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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1601
    ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    35

    ऊ꣣र्ध्व꣡स्ति꣢ष्ठा न ऊ꣣त꣢ये꣣ऽस्मि꣡न्वाजे꣢꣯ श꣢त꣣क्र꣡तो꣢ । स꣢म꣣न्ये꣡षु꣢ ब्रवावहै ॥१६०१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऊ꣣र्ध्वः꣢ । ति꣣ष्ठ । नः । ऊत꣡ये꣢ । अ꣢स्मि꣢न् । वा꣡जे꣢꣯ । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । स꣢म् । अ꣣न्ये꣡षु꣢ । अ꣣न् । ये꣡षु꣢꣯ । ब्र꣣वावहै ॥१६०१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतयेऽस्मिन्वाजे शतक्रतो । समन्येषु ब्रवावहै ॥१६०१॥


    स्वर रहित पद पाठ

    ऊर्ध्वः । तिष्ठ । नः । ऊतये । अस्मिन् । वाजे । शतक्रतो । शत । क्रतो । सम् । अन्येषु । अन् । येषु । ब्रवावहै ॥१६०१॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1601
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 3; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अब परमेश्वर को संबोधन करते हैं।

    पदार्थ

    हे (शतक्रतो) अनन्त ज्ञानी और अनन्त कर्मों को करनेवाले इन्द्र परमात्मन् ! आप (अस्मिन् वाजे) इस देवासुरसङ्ग्राम में (नः ऊतये) हमारी रक्षा के लिए (ऊर्ध्वः) सजग (तिष्ठ) रहो।(अन्येषु) दूसरे अवसरों पर भी, आप और मैं (संब्रवावहै)आपस में अन्तरङ्ग संलाप किया करें ॥३॥

    भावार्थ

    जब-जब बाहरी या आन्तरिक देवासुर सङ्ग्राम उपस्थित होते हैं, तब-तब परमेश्वर-विश्वास को अपने अन्दर बलवान् करके, आत्मोद्बोधन पाकर सब विघ्नों को विफल करके विजय पानी चाहिए ॥३॥

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    पदार्थ

    (शतक्रतो) हे बहुत प्रज्ञान कर्म वाले परमात्मन्! तू (नः-ऊतये) हमारी रक्षा के लिये (अस्मिन्-वाजे) इस काम क्रोधादि संघर्ष में२ (ऊर्ध्वः-तिष्ठ) हमारे ऊपर विराजमान रह (समन्येषु) (ब्रवावहै) यह सम्यक् प्रार्थना करता हूँ३॥३॥

    विशेष

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    विषय

    प्रभु के साथ वार्तालाप

    पदार्थ

    पिछले मन्त्र में प्रभु ने शुनः शेप को वीर= शत्रुओं को कम्पित करनेवाला कहा था, अत: ‘शुन:शेप' प्रभु से कहता है कि हे शतक्रतो-अनन्त प्रज्ञान व कर्मवाले प्रभो ! अस्मिन् वाजे=इस संग्राम में— कामादि शत्रुओं से चल रहे युद्ध में नः ऊतये हमारी रक्षा के लिए ऊर्ध्वः तिष्ठ-आप हमारे ऊपर स्थित होते हैं। आपकी छत्रछाया में ही तो हम विजय पा सकते हैं। आपका वरद हस्त हमपर न हो तो विजय सम्भव नहीं? इस युद्ध में मैंने आपकी कृपा से विजय पायी । मेरी प्रार्थना यह है कि अन्येषु=अन्य संग्रामों में भी हम संब्रावहै- मिलकर बातचीत कर सकें। मैं हृदयस्थ आपके मन्त्र को सूनूँ और तदनुसार ही कार्य करता हुआ विजय पानेवाला बनूँ।

    हे प्रभो! जब-जब संग्राम का अवसर हो तब-तब मैं आपसे संलाप करनेवाला बनूँ और आपके निर्देश को जान पाऊँ और उसी मार्ग पर चलता हुआ सचमुच 'राधानां पति'=सफलता का स्वामी होऊँ ।

    भावार्थ

    हमें विजय सदा प्रभु-कृपा से ही प्राप्त होती है। हम हृदयस्थ प्रभु से संवाद करनेवाले बनें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (शतक्रतो) शत प्रज्ञानों से युक्त या सैकड़ों कर्म करने हारे (इन्द्र) आचार्य ! (अस्मिन्) इस (वाजे) यज्ञ में (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिये आप (ऊर्ध्वः) हमारे ऊपर सदा (तिष्ठ) विराजमान रहें (अन्येषु) हम अन्य अवसरों पर भी (सं ब्रवावहै) परस्पर सत्संग कर ज्ञान लिया और दिया करें। यहां इन्द अर्थात् आत्मा का गुरु परमात्मा है। “कस्य ब्रह्मवासि भवतः” , “इन्दस्य ब्रह्मचार्यसि” इत्यादि विधानों से इन्द्र ही गुरुस्थानीय है।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१, ८, १८ मेध्यातिथिः काण्वः। २ विश्वामित्रः। ३, ४ भर्गः प्रागाथः। ५ सोभरिः काण्वः। ६, १५ शुनःशेप आजीगर्तिः। ७ सुकक्षः। ८ विश्वकर्मा भौवनः। १० अनानतः। पारुच्छेपिः। ११ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः १२ गोतमो राहूगणः। १३ ऋजिश्वा। १४ वामदेवः। १६, १७ हर्यतः प्रागाथः देवातिथिः काण्वः। १९ पुष्टिगुः काण्वः। २० पर्वतनारदौ। २१ अत्रिः॥ देवता—१, ३, ४, ७, ८, १५—१९ इन्द्रः। २ इन्द्राग्नी। ५ अग्निः। ६ वरुणः। ९ विश्वकर्मा। १०, २०, २१ पवमानः सोमः। ११ पूषा। १२ मरुतः। १३ विश्वेदेवाः १४ द्यावापृथिव्यौ॥ छन्दः—१, ३, ४, ८, १७-१९ प्रागाथम्। २, ६, ७, ११-१६ गायत्री। ५ बृहती। ९ त्रिष्टुप्। १० अत्यष्टिः। २० उष्णिक्। २१ जगती॥ स्वरः—१, ३, ४, ५, ८, १७-१९ मध्यमः। २, ६, ७, ११-१६ षड्जः। ९ धैवतः १० गान्धारः। २० ऋषभः। २१ निषादः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमेश्वरं सम्बोधयति।

    पदार्थः

    हे (शतक्रतो) अनन्तप्रज्ञ अनन्तकर्मन् इन्द्र परमात्मन् ! त्वम्(अस्मिन् वाजे) एतस्मिन् देवासुरसंग्रामे (नः ऊतये) अस्माकं रक्षायै (ऊर्ध्वः) जागरूकः (तिष्ठ) भव। (अन्येषु)इतरेष्वपि अवसरेषु त्वं च अहं च (संब्रवावहै) परस्परम् अन्तरङ्गं संलापं कुर्यावः ॥३॥२

    भावार्थः

    यदा यदा बाह्या आन्तरा वा देवासुरसंग्रामा उपतिष्ठन्ते तदा तदा परमेश्वरविश्वासं स्वात्मनि सबलं कृत्वाऽऽत्मोद्बोधनं प्राप्य सर्वानन्तरायान् विफलीकृत्य विजयः प्राप्तव्यः ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Lord of a hundred powers, in this life’s struggle against lust and anger, may Thou aid us for our protection. In all other struggles may we follow Thy Vedic injunctions.

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    Meaning

    Indra, hero of a hundred great acts of yajnic creation, rise and stay high for our defence and protection in this battle of life. And we would sing your praises in prayer with joy in other battles too together with you. (Rg. 1-30-6)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (शतक्रतो) હે બહુજ પ્રજ્ઞાન કર્મવાળા પરમાત્મન્ ! તું (नः ऊतये) અમારી રક્ષા માટે (अस्मिन् वाजे) એ કામ, ક્રોધ આદિના સંઘર્ષમાં (ऊर्ध्वः तिष्ठ) અમારા પર વિરાજમાન રહે (समन्येषु ब्रवावहै) એવી સમ્યક્ પ્રાર્થના કરું છું. (૩)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जेव्हा जेव्हा बाह्य किंवा आंतरिक देवासुर संग्राम उपस्थित होतात, तेव्हा तेव्हा परमेश्वराला आपल्यामध्ये बलवान करून आत्मोद्बोधन प्राप्त करून सर्व विघ्नांना विफल करून विजय प्राप्त केला पाहिजे. ॥३॥

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