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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1846
    ऋषिः - वेनो भार्गवः देवता - वेनः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
    33

    ना꣡के꣢ सुप꣣र्ण꣢꣫मुप꣣ य꣡त्पत꣢꣯न्तꣳ हृ꣣दा꣡ वेन꣢꣯न्तो अ꣣भ्य꣡च꣢क्षत त्वा । हि꣡र꣢ण्यपक्षं꣣ व꣡रु꣢णस्य दू꣣तं꣢ य꣣म꣢स्य꣣ यो꣡नौ꣢ शकु꣣नं꣡ भु꣢र꣣ण्यु꣢म् ॥१८४६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ना꣡के꣢꣯ । सु꣣पर्ण꣢म् । सु꣣ । पर्ण꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । यत् । प꣡त꣢꣯न्तम् । हृ꣣दा꣢ । वे꣡न꣢꣯न्तः । अ꣣भ्य꣡चक्षत । अ꣣भि । अ꣣च꣢꣯क्षत । त्वा꣣ । हि꣡र꣢꣯ण्यपक्षम् । हि꣡र꣢꣯ण्य । प꣣क्षम् । व꣡रु꣢꣯ण्स्य । दू꣣त꣢म् । य꣣म꣡स्य꣢ । यो꣡नौ꣢꣯ । श꣣कुन꣢म् । भु꣣रण्यु꣢म् ॥१८४६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नाके सुपर्णमुप यत्पतन्तꣳ हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा । हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम् ॥१८४६॥


    स्वर रहित पद पाठ

    नाके । सुपर्णम् । सु । पर्णम् । उप । यत् । पतन्तम् । हृदा । वेनन्तः । अभ्यचक्षत । अभि । अचक्षत । त्वा । हिरण्यपक्षम् । हिरण्य । पक्षम् । वरुण्स्य । दूतम् । यमस्य । योनौ । शकुनम् । भुरण्युम् ॥१८४६॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1846
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 7; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ३२० क्रमाङ्क पर सूर्य के दृष्टान्त से परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहते हैं।

    पदार्थ

    हे वेन ! हे परमेश्वर की कामना करनेवाले जीवात्मन् ! (हिरण्यपक्षम्) ज्ञान-कर्म-रूप सुनहरे पंखोंवाले, (वरुणस्य दूतम्) वरणीय मन को सन्मार्ग पर प्रेरित करनेवाले, (यमस्य) नियन्ता प्राण के (योनौ) देहरूप घर में (शकुनम्) शक्ति से शोभित, (भुरण्युम्) देह के धारक-पोषक, (सुपर्णम्) अष्टाङ्गयोग-रूप शुभ पंखों से युक्त तथा (नाके) मोक्ष के निमित्त (उपपतन्तम्) प्रयत्नशील (त्वा) तुझे (यत्) जब (अभ्यचक्षत) प्रभु-प्रेमी लोग देखते हैं, तब वे (हृदा) हृदय से (वेनन्तः) तुमसे प्रेम करने लगते हैं ॥१॥

    भावार्थ

    देह के अधिष्ठाता जीवात्मा की जब अध्यात्म-मार्ग में रूचि हो जाती है, तब वह अष्टाङ्गयोग के अभ्यास से मोक्ष पा सकता है ॥१॥

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    टिप्पणी

    (देखो अर्थव्याख्या मन्त्र संख्या ३२०)

    विशेष

    ऋषिः—भार्गवो वेनः (तेजस्वी पिता या गुरु से सम्बद्ध परमात्म सत्सङ्ग कामना करने वाला उपासक)॥<br>देवता—वेनः (कमनीय परमात्मा)॥ छन्दः—त्रिष्टुप्॥

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    विषय

    प्रभु-दर्शन

    पदार्थ

    इस मन्त्र का ऋषि 'वेन' है – प्रबल इच्छावाला । (हृदा वेनन्तः) = हृदय से तेरी प्राप्ति की प्रबल कामना करते हुए व्यक्ति ही हे प्रभो ! (त्वा) = आपको (अभ्यचक्षत) = देखते हैं। कैसे आपको ? । 

    १. (नाके सुपर्णम्) = मोक्ष-सुख में उत्तम पालन करनेवाले को । जो भी जीव [वेन्-Reflect, consider, worship] उस प्रभु का चिन्तन व स्तुति करता हुआ संसार से ऊपर उठता है - और मोक्षलोक का अधिकारी बनता है, वह प्रभु के उत्तम पालन का भी साक्षात् करता है ।

    २. (यत् उप-पतन्तम्) = समीप आते हुए आपको । यह वेन जितना - जितना प्रभु का चिन्तन करता है, उतना-उतना प्रभु को समीप आता अनुभव करता है । ('तदु अन्तिके') = वे प्रभु तो मेरे समीप हैं — ऐसा इसे अनुभव होता है।

    ३. (हिरण्यपक्षम्) = ज्योति का परिग्रह करनेवाले को [पक्ष परिग्रहे] । वे प्रभु ज्योतिर्मय हैं । उनकी समीपता में यह वेन भी अपनी ज्योति को बढ़ता देखता है ।

    ४. (वरुणस्य दूतम्) = श्रेष्ठता के सन्देशवाहक को । यह वेन प्रभु का चिन्तन करता है, इसे वे प्रभु श्रेष्ठता का सन्देश देते प्रतीत होते हैं ।

    ५. (यमस्य योनौ शकुनम्) = संयम के स्थान में शक्ति सम्पन्न बनानेवाले वे प्रभु हैं, अर्थात् अपने भक्त को संयमी बनाकर वे सशक्त कर देते हैं ।

    ६. (भुरण्युम्) = वस्तुतः वे प्रभु सबका भरण-पोषण करनेवाले हैं। इस रूप में वेन उस प्रभु का दर्शन करता है । 

    भावार्थ

    मैं चिन्तन करूँ, उपासक बनूँ और प्रभु का दर्शन करूँ ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (वेन) कर्म सन्तान उत्पन्न करने हारे आत्मन् ! कान्तिमन् ! द्रष्टः (त्वा) तुझको (यद्) जब (हृदा) हृदय से मन से (वेनन्तः) कामना करते हुवे विद्वान् लोग (अभि अचक्षत) साक्षात् करते हैं तब वे (हिरण्यपक्षं) ज्योतिःस्वरूप, (वरुणस्य) सबसे वरने योग्य, दुखों के निवारक परमात्मा के (दूतं) पास गमन करने हारे और (भुरण्युम्) अपने सामर्थ्यों को धारण करने वाले (शकुनम्) शक्तिमान् तुझ को उस समय (यमस्य) समस्त संसार के नियामक जगदीश्वर के (नाके) दुःख रहित (योनौ) आश्रयस्थान मोक्षपद में (उप पतन्तं) विचरण करते हुए (सुपर्ण) उत्तम ज्ञान और कर्म रूप पक्षों के धारक पक्षी के समान (अभ्यचक्षत) देखते हैं।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ अग्निः पावकः। २ सोभरिः काण्वः। ५, ६ अवत्सारः काश्यपः अन्ये च ऋषयो दृष्टलिङ्गाः*। ८ वत्सप्रीः। ९ गोषूक्तयश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ। १० त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिंधुद्वीपो वाम्बरीषः। ११ उलो वातायनः। १३ वेनः। ३, ४, ७, १२ इति साम ॥ देवता—१, २, ८ अग्निः। ५, ६ विश्वे देवाः। ९ इन्द्रः। १० अग्निः । ११ वायुः । १३ वेनः। ३, ४, ७, १२ इतिसाम॥ छन्दः—१ विष्टारपङ्क्ति, प्रथमस्य, सतोबृहती उत्तरेषां त्रयाणां, उपरिष्टाज्ज्योतिः अत उत्तरस्य, त्रिष्टुप् चरमस्य। २ प्रागाथम् काकुभम्। ५, ६, १३ त्रिष्टुङ। ८-११ गायत्री। ३, ४, ७, १२ इतिसाम॥ स्वरः—१ पञ्चमः प्रथमस्य, मध्यमः उत्तरेषां त्रयाणा, धैवतः चरमस्य। २ मध्यमः। ५, ६, १३ धैवतः। ८-११ षड्जः। ३, ४, ७, १२ इति साम॥ *केषां चिन्मतेनात्र विंशाध्यायस्य, पञ्चमखण्डस्य च विरामः। *दृष्टिलिंगा दया० भाष्ये पाठः।

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ३२० क्रमाङ्के सूर्यदृष्टान्तेन परमात्मविषये व्याख्याता। अत्र जीवात्मविषय उच्यते।

    पदार्थः

    हे वेन ! हे परमेशकामनामय जीवात्मन् ! (हिरण्यपक्षम्) ज्ञानकर्मरूपस्वर्णिमपक्षयुक्तम्, (वरुणस्य दूतम्) वरणीयस्य मनसः सन्मार्गे प्रेरकम्। [दु गतौ, भ्वादिः, ‘दुतनिभ्यां दीर्घश्च’ उ० ३।९० इति क्तः प्रत्ययो धातोर्दीर्घश्च।] (यमस्य) नियन्तुः प्राणस्य (योनौ) गृहे, (देहे) इत्यर्थः (शकुनम्) शक्तिशालिनम्। [शक्लृ शक्तौ स्वादिः, ‘शकेरुनोन्तोन्त्युनयः’ उ० ३।४९ इति उनप्रत्ययः।] (भुरण्युम्) देहस्य धारयितारं पोषकं च। [भुरण धारणपोषणयोः, कण्ड्वादिः, ततो बाहुलकादौणादिको युच् प्रत्ययः।] (सुपर्णम्) अष्टाङ्गयोगरूप- शुभपर्णोपेतम्, नाके मोक्षनिमित्ते (उप पतन्तम्) प्रयतमानम् (त्वा) त्वाम् (यत्) यदा (अभ्यचक्षत) प्रभुप्रेमिणः पश्यन्ति, तदा ते (हृदा) हृदयेन (वेनन्तः) त्वां कामयमानाः जायन्ते ॥१॥

    भावार्थः

    देहाधिष्ठाता जीवात्माऽध्यात्मरुचिः सन्नष्टाङ्गयोगाभ्यासेन मोक्षमधिगन्तुं प्रभवति ॥१॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O King, good persons gaze upon thee, as they gaze, with longing in their heart, on the fast moving Sun, spreading lustre in heaven, strong-winged, golden-flanked, the envoy of air, the bringer of rain, residing in the home of lightning, and powerful like a bird !

    Translator Comment

    See verse 320. The sun has been compared to a bird. Sun is strong winged as it emits powerful rays having great speed. It is golden-flanked, due to its brilliance when it shines.

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    Meaning

    O Sun, wrapped in wondrous rays flying around in the highest heaven, loving sages with their heart and soul see and realise you at the closest as a messenger of the supreme lord of love and justice and as a mighty bird blazing and flying with golden wings in the vast space of the lord ordainer of the universe. (Rg. 10-123-6)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (नाके) દુઃખ રહિત નિતાન્ત સુખસ્થાન મોક્ષધામમાં (सुपर्णम्) શ્રેષ્ઠ પાલન ધર્મવાળા, (उपपतन्तं त्वा) સ્વામી ભાવથી ઉપસ્થિત તને ઐશ્વર્યવાન પરમાત્માને (हृदा वेनन्तः) હૃદયથી ચાહનાર ઉપાસક (अभ्यचक्षत) લક્ષિત કરે છે. (हिरण्यपक्षम्) સોનેરી પાંખોવાળા પક્ષી સમાન-તેજસ્વી, (वरुणस्य दूतम्) વરણીય પ્રમુખ આનંદના પ્રેરક, (यमस्य योनौ) યમન = નિયમન સંયમના આશ્રયમાં (भुरण्यं शकुनम्) ભ્રમણશીલ સમર્થ પક્ષી જેવાને લક્ષિત કરે છે. (૮)
     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : અત્યંત સુખમય મોક્ષ-ધામમાં સ્વામી ભાવથી ઉપસ્થિત શ્રેષ્ઠ પાલન ધર્મથી યુક્ત, સોનેરી પાંખોવાળા સમર્થ પક્ષી સમાન ભ્રમણ-વ્યાપનશીલ તુજ પરમાત્માને જે અત્યંત વરણીય, સુખના પ્રેરક અને યમ-નિયમ સંયમના આશ્રય પર પ્રાપ્ત થનારને ઉપાસકજન હૃદયથી અનુભૂત કરે છે. (૮)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    देहाचा अधिष्ठाता असलेल्या जीवात्म्याची जेव्हा अध्यात्म मार्गात रुची निर्माण होते, तेव्हा तो अष्टांग योगाच्या अभ्यासाने मोक्ष प्राप्त करू शकतो. ॥१॥

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