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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 19
ऋषिः - प्रयोगो भार्गवः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
65
अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धा꣣नो꣡ मन꣢꣯सा꣣ धि꣡य꣢ꣳ सचेत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धे वि꣣व꣡स्व꣢भिः ॥१९॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्धानः꣢ । म꣡न꣢꣯सा । धि꣡य꣢꣯म् स꣣चेत । म꣡र्त्यः꣢꣯ । अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्धे । वि꣣व꣡स्व꣢भिः । वि꣣ । व꣡स्व꣢भिः ॥१९॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निमिन्धानो मनसा धियꣳ सचेत मर्त्यः । अग्निमिन्धे विवस्वभिः ॥१९॥
स्वर रहित पद पाठ
अग्निम् । इन्धानः । मनसा । धियम् सचेत । मर्त्यः । अग्निम् । इन्धे । विवस्वभिः । वि । वस्वभिः ॥१९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 19
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 2;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 2;
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भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
ईश्वर की आराधना के साथ कर्म भी करे, यह कहते हैं।
पदार्थ
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (मनसा) मन से (अग्निम्) हृदय में छिपे परमात्मा-रूप अग्नि को (इन्धानः) प्रदीप्त अर्थात् प्रकट करता हुआ (मर्त्यः) मरणधर्मा मनुष्य (धियम्) कर्म को (सचेत) सेवे—यह वैदिक प्रेरणा है। उस प्रेरणा से प्रेरित हुआ मैं (विवस्वभिः) अज्ञान को विध्वस्त करनेवाली, आदित्य के समान भासमान मनोवृत्तियों से (अग्निम्) ज्योतिर्मय परमात्माग्नि को तथा कर्म की अग्नि को (इन्धे) प्रदीप्त करता हूँ, हृदय में प्रकट करता हूँ ॥ द्वितीय—यज्ञाग्नि के पक्ष में। यज्ञकर्म के लिए प्रेरणा है। (मनसा) श्रद्धा के साथ (अग्निम्) यज्ञाग्नि को (इन्धानः) प्रदीप्त करता हुआ (मर्त्यः) यजमान मनुष्य (धियम्) यज्ञविधियों को भी (सचेत) करे—यह वेद का आदेश है। तदनुसार मैं भी यज्ञकर्म करने के लिए (विवस्वभिः) प्रातः सूर्यकिरणों के उदय के साथ ही (अग्निम्) यज्ञाग्नि को (इन्धे) प्रदीप्त करता हूँ। इससे यह सूचित होता है कि प्रातः यज्ञ का समय सूर्यकिरणों का उदय-काल है ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थ
यहाँ मर्त्य पद साभिप्राय है। मनुष्य मरणधर्मा है, न जाने कब मृत्यु की पकड़ में आ जाये। इसलिए जैसे यज्ञकर्म करने के लिए अग्नि को प्रज्वलित करता है, वैसे ही इसी जन्म में योगाभ्यास से हृदय में परमात्मा को प्रकाशित करके जीवन-पर्यन्त अग्निहोत्र आदि तथा समाज-सेवा आदि कर्मों को करे। यह न समझे कि यदि परमेश्वर का साक्षात्कार कर लिया, तो फिर कर्मों से क्या प्रयोजन, क्योंकि कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे (य० ४०।२), यही वैदिक मार्ग है ॥९॥
पदार्थ
(मर्त्यः) मनुष्य (अग्निम्-इन्धानः) परमात्मरूप अग्नि को या ज्ञानप्रकाश स्वरूप परमात्मा को अपने अन्दर प्रकाशित—साक्षात् करने के हेतु (मनसा धियं सचेत) मन से परमात्म-चिन्तनरूप कर्म सेवे—करे “धीः कर्मनाम” [निघं॰ २.१] (विवस्वभिः-अग्निम्-इन्धे) कि मैं परिचर्याओं—“विवासति परिचरणकर्मा” [निघं॰ ३.५] निदिध्यासनरूप अभ्यासक्रियाओं के द्वारा परमात्मा को प्रकाशित करूँ—साक्षात् करूँ।
भावार्थ
परमात्मा को अपने अन्दर प्रकाशित—साक्षात् करने के लिये मनुष्य श्रुतियों से परमात्मा के गुणों का श्रवण करके उन्हें जगत् की रचना में मन से मनन करे कि भिन्नभिन्न जीवशरीरों का गठन हाथी और ऊँट जैसे प्राणी को लम्बी सूँड और लम्बी ग्रीवा ऊपर नीचे से खाने को दे देना, भूतल पर ऊँचे स्थान से जलधाराओं को नीचे स्थानों में मार्ग बना बहाते हुए अत्यन्त निम्न स्थान समुद्र में पहुँचाकर भूपृष्ठ पर मनुष्य आदि के निवासार्थ भूभाग बनाना, आकाश में ग्रहतारों को अपनी अपनी गति से चलाने आदि से परमात्मगुणों का मनन कर पुनः आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधिरूप अभ्यास क्रियाओं से निदिध्यासन कर परमात्मा को अपने अन्दर प्रकाशित—साक्षात् करे। सो मैं उपासक ऐसा कर परमात्मा का साक्षात् करूँ॥९॥
विशेष
ऋषिः—भार्गवः प्रयोगः (अध्यात्म अग्नि प्रज्वलान में कुशल प्रयोग कर्ता उपासक)॥<br>
विषय
कर्म का सेवन
पदार्थ
(मर्त्यः)= मनुष्य (मनसा)= मन के द्वारा, चिन्तन के द्वारा (अग्निम्)= संसार के संचालक प्रभु को (इन्धानः)= अपने हृदय में दीप्त करता हुआ (धियम्)= ज्ञानपूर्वक कर्म का (सचेत)= सेवन करे । प्रभु अग्नि है, [अग् गतौ] गतिशील है। मनुष्य को चाहिए कि प्रभु के इस स्वरूप का चिन्तन करता हुआ कर्मशील बने, इसी में मानव - उन्नति का रहस्य छिपा हुआ है।
‘धियं’ शब्द भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है। निरुक्त में उसके 'ज्ञान और कर्म' दोनों ही अर्थ
दिये हैं। ‘ज्ञानपूर्वक कर्म करना' धी शब्द का वाच्य है, अतः मनुष्य उन्हीं कर्मों को करे जो धी शब्द से कहे जाते हैं।
'प्रभु का ज्ञान प्राप्त कैसे होगा ? ' वेद कहता है कि (अग्निम्)= उस आगे ले-चलनेवाले प्रभु को (विवस्वभिः)= ज्ञानियों के साथ अर्थात् उनके सत्सङ्ग से (इन्धे)= दीप्त करे। प्रभु का ज्ञान विद्वानों के सङ्ग से, उनके उपदेशों के श्रवण से होगा। इस प्रकार ज्ञानियों के साथ सम्पर्क रखनेवाले हम इस मन्त्र के ऋषि (‘प्र-योग')= प्रकृष्ट सम्बन्धवाले बनेंगे।
भावार्थ
सत्सङ्ग से प्रभु का ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य विचारपूर्वक कर्म करे।
पदार्थ
शब्दार्थ = ( मर्त्यः ) = मनुष्य ( मनसा ) = सच्चे मन से श्रद्धापूर्वक ( अग्निम् इन्धान: ) = प्रभु का ध्यान करता हुआ ( धियम् ) = बुद्धि को ( सचेत ) = अच्छे प्रकार प्राप्त हो इसलिए ( विवस्वभिः ) = सूर्य की किरणों के साथ ( अग्निम् इन्धे ) = प्रकाशस्वरूप प्रभु को हृदय में विराजमान करे ।
भावार्थ
भावार्थ = मनुष्य का नाम मर्त्य अर्थात् मरणधर्मा है। यदि यह मृत्यु से बचना चाहे तो जगत्पिता की उपासना करे ।
सबको योग्य है कि दो घण्टा रात्रि रहते उठकर प्रभु का ध्यान करें। प्रातः काल सूर्य के निकले कभी सोवें नहीं। प्रभु की भक्ति करें तो लोगों को दिखलाने के लिए दम्भ से नहीं, किन्तु श्रद्धा और प्रेम से ध्यान करते-करते परमात्मा के ज्ञान द्वारा मोक्ष को प्राप्त होकर मृत्यु से तर जावें ।
विषय
परमेश्वर की स्तुति
भावार्थ
भा० = ( अग्निम् ) = अग्नि, प्रकाश स्वरूप ईश्वर को ( मनसा ) = हृदय से ( इन्धानः ) = प्रकाशित करता हुआ ( मर्त्यं : ) = मनुष्य ( धियम् ) बुद्धि या कर्म को ( सचेत ) = प्राप्त हो । ( विवस्वभिः ) = सूर्य के समान विद्वानों द्वारा मैं ( अग्निम् ) = उस प्रकाशक रूप ईश्वर को ( इन्धे१ ) = हृदय में प्रज्वलित करता हूं ।
ईश्वर के मानस ध्यान से मनुष्य बुद्धि और कर्म को सुधारें, उत्तम विद्वानों के संग से ईश्वर का ज्ञान करें ।
टिप्पणी
१ 'ईधे ' इति ऋ० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - प्रयोग:।
छन्द: - गायत्री, ।
संस्कृत (1)
विषयः
ईश्वराराधनेन साकं कर्मापि कुर्यादित्युच्यते।
पदार्थः
प्रथमः—परमात्मपरः। (मनसा) चित्तेन (अग्निम्) प्रच्छन्नरूपेण हृदये स्थितं परमात्माग्निम् (इन्धानः) प्रदीपयन्, प्रकटयन् (मर्त्यः) मरणधर्मा मनुष्यः (धियम्) कर्म। धीरिति कर्मनामसु पठितम्। निघं० २।१। (सचेत) सेवेत, इति वैदिकी प्रेरणा। षचतिः सेवनार्थः। निरु० ४।२१। तत्प्रेरणया प्रेरितोऽहम् (विवस्वभिः२) अज्ञानविवासनशीलाभिः, आदित्यवद् भासमानाभिः मनोवृत्तिभिः। विवस्वान् विवासनवान् इति निरुक्तम्। ७।२६। (अग्निम्) ज्योतिर्मयं परमात्माग्निं कर्माग्निं च (इन्धे) प्रदीपयामि, हृदये प्रकटयामि। ञिइन्धी दीप्तौ, लटि उत्तमैकवचने प्रयोगः ॥ अथ द्वितीयः—यज्ञाग्निपरः। यज्ञकर्मणे प्रेरयति। (मनसा) श्रद्धया (अग्निम्) यज्ञाग्निम् (इन्धानः) प्रदीपयन् (मर्त्यः) यजमानो मनुष्यः (धियम्) कर्म अपि, यज्ञविधिमपि (सचेत) सेवेत, कुर्यादिति भावः। इति वेदादेशः। तदनुसृत्य, अहमपि यज्ञकर्म कर्तुम् (विवस्वभिः) सूर्यकिरणैः साकम् (अग्निम्) यज्ञाग्निम् इन्धे प्रदीपयामि। एतेन प्रातः सूर्यकिरणाविर्भावकाल एव यज्ञकाल इति सूच्यते ॥९॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥९॥
भावार्थः
मर्त्यः इति पदं साभिप्रायम्। मरणधर्मा हि मानवः, न जाने कदा मृत्युना गृह्येत। अतो यज्ञकर्म कर्तुं यथाऽग्निं प्रकाशयति तथाऽस्मिन्नेव जन्मनि योगाभ्यासेन हृदये परमात्मानं प्रकाश्य यावज्जीवनमग्निहोत्रादीनि समाजसेवादीनि च वेदविहितानि कर्माण्याचरेत्। नैतन्मन्येत परमेश्वरश्चेत् साक्षात्कृतः कृतं कर्मभिरिति यतः कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः (य० ४०।२) इत्येव वैदिकः पन्थाः ॥९॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।१०२।२२, अग्निमिन्धे इत्यत्र अग्निमीधे इति पाठः। २. विवस्वभिः तमसां विवासयितृभिः हविर्भिः—इति वि०। विवः धनम्, तद्वद्भिः, हविर्लक्षणधनयुक्तैः काष्ठैः—इति भ०। ऋत्विग्भिरिति सा०।
इंग्लिश (4)
Meaning
Man, kindling God in mind, develops his intellect, I realise the Effulgent Lord in my heart, in the company of the learned.
Translator Comment
विवस्वभिः has been translated by Swami Tulsi Ram as rays of the Sun. In early dawn when the rays of the sun begin to shine, one should perform Sandhya, and say his daily prayer. Pt. Jaidev Vidyalankar translates the word in the company of the learned persons.
Meaning
When the mortal starts lighting the fire in the vedi, let him, with his whole mind in concentration, call up all his faculties of perception, thought and action and say: I light the fire with the sun rays and, all my knowledge, will and awareness, awaken the divine in the soul. (Rg. 8-102-22)
Translation
When a man enkindles fire
' Let him ponder o’er the fire within
Fire of knowledge that destroys
All impurity and all sin.
Let his mind and intellect
Be united to reform
All bad habits that harm
And take away his charm.
Comments
धियम- धीरिति प्रज्ञानाम (निघ० ३.६) कमनाम (निघ० २.१) | बिवस्वभि:---सूर्य किरणवत् प्रकाशहेतुभिर्ध्यांन धारणा समाधिभिः |
Translation
Let a man, when he kindles the inner fire of enlightenment, complete the performance with a devout mind; let him do this with the guidance of the elders adept in this secret. (Cf. Rv VIII. 102.22)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (मर्त्यः) મનુષ્ય (अग्निम् इन्धानः) પરમાત્મારૂપ અગ્નિને અથવા જ્ઞાન-પ્રકાશસ્વરૂપ પરમાત્માને પોતાની અંદર પ્રકાશિત-સાક્ષાત્ કરવા માટે (मनसा धियं सचेत) મનથી પરમાત્માનું સેવન કરે કે - (विवस्विभिः अग्निम् इन्धे) હું વિવાસતિ = પરિચર્યા કર્મો યથા - નિદિધ્યાસન, અભ્યાસ, ક્રિયાઓ દ્વારા પરમાત્માને પ્રકાશિત કરું - સાક્ષાત્ કરું. (૯)
भावार्थ
ભાવાર્થ : પરમાત્માને પોતાની અંદર પ્રકાશિત અર્થાત્ સાક્ષાત્ કરવા માટે મનુષ્ય શ્રુતિઓ દ્વારા પરમાત્માના ગુણોનું શ્રવણ કરીને તેને જગતની રચનાનું મનથી મનન કરવું જોઈએ. યથા વિભિન્ન હાથી અને ઊંટ જેવા પ્રાણીઓનાં શરીરની રચનામાં લાંબી સૂંઢ અને ઊંચી ડોકથી ઉપર અને નીચેથી ખાવાનું પ્રાપ્ત કરે છે, ભૂતલ પર ઊંચા સ્થાનો પરથી જલની ધારાઓ નીચેના સ્થાનમાં વહાવીને, અત્યંત નીચેના સ્થાન સમુદ્રમાં પહોંચાડીને, ભૂમિ પર મનુષ્ય આદિના નિવાસ માટે જમીનની રચના કરવી, આકાશમાં ગ્રહ, તારા વગેરેને તેઓની ગતિમાં ચલાવવા વગેરેનાં પરમાણુઓનું મનન-ચિંતન ધ્યાન અને સમાધિરૂપ અભ્યાસ ક્રિયાઓથી નિદિધ્યાસન કરીને પરમાત્માને પોતાની અંદર પ્રકાશિત-સાક્ષાત્ કરે. હું ઉપાસક આ રીતે પરમાત્માનો સાક્ષાત્કાર કરું. (૯)
उर्दू (1)
Mazmoon
بھگوان کا دھیان اُوشا کی چمک میں
Lafzi Maana
(اگنم) جیوتی سوروپ پرمیشور کو (اےندھانہ) آتما میں پرکاشت کرتا ہوا (مرتیہ) موت کے بھے سے بچنے والا منش (منسا) من کی پوری شردھا یا یا عقیدت سے (دکھاوے سے نہیں) (دھیّم) بُدھی اور کرم کو (سچیت) ملا کر ایشور کی بندگی کرے (وِو سوبھی) اُوشا کی پہلی کرن کے ساتھ۔ گیان جیوتیوں یا گیانی مہاتماؤں کی سنگتی سے (اگنم) اُس دُنیا کے والی خدائی نور کو ہردیہ میں (رندھے) روشن کرے۔
Tashree
بھگتی کے مطابق کرم: منش کا مرتیہ نام اس لئے ہے کہ وہ موت کے سُپرد ہو جائے گا۔ اِس لئے اُس سی مُکتی یا نجات پانے کے لئے اُس رہبرِاعظم اگنی پرمیشور کا پّلہ پکڑتا ہے۔ منتر کا اُپدیش ہے کہ پُو پھٹنے کے اُوشا کال میں بھگوان کے دھیان میں بیٹھ کر اُس کو دل میں روشن کرے (2) اور اپنے تمام کام ایشور کے گُنوں کے مطابق کرنے میں کوشاں رہے جو سچی عبادت ہے۔ پوّتر جیوتی (۳) ایشور کا گیان پراپت کرنے کے لئے گیانی وِدوانوں کا ست سنگ کرتا رہے۔
बंगाली (1)
পদার্থ
অগ্নিমিন্ধানো মনসা, ধিয়ং সচেত মর্ত্যঃ।
অগ্নিমিন্ধে বিবস্বভিঃ।।৬।।
(সাম ১৯)
পদার্থঃ (মর্ত্যঃ) মনুষ্য (মনসা) সৎ মন দ্বারা শ্রদ্ধা পূর্বক (অগ্নিম্ ইন্ধানঃ) পরমেশ্বরের ধ্যান করে (ধিয়ম্) বুদ্ধিবৃত্তিকে (সচেত) উত্তম ভাবে প্রাপ্ত করে। এজন্য (বিবস্বভিঃ) সূর্যের কিরণের সাথে (অগ্নিম্ ইন্ধে) জ্যোতিস্বরূপ পরমাত্মাকে হৃদয়ে বিরাজমান করো।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ মনুষ্যের একটি নাম হচ্ছে 'মর্ত্য'। কারণ মনুষ্য মরণশীল। যদি কোন মনুষ্য জন্ম-মৃত্যু চক্র থেকে বাঁচতে চায়, তবে তাকে অবশ্যই জগৎপিতা পরমেশ্বরের উপাসনা করতে হবে। কেননা একমাত্র পরমেশ্বরই আমাদের মোক্ষরূপ অমৃত প্রদান করতে পারেন। এজন্য সবারই উচিত দ্বিসন্ধ্যা পরমেশ্বরের ধ্যান করা এবং প্রাতঃকালে সূর্য উদিত হলে কখনও শুয়ে না থাকা। সেই পরমেশ্বরকে ভক্তি করার জন্য লোক দেখানো আড়ম্বরের প্রয়োজন নেই, বরং শ্রদ্ধা এবং প্রেম দ্বারা ধ্যান করার মাধ্যমেই পরমাত্মার জ্ঞান দ্বারা মোক্ষ প্রাপ্ত হয়ে মৃত্যুকে অতিক্রম করা যায়।।৬।।
मराठी (2)
भावार्थ
येथे मर्त्य पद साभिप्राय आहे. मनुष्य मरणधर्मा आहे. कधी मृत्यूच्या जबड्यात सापडेल हे सांगता येत नाही. त्यासाठी जसे यज्ञकर्म करण्यासाठी अग्नीला प्रज्वलित केले जाते, तसेच या जन्मात योगाभ्यासाने हृदयात परमात्म्याला प्रकाशित करून जीवनापर्यंत अग्निहोत्र, समाजसेवा इत्यादी कर्म करावे. परमेश्वराचा साक्षात्कार झाल्यावर कर्म करण्याचे काय प्रयोजन, असे वाटता कामा नये, कारण कर्म करतच शंभर वर्षे जगण्याची इच्छा बाळगावी. (य. ४०/२) हाच वैदिक मार्ग आहे. ॥९॥
विषय
ईश्वराच्या आराधने व्यतिरिक्त कर्म वा पुरुषार्थही केला पाहिजे, असे सांगतात. -
शब्दार्थ
(प्रथम अर्थ - परमात्मपरक) (मनसा) मनाने (अग्निम्) हृदयात दडून बसलेल्या परमात्मरूप अग्नीला (इन्धान:) प्रदीप्त करीत म्हणजे प्रकट करीत (मर्त्य:) मरणधर्मा मनुष्याने (धियम) कर्माचे (सचेत) सेवन करावे. (प्रार्थनेबरोबरच मनुष्याने पुरुषार्थदेखील अवश्य केला पाहिजे.) हीच वैदिक प्रेरणा वा उपदेश आहे. त्या प्रेरणेने प्रेरित होऊन मी (एक उपासक) (विवस्वभि:) अज्ञान उद्ध्वस्त करणाऱ्या आदित्याप्रमाणे भासमान मनोवृत्तीद्वारे (अग्निम्) ज्योतिर्मय परमात्म अग्नीला तसेच कर्मरूप अग्नीला (इन्द्रे) प्रदीप्त करतो, हृदयात प्रकट करतो. ।।९।। द्वितीय अर्थ : (यज्ञाग्नीपरक) या मंत्रात यज्ञाविषयी प्रेरणा केली आहे. (मनसा) संपूर्ण श्रद्धेसह (अग्निम्) यज्ञाग्नी (इन्धान:) प्रज्वलित करताना (मर्त्य:) यजमान मनुष्याने (धियम्) यज्ञविधींचेदेखील (सचेत) पालन करावे. हा वेदांचा आदेश आहे. त्याप्रमाणे मी देखील यज्ञकर्म करण्यासाठी (विवस्वभि:) प्रात:काळी सूर्यकिरणांच्या उदयकाळी (अग्निम्) यज्ञाग्नी (इन्धे) प्रदीप्त करतो. या कथनाने असे सूचित होत आहे की, प्रात:काळी यज्ञाची वेळ ती जाणावी. जेव्हा सूर्यकिरणांचा प्रथम उदय होतो. ।।९।।
भावार्थ
येथे मर्त्य हा शब्द साभिप्राय म्हणजे हेतुत: वापरला आहे. माणूस मरणधर्मा आहे. कोण सांगावे, केव्हा मृत्यू येऊन झडप घालील. यामुळे जसे मनुष्य यज्ञकर्म करण्यासाठी अग्नी प्रज्वलित करतो, तसेच याच जन्मी योगाभ्यासाद्वारे हृदयी परमेश्वराला प्रकाशित करून आजन्म अग्निहोत्र आदी कर्म आणि समाजसेवा आदी उत्तम कर्मे मनुष्याने अवश्य करावीत. मनुष्याने असा विचार करू नये की आता परमेश्वराचा साक्षात्कार संपन्न केला आहे, मग कर्म करण्याचे काय प्रयोजन? कारण (यजु. ४०/२) मंत्रात म्हटले आहे. कर्म करीतच शंभर वर्ष जगण्याची इच्छा करावी. वैदिक मार्गदेखील हाच आहे. ।।९।।
विशेष
या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. ।।९।।
तमिल (1)
Word Meaning
மனிதன் அக்னியை மூட்டுங்கால் மனத்தோடு எந்தச் செயலையும் செய்ய வேண்டும். இருள் நீக்குபவைகளால் நான் [1] (அக்னியை) மூட்டுகிறேன்.
FootNotes
[1] அக்னியை - அறிவை
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