Loading...

सामवेद के मन्त्र

  • सामवेद का मुख्य पृष्ठ
  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1872
    ऋषिः - पायुर्भारद्वाजः देवता - संग्रामशिषः छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
    54

    यो꣢ नः꣣ स्वो꣡ऽर꣢णो꣣ य꣢श्च꣣ नि꣢ष्ट्यो꣣ जि꣡घा꣢ꣳसति । दे꣣वा꣡स्तꣳ सर्वे꣢꣯ धूर्वन्तु꣣ ब्र꣢ह्म꣣ व꣢र्म꣣ ममान्त꣢꣯र꣣ꣳ श꣢र्म꣣ व꣢र्म꣣ म꣡मा꣢न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः꣢ । नः꣣ । स्वः꣢ । अ꣡रणः꣢꣯ । यः । च꣣ । नि꣡ष्ट्यः꣢꣯ । जि꣡घा꣢꣯ꣳसति । दे꣣वाः꣢ । तम् । स꣡र्वे꣢꣯ । धू꣣र्वन्तु । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् । श꣡र्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो नः स्वोऽरणो यश्च निष्ट्यो जिघाꣳसति । देवास्तꣳ सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरꣳ शर्म वर्म ममान्तरम् ॥१८७२॥


    स्वर रहित पद पाठ

    यः । नः । स्वः । अरणः । यः । च । निष्ट्यः । जिघाꣳसति । देवाः । तम् । सर्वे । धूर्वन्तु । ब्रह्म । वर्म । मम । अन्तरम् । शर्म । वर्म । मम । अन्तरम् ॥१८७२॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1872
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में वधेच्छु के विनाश का उपाय दर्शाते हैं।

    पदार्थ

    (यः) जो (नः) हमें (स्वः) अपना दुर्भाव, (अरणः) पराया दुर्भाव, (यः च) और जो (निष्ठ्यः) शत्रु का दुर्भाव (जिघांसति) नष्ट करना चाहता है, (तम्) उस काम-क्रोध आदि दुर्भाव का (सर्वे) सब (देवाः) दिव्यगुण वा सदाचारी विद्वान् जन (धूर्वन्तु) वध कर दें। (ब्रह्म) महान् जगदीश्वर (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए, (शर्म) जगदीश की शरण (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए ॥३॥

    भावार्थ

    कभी मनुष्य निज मन से उत्पन्न पाप में प्रवृत्त होता है और कभी परिचित जन से प्रेरित वा शत्रु से प्रेरित पाप में लिप्त होता है। दिव्य विचारों से, विद्वानों के सङ्ग से और परमेश्वर के ध्यान-चिन्तन से उन पापों को नष्ट करके वह निष्पाप और सच्चरित्र हो सकता है ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    पदार्थ

    (यः) जो दोष (स्वः) अपने अन्दर रहनेवाला (अरणः) परसम्बन्धी (च) और (यः) जो (निष्ट्यः) गुप्त—अज्ञात—होने वाला (नः-जिघांसति) हमें मारना चाहता है (सर्वे देवाः) सारे देव—देवों का देव (धूर्वन्तु) नष्ट करे (ममान्तरम् ब्रह्म वर्म) मेरे अन्दर विराजमान ब्रह्म—महान् परमात्मा तथा रक्षक परमात्मा नष्ट करे (शर्म वर्म मम-अन्तरम्) सुखस्वरूप रक्षक परमात्मा नष्ट कर दे॥३॥

    विशेष

    <br>

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    'ब्रह्म व शर्म' रूप कवच

    पदार्थ

    प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘अप्रतिरथ इन्द्र' है- यह इन्द्रियों को वश में करनेवाला अनुपम योद्धा हृदय में चल रहे देवासुर संग्राम का ध्यान करते हुए कहता है (यः) = जो भी (स्वः) = अपना, (अरण:) = पराया [परभूत-शत्रुभूत] (च) = और (यः) = जो (निष्ठ्य:) = परदेशी, बाहर का [foreign, exotic] शत्रु बनकर (नः जिघांसति) = हमें मारने की कामना करता है, (तम्) = उसको (सर्वे देवा:) = सब दिव्य भाव (धूर्वन्तु) = नष्ट कर दें।‘काम, लोभ व मोह' ये हमारे ‘स्व' [अपनों] की भाँति वर्त्तते हुए हमारा विनाश करते हैं। 'क्रोध, मद व मत्सर' ये अरण [पराये] होते हुए हमें विनाश की ओर ले जाते हैं और कई बाह्य शत्रु भी किन्हीं स्वार्थों की पूर्ति के लिए समय-समय पर हमपर आक्रमण किया करते हैं । अप्रतिरथ प्रार्थना करता है कि 'मैं अपने हृदय में दिव्य वृत्तियों का विकास करता हुआ इन सब शत्रुओं को समाप्त कर सकूँ ।( ब्रह्म वर्म मम आन्तरम्) = ज्ञान मेरा आधार कवच हो । अपने सारे अतिरिक्त समय

    को ज्ञान-प्राप्ति में लगाता हुआ मैं इन शत्रुओं से आक्रान्त न किया जा सकूँ । ('शर्म वर्म मम आन्तरम्') = सदा प्रसन्नता की मनोवृत्ति मेरा आन्तर कवच बने। सब घटनाचक्रों में मैं अपने मन:प्रसाद को नष्ट न होने दूँ। ये 'ब्रह्म और शर्म' मुझे सब शत्रुओं के आक्रमण से सुरक्षित करें। इस प्रकार इन शत्रुओं से आक्रमणीय न होता हुआ मैं सचमुच इस मन्त्र का ऋषि ‘अप्रतिरथ' बनूँ। यह अप्रतिरथ अपने जीवन में काम को प्रेम से, क्रोध को करुणा से, लोभ को त्याग से, मोह को चेतना से, मद को विनीतता से तथा मत्सर को मुदिता से पराजित करके सचमुच देवराट् इन्द्र बन जाता है।

    भावार्थ

    हम अपने अतिरिक्त समय को ज्ञान प्राप्ति में लगाते हुए 'काम, लोभ व मोह' से अपने को बचाएँ तथा मानस सन्तुलन को स्थिर रखते हुए हम 'क्रोध, मद व मत्सर' से अनाक्रान्त होते हुए बाह्य शत्रुओं का शिकार न हों !

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    missing

    भावार्थ

    (यः) जो (नः) हमारा (स्वः) सम्बन्धी होकर भी या स्वयं (अरणः) अप्रियाचरण करने वाला है और जो (निष्ठ्यः) दूर रहकर भी छुपे रूप में (नः) हमें (जिघांसति) मारना चाहता है (तं) उसके (सर्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् पुरुष (धूर्वन्तु) विनाश करें। (ब्रह्म) वेदज्ञान और परमेश्वर (मम) मेरा (अन्तरं) भीतरी (वर्म) कवच या रक्षा साधन हो। (शर्म) वह सुखकारी, आनन्दघन सब का शरण दाता हो (मम) मेरा (अन्तरम्) भीतर का एकमात्र रक्षक साक्षी है।

    टिप्पणी

    ‘यो नः स्वो यो अरणः स जात उत निष्टयो यो अस्माँ अभिदासति’ इति (१। १९। ३) इत्यस्याः पूर्वार्धभागः। ‘देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरेम्’ इति (१। १९। ४) इत्यस्या उत्तरार्धमागः इति पाठभेदविवेकः, अथर्व०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१—४ अप्रतिरथ एन्द्रः। ५ अप्रतिरथ ऐन्द्रः प्रथमयोः पायुर्भारद्वाजः चरमस्य। ६ अप्रतिरथः पायुर्भारद्वाजः प्रजापतिश्च। ७ शामो भारद्वाजः प्रथमयोः। ८ पायुर्भारद्वाजः प्रथमस्य, तृतीयस्य च। ९ जय ऐन्द्रः प्रथमस्य, गोतमो राहूगण उत्तरयोः॥ देवता—१, ३, ४ आद्योरिन्द्रः चरमस्यमस्तः। इन्द्रः। बृहस्पतिः प्रथमस्य, इन्द्र उत्तरयोः ५ अप्वा प्रथमस्य इन्द्रो मरुतो वा द्वितीयस्य इषवः चरमस्य। ६, ८ लिंगोक्ता संग्रामाशिषः। ७ इन्द्रः प्रथमयोः। ९ इन्द्र: प्रथमस्य, विश्वेदेवा उत्तरयोः॥ छन्दः—१-४,९ त्रिष्टुप्, ५, ८ त्रिष्टुप प्रथमस्य अनुष्टुवुत्तरयोः। ६, ७ पङ्क्तिः चरमस्य, अनुष्टुप् द्वयोः॥ स्वरः–१–४,९ धैवतः। ५, ८ धैवतः प्रथमस्य गान्धारः उत्तरयोः। ६, ७ पञ्चमः चरमस्य, गान्धारो द्वयोः॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ जिघांसोर्विनाशोपायं दर्शयति।

    पदार्थः

    (यः नः) अस्मान् (स्वः) स्वकीयो दुर्भावः, (अरणः) परकीयो दुर्भावः। [अरणः अपार्णो भवति। निरु० ३।२।] (यः च निष्ठ्यः) शत्रोः दुर्भावः (जिघांसति) हन्तुमिच्छति, (तम्) कामक्रोधादिकं दुर्भावम् (सर्वे) समस्ताः (देवाः) दिव्यगुणाः, सदाचारिणो विद्वांसो जना वा (धूर्वन्तु) हिंसन्तु। [धुर्वी हिंसार्थः, भ्वादिः।] (ब्रह्म) महान् जगदीश्वरः (मम) मदीयम् (अन्तरम्) मध्ये भवम् (वर्म) कवचम् रक्षासाधनम् अस्तु, (शर्म) जगदीशशरणम् (मम) मदीयम् (अन्तरम्) मध्ये भवम् (वर्म) कवचम् रक्षासाधनम् अस्तु ॥३॥२

    भावार्थः

    कदाचिन्मनुष्यः स्वमनोभवे पापे प्रवर्तते कदाचिच्च परिचितजनप्रेरिते शत्रुप्रेरिते वा पापे लिप्यते। दिव्यविचारैर्विद्वत्सङ्गेन परमेश्वरानुध्यानेन च तानि पापानि विनाश्य स निष्पापः सच्चरित्रश्च भवितुं शक्नोति ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    A relative of ours, who is a man of low character, and wants to kill us secretly from a distance, deserves to be tormented by all learned persons. God or Veda is my internal armour. May my pleasant armour be my protector!

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    Anyone, whether our own or a stranger far away non-fighting, or far off and low, that hurts and violates us deserves that the best and enlightened of the nation punish him to nullity. For me, the Lord Almighty and the knowledge within me is my best armour for protection. The Lord Almighty and peace of mind within is the invincible armour for me. (Rg. 6-75-19)

    इस भाष्य को एडिट करें

    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (यः) જે દોષ (स्वः) પોતાની અંદર રહેનાર (अरणः) સંબંધી (च) અને (यः) જે (निष्ट्यः) ગુપ્ત અજ્ઞાત-થનાર (नः जिघांसति) અમને મારવા ઇચ્છે છે (सर्वे देवाः) સમસ્ત દેવો-દેવોના દેવ (धूर्वन्तु) નષ્ટ કરે. (ममान्तरं ब्रह्म वर्म) મારી અંદર વિરાજમાન બ્રહ્મ-મહાન પરમાત્મા તથા રક્ષક પરમાત્મા નષ્ટ કરે. (शर्म वर्म मम अन्तरम्) સુખ સ્વરૂપ રક્ષક પરમાત્મા નષ્ટ કરી નાખે. (૩)
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    कधी मनुष्य स्वत: मनाने उत्पन्न झालेल्या पापात प्रवृत्त होतो व कधी परिचित लोकांकडून प्रेरित होऊन किंवा शत्रूंकडून प्रेरित होऊन पापात लिप्त होतो. दिव्य विचारांद्वारे विद्वानांच्या संगतीने व परमेश्वराच्या ध्यान चिंतनाने, त्या पापांना नष्ट करून तो निष्पाप व सच्चरित्र होऊ शकतो. ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top