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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1716
    ऋषिः - अवत्सारः काश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    37

    अ꣡स्य꣢ व्र꣣ता꣢नि꣣ ना꣢꣫धृषे꣣ प꣡व꣢मानस्य दू꣣꣬ढ्या꣢꣯ । रु꣣ज꣡ यस्त्वा꣢꣯ पृत꣣न्य꣡ति꣢ ॥१७१६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣡स्य꣢꣯ । व्र꣣ता꣡नि꣢ । न । आ꣣धृ꣡षे꣢ । आ꣣ । धृ꣡षे꣢꣯ । प꣡व꣢꣯मानस्य । दू꣣ढ्या꣢ । रु꣣ज꣢ । यः । त्वा꣣ । पृतन्य꣡ति꣢ ॥१७१६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्य व्रतानि नाधृषे पवमानस्य दूढ्या । रुज यस्त्वा पृतन्यति ॥१७१६॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य । व्रतानि । न । आधृषे । आ । धृषे । पवमानस्य । दूढ्या । रुज । यः । त्वा । पृतन्यति ॥१७१६॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1716
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अब अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देते हैं।

    पदार्थ

    (अस्य) इस (पवमानस्य) गतिमान् पुरुषार्थी जीव के (व्रतानि) व्रत वा कर्म (दूढ्या) दुर्बुद्धि शत्रु के द्वारा (आधृषे न) दबाये नहीं जा सकते। हे मेरे अन्तरात्मन् ! (यः) जो भी आन्तरिक वा बाहरी शत्रु (त्वा) तुझ पर (पृतन्यति) सेना से धावा करता है, उसे (रुज) नष्ट-भ्रष्ट कर दे ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्य के अन्तरात्मा को योग्य है कि वह प्रबोध और उद्बोधन प्राप्त करके अपनी शक्ति से सब अन्दर के और बाहर के शत्रुओं को परास्त करके देवासुरसङ्ग्राम में विजयी हो ॥३॥

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    पदार्थ

    (अस्य पवमानस्य) इस धारारूप में प्राप्त होने वाले परमात्मा के (व्रतानि) कर्मों९ नियमों को (दूढ्या) दुष्टबुद्धि—अन्यथा विचार से (न-आधृषे) कोई भी नहीं दबा सकता है (यः-त्वा पृतन्यति) जो तुझे—तेरे साथ संग्राम चाहता है परमात्मन्! तू उसे (रुजः) भग्न कर देता है॥३॥

    विशेष

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    विषय

    प्रभु के व्रतों को न तोड़ना

    पदार्थ

    अवत्सार निश्चय करता है (अस्य) = इस (पवमानस्य) = पवित्र करनेवाले प्रभु के (व्रतानि) = व्रतों काप्रभु से उपदिष्ट कर्त्तव्यों का – (दूढ्या) = दुर्बुद्धि के कारण (न आधृषे) = मैं धर्षण नहीं करता, अर्थात् मैं प्रभु से उपदिष्ट व्रतों का पालन ही करता हूँ । वस्तुतः मानव-कल्याण तो इन व्रतों के पालन में ही है, परन्तु दुर्बुद्धि के कारण मनुष्य कभी-कभी इन व्रतों को तोड़कर अन्ततः अपना अकल्याण कर बैठता है। सम्पूर्ण भोग्य पदार्थ शरीररक्षा के लिए उपयोज्य हैं, परन्तु मनुष्य स्वाद के कारण उनका अतिमात्र सेवन करता है और नाना प्रकार की आधि-व्याधियों में फँस जाता है। प्रभु ने मनुष्य को भुजाएँ दीं, वेद में उनका 'बाहु' नाम रखा और संकेत किया कि तूने सदा [बाह प्रयत्ने] प्रयत्नशील बनना, परन्तु जीव कर्मशीलता के व्रत को छोड़कर आराम पसन्द हो गया । उसे ('कुर्वन्नेवेह कर्माणि') = उपदेश भूल गया। प्रभु ने 'भोजन' शब्द का अर्थ ही यह बतलाया था कि जो पालन के लिए ‘अभ्यवहृत’ हो [भुज पालनाभ्यवहारयोः], परन्तु मनुष्य उसे स्वाद के लिए खाने लगा। इस प्रकार मनुष्य ने इस पवमान प्रभु के उपदिष्ट शतशः व्रतों को तोड़ा | अब इन व्रत-भङ्गों के परिणामस्वरूप कष्ट आने पर जब जीव व्याकुल हुआ और प्रभु की ओर झुका तब प्रभु उसे फिर कहते हैं= हे जीव ! (यः) = जो भी शत्रु (त्वा) = तुझे (पृतन्यति) = आक्रान्त करता है, तू (रुज) उसे भङ्ग करने का प्रयत्न कर। काम, क्रोध व लोभ – जिसका भी तुझपर आक्रमण हो तू उसे जीतने का प्रयत्न कर । बस, इसी में तेरा कल्याण है ।

    भावार्थ

    हम प्रभु के व्रतों को न तोड़ें। आक्रान्ता शत्रुओं का पराजय करें।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    (अस्य) इस (पवमानस्य) पवमान, सर्वप्रेरक, व्यापक और सब को पवित्र करने हारे एवं स्वयं पवित्र परमेश्वर की (व्रतानि) व्यवस्थाएं (दूढया) दुष्ट बुद्धि वाले, मूर्ख, अभिमानी पुरुष से (आधृषे) अपमान, या विनाश नहीं हो सकती। हे परमात्मन् ! (यः) जो (त्वा) आपका (पृतन्यति) विरोध करता है आपके नियमों और आज्ञाओं का उल्लंघन करता है आप उसको, (रुज*) पीड़ा उत्पन्न करते हैं या उसका विनाश कर देते हैं।

    टिप्पणी

    *रुजो भङ्गे (तुदादिः) रुज हिंसायाम् (चुरादिः)।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः–१ विरूप आंङ्गिरसः। २, १८ अवत्सारः। ३ विश्वामित्रः। ४ देवातिथिः काण्वः। ५, ८, ९, १६ गोतमो राहूगणः। ६ वामदेवः। ७ प्रस्कण्वः काण्वः। १० वसुश्रुत आत्रेयः। ११ सत्यश्रवा आत्रेयः। १२ अवस्युरात्रेयः। १३ बुधगविष्ठिरावात्रेयौ। १४ कुत्स आङ्गिरसः। १५ अत्रिः। १७ दीर्घतमा औचथ्पः। देवता—१, १०, १३ अग्निः। २, १८ पवमानः सोमः। ३-५ इन्द्रः। ६, ८, ११, १४, १६ उषाः। ७, ९, १२, १५, १७ अश्विनौ॥ छन्दः—१, २, ६, ७, १८ गायत्री। ३, ५ बृहती। ४ प्रागाथम्। ८,९ उष्णिक्। १०-१२ पङ्क्तिः। १३-१५ त्रिष्टुप्। १६, १७ जगती॥ स्वरः—१, २, ७, १८ षड्जः। ३, ४, ५ मध्यमः। ८,९ ऋषभः। १०-१२ पञ्चमः। १३-१५ धैवतः। १६, १७ निषादः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ स्वकीयमन्तरात्मानमुद्बोधयति।

    पदार्थः

    (अस्य) एतस्य (पवमानस्य) पुरुषार्थिनो जीवस्य। [पवते गतिकर्मा। निघं० २।१४।] (व्रतानि) संकल्पाः कर्माणि वा (दूढ्या) दुर्धिया शत्रुणा (आधृषे न) आधर्षणाय न भवन्ति। हे मदीय अन्तरात्मन् ! (यः) योऽपि आन्तरो बाह्यो वा रिपुः (त्वा) त्वाम् (पृतन्यति) सेनया अभियाति, तम् (रुज) भङ्ग्धि ॥३॥

    भावार्थः

    मनुष्यस्यान्तरात्मा प्रबोधनमुद्बोधनं च प्राप्य स्वशक्त्या सर्वान् आन्तरान् बाह्यांश्च रिपून् पराभूय देवासुरसंग्रामे विजेतुमर्हति ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    None evil-minded can assail the holy laws of this pure God. Crush him, O God, who fain would disobey Thy laws.

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    Meaning

    The rules and laws of this mighty creative and dynamic power no one can resist with his adverse force. O Soma, whoever opposes you, break open and destroy. (Rg. 9-53-3)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अस्य पवमानस्य) એ ધારારૂપમાં પ્રાપ્ત થનાર પરમાત્માનાં (व्रतानि) કર્મો નિયમોને (दूढ्या) દુષ્ટ બુદ્ધિ-અન્યથા વિચારથી (न आधृषे) કોઈ પણ દબાવી શકતા નથી. (यः त्वा प्रतन्यति) જે તને-તારા સાથે સંગ્રામ ઇચ્છે છે પરમાત્મન્ ! તું તેનો (रुजः) પીડા આપીને ભાંગી-નાશ કરે છે. (૩)

     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसाच्या अंतरात्म्याने प्रबोध व उद्बोधन प्राप्त करून आपल्या शक्तीने आंतरिक व बाह्य सर्व शत्रूंना परास्त करून देवासुर संग्रामात विजयी व्हावे. ॥३॥

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