Loading...

सामवेद के मन्त्र

  • सामवेद का मुख्य पृष्ठ
  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1842
    ऋषिः - उलो वातायनः देवता - वायुः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    33

    य꣢द꣣दो꣡ वा꣢त ते गृ꣣हे꣢३꣱ऽमृ꣢तं꣣ नि꣡हि꣢तं꣣ गु꣡हा꣢ । त꣡स्य꣢ नो देहि जी꣣व꣡से꣢ ॥१८४२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य꣢त् । अ꣣दः꣢ । वा꣣त । ते । गृहे꣢ । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । नि꣡हि꣢꣯तम् । नि । हि꣣तम् । गु꣡हा꣢꣯ । त꣡स्य꣢꣯ । नः꣣ । धेहि । जीव꣡से꣢ ॥१८४२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यददो वात ते गृहे३ऽमृतं निहितं गुहा । तस्य नो देहि जीवसे ॥१८४२॥


    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । अदः । वात । ते । गृहे । अमृतम् । अ । मृतम् । निहितम् । नि । हितम् । गुहा । तस्य । नः । धेहि । जीवसे ॥१८४२॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1842
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 7; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आगे पुनः उसी विषय का कथन है।

    पदार्थ

    हे (वात) जीवात्मा-सहित प्राण ! (यत् ते गृहे) जो तुम्हारे शरीर रूप घर में (गुहा) हृदय-गुहा के अन्दर (अदः) यह (अमृतम्) अक्षय परमात्मा-रूप ज्योति (निहितम्) रखी हुई है, (जीवसे) जीवन के लिए (तस्य नः धेहि) उसकी हमें प्राप्ति कराओ ॥३॥

    भावार्थ

    प्राणायाम द्वारा प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाने पर, मन में धारणाओं की योग्यता उत्पन्न हो जाने पर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हृदय में निहित परमात्म-ज्योति प्रकाशित हो जाती है ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    पदार्थ

    (वात) हे विभुगतिमन् परमात्मन्! (ते गृहे) तेरे घर में—मोक्षधाम में (यत्-अदः) जो वह अमुक (अमृतम्) अमृतानन्द (गुहा निहितम्) सूक्ष्म स्थिति में छिपा हुआ रखा है (तस्य नः-जीवसे धेहि) उसे हमारे जीवन—दीर्घ जीवन अमर जीवन के लिये धारण करा॥३॥

    विशेष

    <br>

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    प्रेरणा में अमरता निहित है

    पदार्थ

    हे (वात) = प्रेरणे! (ते गृहे) = तेरे ग्रहण करने में (यत्) - जो (अदः) = वह (अमृतम्) = अमरता या अविनाश (गुहा-निहितम्) = छिपा हुआ सुरक्षित रखा है (तस्य) = उस अमरता को (जीवसे) = जीवन के लिए (नः) = हमें (धेहि) = धारण कराइए ।

    जो भी व्यक्ति इस प्रेरणा का ग्रहण करता है वह सचमुच उस अमरता का ही ग्रहण कर रहा होता है जो इस प्रेरणा में सुरक्षितरूप से रक्खी हुई है। प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाला व्यक्ति कभी अधर्म की ओर नहीं झुकता । अधर्म ही वह वस्तु है जो मनुष्य का धारण न कर विनाश करती है । गिरानेवाली होने के कारण ही इसका नाम 'पातक' है । यह अघ- पाप सचमुच अघ- पीड़ा ही है। यह दुरित मनुष्य की बड़ी दुर्गति कर देता है। प्रेरणा इस विनाश, पतन, पीड़ा व दुर्गति से बचानेवाली है। इसी से 'इसमें अमृत छिपा है' ऐसा कहा गया है ।

    इस प्रेरणा का सुनना जीवन का हेतु है और न सुनना ही मृत्यु का कारण है । जो व्यक्ति वातायन=प्रेरणा को ही अपना अयन बनाता है वह 'उल' होता है— जीवन के सब विघ्नों को भस्मसात् कर देनेवाला होता है ।

    भावार्थ

    हम प्रभु - प्रेरणा को सुनें और अमरता का लाभ करें ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे (वात) प्राणों के प्राण परमात्मन् ! (यत्) जो (अदः) वह कभी न भूलने योग्य (अमृतं) अमृतरस, परमज्ञान (ते) तेरे (गृहे) शरण में (गुहा) हृदयरूप गुहा में (निहितं) गुप्तरूप से रक्खा है भगवन् ! (तस्य) उसको (नः जीवसे) हमारे जीवन के निमित्त (घेहि) प्रदान करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ अग्निः पावकः। २ सोभरिः काण्वः। ५, ६ अवत्सारः काश्यपः अन्ये च ऋषयो दृष्टलिङ्गाः*। ८ वत्सप्रीः। ९ गोषूक्तयश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ। १० त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिंधुद्वीपो वाम्बरीषः। ११ उलो वातायनः। १३ वेनः। ३, ४, ७, १२ इति साम ॥ देवता—१, २, ८ अग्निः। ५, ६ विश्वे देवाः। ९ इन्द्रः। १० अग्निः । ११ वायुः । १३ वेनः। ३, ४, ७, १२ इतिसाम॥ छन्दः—१ विष्टारपङ्क्ति, प्रथमस्य, सतोबृहती उत्तरेषां त्रयाणां, उपरिष्टाज्ज्योतिः अत उत्तरस्य, त्रिष्टुप् चरमस्य। २ प्रागाथम् काकुभम्। ५, ६, १३ त्रिष्टुङ। ८-११ गायत्री। ३, ४, ७, १२ इतिसाम॥ स्वरः—१ पञ्चमः प्रथमस्य, मध्यमः उत्तरेषां त्रयाणा, धैवतः चरमस्य। २ मध्यमः। ५, ६, १३ धैवतः। ८-११ षड्जः। ३, ४, ७, १२ इति साम॥ *केषां चिन्मतेनात्र विंशाध्यायस्य, पञ्चमखण्डस्य च विरामः। *दृष्टिलिंगा दया० भाष्ये पाठः।

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनस्तमेव विषयमाह।

    पदार्थः

    हे (वात) जीवात्मसहचरित प्राण ! (यत् ते गृहे) यत् तव देहरूपे सदने (गुहा) हृदयगुहायाम्। [अत्र ‘सुपां सुलुक्’ अ० ७।१।३९ इति विभक्तेर्लुक्।] (अदः) एतत् (अमृतम्) अक्षयं परमात्मरूपं ज्योतिः (निहितम्) स्थितम् अस्ति, (जीवसे) जीवनाय (तस्य नः धेहि) तत् अस्मान् प्रापय ॥३॥

    भावार्थः

    प्राणायामेन प्रकाशावरणक्षये मनसि धारणासु योग्यताप्राप्त्या प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिभिर्हृदयनिहितं परमात्मज्योतिः प्रकाशते ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, that immortal knowledge, that is hidden in Thee, and remains under Thy control, give us thereof that we may live !

    Translator Comment

    Soul is of diverse forms, i.e., cattle, birds, men, insects, fish etc. It appears in waters as fish, whale, sea monster. On earth it appears in the shape of men cattle and creeping insects. In the atmosphere the soul appears in the shape of various flying birds like crow, sparrow and vulture .

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    In your treasure home of inviolable energy, O breath of life energy, Vayu, there is immortal wealth hidden for us. Of that, from that, give us some, our share, so that we may live a full life of good health and joy. (Rg. 10-186-3)

    इस भाष्य को एडिट करें

    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (वात) વિભુ ગતિમાન પરમાત્મન્ ! (ते गृहे) તારા ઘરમાં-મોક્ષધામમાં (यत् अदः) જે તે અમુક (अमृतम्) અમૃતાનંદ (गुहा निहितम्) સૂક્ષ્મ અવસ્થામાં છૂપા સ્થાનમાં રાખેલ છે, (तस्य नः जीवसे धेहि) તે અમારા જીવન-દીર્ઘજીવન, અમર જીવનને માટે ધારણ કરાવ. (૩)
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    प्राणायामाद्वारे प्रकाशाचे आवरण क्षीण झाल्यावर मनात धारणांची योग्यता उत्पन्न झाल्यावर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधीने हृदयात निहित परमात्माज्योती प्रकाशित होते. ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top