शत्रुओं से (दुष्टरम्) = दुस्तर है। रुद्र के सब नामों का उल्लेख करके शतपथब्राह्मण [६.१.३.१८] में कहा है कि 'तान्येतानि अष्टौ अग्निरूपाणि'=ये आठों रुद्र आदि अग्नि के रूप हैं। रुद्र शत्रुओं का संहार करके शिव-कल्याण करनेवाले हैं। इस अग्नि-संहारक रुद्ररूप अग्नि से गोतम प्रार्थना करता है कि 'आप हमें वह शक्ति प्राप्त कराइए जो हमें सदा रोगों तथा काम-क्रोधादि शत्रुओं का पराभव करने में समर्थ बनाती है अतएव हमसे सदा वरणीय होती है, जिस शक्ति को न तो कीटाणुओं [germs] और न ही आसुरवृत्तियों के आक्रमण पराभूत कर पाते हैं। दूसरे शब्दों में जिस शक्ति से स्वस्थ रहकर हम गोतम=प्रशस्तेन्द्रिय होते हैं और काम, क्रोध तथा लोभ को कोसों दूर भगानेवाले 'राहूगण' बनते हैं।'

    भावार्थ

    प्रभु-स्तवन से हम सदा विजयशील, वरणीय, वासनाओं का वारण करनेवाली शक्ति का लाभ करें ।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे (अग्ने) ज्ञानवन् ! आप (नः) हमारे लिये (वरेण्यं) सब से श्रेष्ठ (सम्रासाहं) सब विपत्तियों को दूर करने हारे (रयिं) बल और अन्न (श्राभर) प्राप्त करावें जो (विश्वासु) सब (पृत्सु) मनुष्यों में या संग्रामों में (दुस्तरं) दुस्तर अर्थात् जिसका कोई मुकाबला न कर सके और न समाप्त कर सके ऐसे हो।

    टिप्पणी

    पृतनाशब्दस्य पदादेशः। पद्दन्नो० इति [ पा० ६। १। ६३ ] सूत्रे मांस पृत्स्नूनामुपसंख्यानमिति वातिंकम्। पृतनेति मनुष्यनाम [ नि० २। ३ ] संग्रामनाम च [ नि० २। १७ ]।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१,९ प्रियमेधः। २ नृमेधपुरुमेधौ। ३, ७ त्र्यरुणत्रसदस्यू। ४ शुनःशेप आजीगर्तिः। ५ वत्सः काण्वः। ६ अग्निस्तापसः। ८ विश्वमना वैयश्वः। १० वसिष्ठः। सोभरिः काण्वः। १२ शतं वैखानसाः। १३ वसूयव आत्रेयाः। १४ गोतमो राहूगणः। १५ केतुराग्नेयः। १६ विरूप आंगिरसः॥ देवता—१, २, ५, ८ इन्द्रः। ३, ७ पवमानः सोमः। ४, १०—१६ अग्निः। ६ विश्वेदेवाः। ९ समेति॥ छन्दः—१, ४, ५, १२—१६ गायत्री। २, १० प्रागाथं। ३, ७, ११ बृहती। ६ अनुष्टुप् ८ उष्णिक् ९ निचिदुष्णिक्॥ स्वरः—१, ४, ५, १२—१६ षड्जः। २, ३, ७, १०, ११ मध्यमः। ६ गान्धारः। ८, ९ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनर्जगदीश्वरं प्रार्थयते।

    पदार्थः

    हे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! त्वम् (नः) अस्मभ्यम् (सत्रासाहम्) युगपदनेकासां विपदां विदारकम्, (वरेण्यम्) वरणीयम्, (विश्वासु पृत्सु) सर्वेषु संग्रामेषु (दुष्टरम्) दुस्तरम्, अनाच्छेद्यम् (रयिम्) वीरतारूपम् ऐश्वर्यम् (आ भर) आहर, प्रदेहि ॥२॥२

    भावार्थः

    परमवीरं परमेश्वरं ध्यात्वा वयं वीरगणाग्रगण्याः सन्तः सर्वा विपदः सर्वांश्चाभ्यन्तरान् बाह्यांश्च शत्रून् पराजयेमहि ॥२॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, grant us the wealth of patience, that overcomes poverty, is worthy of our choice and invincible in all struggles!

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    Meaning

    Agni, lord of wealth and power, bless us with cherished wealth and power, formidable and invincible in all the battles of life, overcoming all and ever. (Rg. 1-79-8)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अग्ने) હે અગ્રણી પરમાત્મન્ ! તું (नः) અમારે માટે (सत्रासाहं वरेण्यं रयिम्) સર્વને સરળતાથી સહન કરનાર વરણીય અધ્યાત્મ ઐશ્વર્યને (विश्वासु पृत्सु) સમસ્ત સંઘર્ષ અવસ્થાઓમાં (आभर) આભરિત - પરિપૂર્ણ કર. (૨)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमवीर परमेश्वराचे ध्यान करून आम्ही वीरांमध्ये प्रमुख होऊन सर्व विपदा व सर्व आंतरिक व बाह्य शत्रूंना पराजित करावे. ॥२॥

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