Loading...

सामवेद के मन्त्र

  • सामवेद का मुख्य पृष्ठ
  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1551
    ऋषिः - उशना काव्यः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    33

    अ꣡धा꣣ त्वं꣢꣫ हि न꣣स्क꣢रो꣣ वि꣡श्वा꣢ अ꣣स्म꣡भ्य꣢ꣳ सुक्षि꣣तीः꣢ । वा꣡ज꣢द्रविणसो꣣ गि꣡रः꣢ ॥१५५१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣡ध꣢꣯ । त्वम् । हि । नः꣣ । क꣡रः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । सु꣣क्षितीः꣢ । सु꣣ । क्षितीः꣢ । वा꣡ज꣢꣯द्रविणसः । वा꣡ज꣢꣯ । द्र꣣विणसः । गि꣡रः꣢꣯ ॥१५५१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अधा त्वं हि नस्करो विश्वा अस्मभ्यꣳ सुक्षितीः । वाजद्रविणसो गिरः ॥१५५१॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अध । त्वम् । हि । नः । करः । विश्वाः । अस्मभ्यम् । सुक्षितीः । सु । क्षितीः । वाजद्रविणसः । वाज । द्रविणसः । गिरः ॥१५५१॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1551
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना है।

    पदार्थ

    हे अग्ने ! हे विश्वनायक जगदीश ! (अध) अब (त्वं हि) आप (नः) हमारी (विश्वाः गिरः) सब वाणियों को (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (सुक्षितीः) उत्तम निवास देनेवाली और (वाजद्रविणसः) बल रूप धन से युक्त अर्थात् बलवती (करः) कर दो ॥३॥

    भावार्थ

    श्रद्धा के साथ परमात्मा की उपासना करने से ऐसा वाणी का बल पाया जा सकता है, जो श्रोताओं के मन पर प्रभाव उत्पन्न करे ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    पदार्थ

    (अध) अनन्तर—और (त्वं हि) तू ही (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (नः-गिरः) हमारी स्तुतिवाणियों को (सुक्षितीः) शोभन भूमि वाली५ (वाज-द्रविणसः) अमृत अन्नभोगों६ धन फल वाली (करः) कर—बना॥३॥

    विशेष

    <br>

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    उशाना का स्तवन

    पदार्थ

    परमात्म-चिन्तन करता हुआ उशना अनुभव करता और कहता है कि हे प्रभो ! (अध) = अब (हि) = निश्चय से (त्वम्) = आप ही (न:) = हमें (विश्वाः) = सम्पूर्ण (सुक्षितीः) = उत्तम निवास स्थानों को (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (कर:) = प्राप्त कराते हो । हमारे कर्मों व योग्यताओं के अनुसार जैसा भी लोक हमारे लिए हितकर होता है कृपा करके प्रभु हमें उस उस उत्तम लोक में जन्म देते हैं। उन लोकों में जन्म देकर हे प्रभो! आप ही (वाजद्रविणस:) = ज्ञानरूप धन से परिपूर्ण (गिरः) = वेदवाणियों को (नः) = हमारे लिए (करः) = प्राप्त कराते हैं । एवं, प्रभु हमें उत्तम लोकों में जन्म देकर उत्तम ज्ञान प्राप्त करानेवाले हैं। प्राकृतिक साधनों का संकेत 'सुक्षिती: ' शब्द कर रहा है और अध्यात्म साधनों का उल्लेख ‘गिरः’ शब्द द्वारा हुआ है । इस प्रकार प्रभु ने हमारे भौतिक व अध्यात्म दोनों उन्नतियों की सुव्यवस्था कर दी है। उत्तम निवास-भूमियाँ हमारी सब भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए समुचित साधन उपस्थित कर देती हैं और ये वेदवाणियाँ हमारी आध्यात्मिक उन्नति का समुचित मार्ग हमें प्रदर्शित कर रही हैं। हम इन भूमियों से प्राप्त कराये गये पदार्थों का ठीक प्रयोग करते हुए और वेदवाणियों द्वारा अपने ज्ञान को बढ़ाते हुए ऐहिक व आमुष्मिक उन्नति करने में समर्थ होते हैं|

    भावार्थ

    हे प्रभो! आप ही उत्तम लोकों व उत्तम ज्ञानों को देनेवाले हैं।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    missing

    भावार्थ

    (अध) और हे परमात्मन् ! (हि) निश्चय से (नः) हमारे लिये (त्वं) आपने (नः) हमारी (सुक्षितीः) उत्तम उत्तम निवासभूमियों और (वाजद्रविणसः) ज्ञान को बढ़ाने हारी, ज्ञानसम्पन्न (गिरः) इन वेदमयी वाणियों को (अस्मभ्यं हि) हमारे ही लिये (करः) बनाते, प्रकट करते, उपदेश करते हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१, ११ गोतमो राहूगणः। २, ९ विश्वामित्रः। ३ विरूप आंगिरसः। ५, ६ भर्गः प्रागाथः। ५ त्रितः। ३ उशनाः काव्यः। ८ सुदीतिपुरुमीळ्हौ तयोर्वान्यतरः । १० सोभरिः काण्वः। १२ गोपवन आत्रेयः १३ भरद्वाजो बार्हस्पत्यो वीतहव्यो वा। १४ प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः, अथर्वाग्नी गृहपति यविष्ठौ ससुत्तौ तयोर्वान्यतरः॥ अग्निर्देवता। छन्दः-१-काकुभम्। ११ उष्णिक्। १२ अनुष्टुप् प्रथमस्य गायत्री चरमयोः। १३ जगती॥ स्वरः—१-३, ६, ९, १५ षड्जः। ४, ७, ८, १० मध्यमः। ५ धैवतः ११ ऋषभः। १२ गान्धरः प्रथमस्य, षडजश्चरमयोः। १३ निषादः श्च॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मानं प्रार्थयते।

    पदार्थः

    हे अग्ने ! हे विश्वनायक जगदीश ! (अध) अथ (त्वं हि) त्वं किल (नः) अस्माकम् (विश्वाः) गिरः सर्वाः वाचः (अस्मभ्यम्) अस्मदर्थम् (सुक्षितीः) सुनिवासप्रदाः, (वाजद्रविणसः) वाजो बलमेव द्रविणः धनं यासां ताश्च (करः) कुरु [करः इति करोतेर्लेटि मध्यमैकवचने रूपम्] ॥३॥

    भावार्थः

    श्रद्धया परमात्मोपासनेन तादृशं वाग्बलं प्राप्तुं शक्यते यच्छ्रोतॄणां मनसि प्रभावं जनयेत् ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, so then dost Thou prepare for us all happy habitations, and reveal for us the Vedas, the augmenters of knowledge!

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    And you alone will provide happy homes and peaceful establishment for all our people and bless us with vitality, power, wealth and victory in response to our prayer. (Rg. 8-84-6)

    इस भाष्य को एडिट करें

    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अधः) અનન્તર-અને (त्वं हि) તું જ (अस्मभ्यम्) અમારે માટે (नः गिरः) અમારી સ્તુતિ વાણીઓને (सुक्षितीः) શોભન ભૂમિ વાળી (वाज द्रविणसः) અમૃત અન્નભોગો ધન ફળ વાળી (करः) કર બનાવ. (૩)
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    श्रद्धेने परमात्म्याची उपासना करण्याने वाणीचे बल असे वाढते, की ज्यामुळे श्रोत्यांच्या मनावर प्रभाव पडतो. ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top