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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1659
    ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    25

    पा꣡ता꣢ वृत्र꣣हा꣢ सु꣣त꣡मा घा꣢꣯ गम꣣न्ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣢त् । नि꣡ य꣢मते श꣣त꣡मू꣢तिः ॥१६५९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पा꣡ता꣢ । वृ꣣त्र꣢हा । वृ꣣त्र । हा꣢ । सु꣣त꣢म् । आ । घ꣣ । गमत् । न꣢ । आ꣣रे꣢ । अ꣣स्म꣢त् । नि । य꣣मते । शत꣡मू꣢तिः । श꣣त꣢म् । ऊ꣣तिः ॥१६५९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पाता वृत्रहा सुतमा घा गमन्नारे अस्मत् । नि यमते शतमूतिः ॥१६५९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    पाता । वृत्रहा । वृत्र । हा । सुतम् । आ । घ । गमत् । न । आरे । अस्मत् । नि । यमते । शतमूतिः । शतम् । ऊतिः ॥१६५९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1659
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अब जगदीश्वर का आह्वान करते हैं।

    पदार्थ

    (वृत्रहा) विघ्नों को दूर करनेवाला, (सुतम्) अभिषुत किये हुए श्रद्धा-भक्ति के रस को (पाता) पीनेवाला इन्द्र जगदीश्वर (घ) निश्चय ही (आ गमत्) हमारे पास आये। (अस्मत् आरे) हमसे दूर(न) न रहे। (शतमूतिः) अनन्त रक्षाओंवाला वह (नि यमते) हमें नियन्त्रणपूर्वक चलाये ॥३॥

    भावार्थ

    जगदीश्वर को अपने समीप अनुभव करके स्तोता जीव नियमपूर्वक ही जीवन बिताता है ॥३॥

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    पदार्थ

    (वृत्रहा) पापनाशक२ परमात्मा (सुतं पाता) मेरे द्वारा निष्पादित उपासनारस का पान करने—स्वीकार करने के शील वाला३ (घ—आगमत्) अवश्य आवे (न-आरे-अस्मत्) हम से दूर न हो—रहे (शतम्-ऊतिः-नियमते) बहुत रक्षणाक्रियाओं से हमारी सम्भाल करता है॥३॥

    विशेष

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    विषय

    मेधातिथि का जीवन

    पदार्थ

    यह (सुतं पाता) = सोम का पान करनेवाला इन्द्र (वृत्रहा) = कामादि ज्ञान के आवरणों को सचमुच हनन करनेवाला होता है । संयमी पुरुष की ज्ञानाग्नि इस प्रकार दीप्त होती है कि वह कामरूप वायु से बुझ नहीं सकती। सोम का पान कर वासना को विनष्ट करने पर (घ) = निश्चय से वह प्रभु (अस्मत्) = हमसे (आरे) = दूर (न अगमत्) = नहीं जाता, अर्थात् हमें सदा प्रभु का सान्निध्य प्राप्त होता है। यह (ऊतिः) = वासनाओं से अपनी रक्षा करनेवाला (शतम्) = सौ-के-सौ वर्ष (आनियमते) = अपने जीवन में सर्वथा संयमी बनता है। सौ वर्षों तक वासनाओं को वश में रखता है। संसार में यही तो बुद्धिमत्तापूर्वक चलने का मार्ग है। इसी से इसका नाम 'मेधातिथि' है । यह मेधातिथि वासनाओं का शिकार न होने से अन्त तक शक्तिशाली बना रहता है— अतः ‘आङ्गिरस' है । संक्षेप में 'मेधातिथि आङ्गिरस' का जीवन यह है कि।

    १. वह सोम का पान करता है – शक्ति की रक्षा करता है ।

    २. वासनाओं का विनाश करता है ।

    ३. प्रभु से यह दूर नहीं जाता ।

    ४. अपनी रक्षा करता है, सौ-के-सौ वर्षों तक संयमी जीवन बिताता है ।

    भावार्थ

    हम संयमी जीवन बिताएँ, यही प्रभु सान्निध्य का सर्वोत्तम साधन है।

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    विषय

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    भावार्थ

    (सुतं) आनन्दरस का या प्रेरक बल को (पाता) पान करने या धारण करने और (वृत्रहा) विघ्नों का नाश करने वाला वह आत्मा (अस्मत्) हमारे (आरे) समीप (घ) ही (आगमन्) प्राप्त है वह (शतमूतिः) सैंकड़ों प्रकार से शक्तिशाली होकर (नियमते) संयम साधना करता है।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः। २ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा। ३ शुनःशेप आजीगर्तः। ४ शंयुर्बार्हस्पत्यः। ५, १५ मेधातिथिः काण्वः। ६, ९ वसिष्ठः। ७ आयुः काण्वः। ८ अम्बरीष ऋजिश्वा च। १० विश्वमना वैयश्वः। ११ सोभरिः काण्वः। १२ सप्तर्षयः। १३ कलिः प्रागाथः। १५, १७ विश्वामित्रः। १६ निध्रुविः काश्यपः। १८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। १९ एतत्साम॥ देवता—१, २, ४, ६, ७, ९, १०, १३, १५ इन्द्रः। ३, ११, १८ अग्निः। ५ विष्णुः ८, १२, १६ पवमानः सोमः । १४, १७ इन्द्राग्नी। १९ एतत्साम॥ छन्दः–१-५, १४, १६-१८ गायत्री। ६, ७, ९, १३ प्रागथम्। ८ अनुष्टुप्। १० उष्णिक् । ११ प्रागाथं काकुभम्। १२, १५ बृहती। १९ इति साम॥ स्वरः—१-५, १४, १६, १८ षड्जः। ६, ८, ९, ११-१३, १५ मध्यमः। ८ गान्धारः। १० ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ जगदीश्वरमाह्वयति।

    पदार्थः

    (वृत्रहा) विघ्नहन्ता, (सुतम्) अभिषुतं श्रद्धाभक्तिरसम्(पाता) पानकर्ता इन्द्रो जगदीश्वरः (घ) नूनम् (आ गमत्) आगच्छतु। (अस्मत् आरे) अस्मत्तः दूरे (न) मा तिष्ठतु।(शतमूतिः) अनन्तरक्षः सः (नि यमते) अस्मान् नियच्छतु, नियन्त्रणपूर्वकं चालयतु ॥३॥

    भावार्थः

    जगदीश्वरं स्वसमीपेऽनुभूय स्तोता जीवो नियमपूर्वकमेव जीवनं यापयति ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The soul, the remover of impediments, the enjoyer of supreme felicity stays not far away from us. Equipped with a hundred powers, it keeps us under control.

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    Meaning

    May the connoisseur of distilled soma, destroyer of darkness, dishonour and destitution, come and never be far away from us. The lord who commands a hundred forces of defence, protection and progress rules all, friends and foes. (Rg. 8-2-26)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (वृत्रहा) પાપનાશક પરમાત્મા (सुतं पाता) મારા દ્વારા નિષ્પાદિત ઉપાસનારસનું પાન કરવા સ્વીકાર કરવાના સ્વભાવવાળા (घ आगमत्) અવશ્ય આવે છે. (न आरे अस्मत्) અમારાથી દૂર ન થાય - ન રહે. (शतम् ऊतिः नियमते) અનેક રક્ષણ ક્રિયાઓથી અમારી સંભાળ રાખે છે. (૩)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जगदीश्वराला आपल्या समीप अनुभवत स्तोता जीव नियमपूर्वक जीवन घालवितो. ॥३॥

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