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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1715
ऋषिः - अवत्सारः काश्यपः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
62
अ꣣या꣡ नि꣢ज꣣घ्नि꣡रोज꣢꣯सा रथस꣣ङ्गे꣡ धने꣢꣯ हि꣣ते꣢ । स्त꣢वा꣣ अ꣡बि꣢꣯भ्युषा हृ꣣दा꣢ ॥१७१५॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣या꣢ । नि꣣जघ्निः꣢ । नि꣣ । जघ्निः꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सा । र꣣थसङ्गे꣢ । र꣣थ । सङ्गे꣢ । ध꣡ने꣢꣯ । हि꣣ते꣢ । स्त꣡वै꣢꣯ । अ꣡बि꣢꣯भ्युषा । अ । बि꣣भ्युषा । हृदा꣢ ॥१७१५॥
स्वर रहित मन्त्र
अया निजघ्निरोजसा रथसङ्गे धने हिते । स्तवा अबिभ्युषा हृदा ॥१७१५॥
स्वर रहित पद पाठ
अया । निजघ्निः । नि । जघ्निः । ओजसा । रथसङ्गे । रथ । सङ्गे । धने । हिते । स्तवै । अबिभ्युषा । अ । बिभ्युषा । हृदा ॥१७१५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1715
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में परमात्मा की स्तुति की गयी है।
पदार्थ
हे पवमान सोम ! हे पवित्रतादायक सर्वान्तर्यामी जगदीश ! आप (अया) इस (ओजसा) बल से (निजघ्निः) काम-क्रोध आदि शत्रुओं को विनष्ट करनेवाले हो। (रथसङ्गे) मानव-देह रूप रथ की प्राप्ति होने पर (धने हिते) दिव्य ऐश्वर्य को पाने के लिए, मैं (अबिभ्युषा) निर्भय (हृदा) हृदय से, (स्तवै) आपकी स्तुति करता हूँ ॥२॥
भावार्थ
हार्दिक श्रद्धा से स्तुति किया गया जगदीश्वर स्तोता को आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को विनष्ट करने के लिए बल प्रदान करके उसका उपकार करता है ॥२॥
पदार्थ
(अया-ओजसा) इस स्वात्मबल से—इसके आधार पर (निजघ्निः) पापों का हननकर्त्ता है८ (रथसङ्गे धने हिते) मेरे साथ रमणीय सङ्ग में अन्तर्हित—अन्दर रखे अध्यात्म धन—मोक्षैश्वर्य के निमित्त (अबिभ्युषा हृदा स्तवै) भयरहित—सङ्कोचरहित हृदय से—मन से तेरी स्तुति करता हूँ॥२॥
विशेष
<br>
विषय
प्रभु-स्मरण
पदार्थ
१ प्रभु अवत्सार से कह रहे थे कि तू उन्नति-विरोधी शत्रुओं को नष्ट कर डाल । अवत्सार उत्तर देते हुए कहता है कि-
१. (अया ओजसा) = आपके सम्पर्क से प्राप्त ओज से मैं (निजघ्निः) = शत्रुओं का कुचलनेवाला बनता हूँ। प्रभु के सम्पर्क से जीव में एक अद्भुत शक्ति उत्पन्न होती है, जिससे वह अपने कामक्रोधादि शत्रुओं का नाश कर पाता है।
२. हे प्रभो ! मैं (रथसङ्गे) = इस मानवशरीररूपी रथ के सङ्ग होने पर तथा (धने हिते) = धन के विद्यमान होने पर (अबिभ्युषा हृदा) = निर्भीक हृदय से (स्तवै) = आपका स्तवन करता हूँ । वस्तुत: प्रभुकृपा से हमें जीवन-यात्रा को पूर्ण करने के लिए यह शरीररूपी रथ मिला है। अन्य पशु-पक्षियों के शरीर भोगयोनि हैं—वे शरीर ‘रथ’ नहीं, अतः वे जीवन-यात्रा की पूर्ति में साधक भी नहीं । इस शरीर को प्राप्त करने पर यदि प्रभुकृपा से शरीररक्षा के लिए आवश्यक धन प्राप्त हो तो मनुष्य को चाहिए कि व्यर्थ में और धन की प्राप्ति में न उलझकर निर्भीक हृदय से प्रभु का स्तवन करे और अधिक धन जुटाने में शक्ति को व्यय करने के स्थान में प्रभु की उपासना से शक्ति की वृद्धि करना अधिक श्रेयस्कर है।
भावार्थ
मानवशरीर को प्राप्त करके, आवश्यक धन प्राप्त होने पर, प्रभुस्तवन ही उचित है – इसी से हमारी शक्ति बढ़ेगी, अन्यथा हम क्षीणशक्ति हो जाएँगे ।
विषय
missing
भावार्थ
हे (सोम) ऐश्वर्यवन् ! परमात्मन् ! आप (अया) इस प्रकार के (ओजसा) तेज और बल से विघ्नों और विन्नकारियों को (निजघ्निः) विनाश करने हारे हो। (रथसंगे) इस रमण करने योग्य देह या रसस्वरूप तेरा संग लाभ हो जाने पर और (धने*) तृप्ति योग्य भोग्य पदार्थ के (हिते) प्राप्त हो जाने पर मैं (अविभ्युषा) निर्भय (हृदा) चित्त से (स्तवै) आपकी स्तुति करता हूं।
टिप्पणी
*धनं, धिनोतीति सतः (निरु० अ० ३। ख० ९) धिनोतिस्तर्पणांर्थः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः–१ विरूप आंङ्गिरसः। २, १८ अवत्सारः। ३ विश्वामित्रः। ४ देवातिथिः काण्वः। ५, ८, ९, १६ गोतमो राहूगणः। ६ वामदेवः। ७ प्रस्कण्वः काण्वः। १० वसुश्रुत आत्रेयः। ११ सत्यश्रवा आत्रेयः। १२ अवस्युरात्रेयः। १३ बुधगविष्ठिरावात्रेयौ। १४ कुत्स आङ्गिरसः। १५ अत्रिः। १७ दीर्घतमा औचथ्पः। देवता—१, १०, १३ अग्निः। २, १८ पवमानः सोमः। ३-५ इन्द्रः। ६, ८, ११, १४, १६ उषाः। ७, ९, १२, १५, १७ अश्विनौ॥ छन्दः—१, २, ६, ७, १८ गायत्री। ३, ५ बृहती। ४ प्रागाथम्। ८,९ उष्णिक्। १०-१२ पङ्क्तिः। १३-१५ त्रिष्टुप्। १६, १७ जगती॥ स्वरः—१, २, ७, १८ षड्जः। ३, ४, ५ मध्यमः। ८,९ ऋषभः। १०-१२ पञ्चमः। १३-१५ धैवतः। १६, १७ निषादः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमात्मानं स्तौति।
पदार्थः
हे पवमान सोम ! हे पवित्रदायक सर्वान्तर्यामिन् जगदीश ! त्वम् (अया) अनेन (ओजसा) बलेन (निजघ्निः) कामक्रोधादीनां रिपूणां हन्ता असि। [निपूर्वाद् हन्तेः ‘आदृगमहनजनः किकिनौ लिट् च’ अ० ३।२।१७१ इत्यनेन किः प्रत्ययः, तस्य च लिड्वत्त्वाद् द्वित्वादिः।] (रथसङ्गे) मानवदेहरूपस्य रथस्य प्राप्तौ सत्याम् (धने हिते) दिव्यैश्वर्यस्य लाभाय, अङम् (अबिभ्युषा) निर्भयेन (हृदा) हृदयेन, त्वाम् (स्तवै) स्तौमि ॥२॥
भावार्थः
हार्दिक्या श्रद्धया स्तुतो जगदीश्वरः स्तोत्रे सर्वानाभ्यन्तरान् बाह्यांश्च रिपून् विनाशयितुं बलं प्रदाय तमुपकुरुते ॥२॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O God, with Thy manifest power. Thou removest impediments. On achieving Thy delightful company and obtaining worldly wealth, with fearless heart I sing Thy praise!
Meaning
By this power and valour of yours you eliminate the negative forces. In this battle of the body chariot on hand in this life, we adore you with a fearless heart, you being the protector and guide. (Rg. 9-53-2)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अया ओजसा) એ સ્વ આત્મબળથી એના આધાર પર (निजघ्निः) પાપોનો હનનકર્તા છે. (रथ सङ्गे धने हिते) મારી સાથે રમણીય સંગમાં અન્તર્હિત-અંદર રાખેલ અધ્યાત્મ ધન-મોક્ષ ઐશ્વર્યને માટે (अबिभ्युषा हृदा स्तवै) ભયરહિત-સંકોચરહિત હૃદયથી-મનથી તારી સ્તુતિ કરું છું. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
हार्दिक श्रद्धेने स्तुती केला गेलेला जगदीश्वर स्तोत्याच्या आंतरिक व बाह्यशत्रूंना नष्ट करून, बल प्रदान करून त्याच्यावर उपकार करतो. ॥२॥
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