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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 273
ऋषिः - पुरुहन्मा आङ्गिरसः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
22
यो꣡ राजा꣢꣯ चर्षणी꣣नां꣢꣫ याता꣣ र꣡थे꣢भि꣣र꣡ध्रि꣢गुः । वि꣡श्वा꣢सां तरु꣣ता꣡ पृत꣢꣯नानां꣣ ज्ये꣢ष्ठं꣣ यो꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣢ गृ꣣णे꣢ ॥२७३॥
स्वर सहित पद पाठयः꣢ । रा꣡जा꣢꣯ । च꣣र्षणीना꣢म् । या꣡ता꣢꣯ । र꣡थे꣢꣯भिः । अ꣡ध्रि꣢꣯गुः । अ꣡ध्रि꣢꣯ । गुः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯साम् । त꣣रुता꣢ । पृ꣡त꣢꣯नानाम् । ज्ये꣡ष्ठ꣢꣯म् । यः । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । गृ꣣णे꣢ ॥२७३॥
स्वर रहित मन्त्र
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः । विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठं यो वृत्रहा गृणे ॥२७३॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । राजा । चर्षणीनाम् । याता । रथेभिः । अध्रिगुः । अध्रि । गुः । विश्वासाम् । तरुता । पृतनानाम् । ज्येष्ठम् । यः । वृत्रहा । वृत्र । हा । गृणे ॥२७३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 273
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 5;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 5;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
प्रथम मन्त्र में परमात्मा और राजा के गुणों का वर्णन किया गया है।
पदार्थ
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (यः) जो इन्द्र परमेश्वर (चर्षणीनाम्) मनुष्यों का (राजा) सम्राट् (रथेभिः याता) मानो रथों से यात्रा करनेवाला अर्थात् रथयात्री के समान शीघ्रव्यापी, (अध्रिगुः) बेरोक गतिवाला तथा (विश्वासाम्) सब (पृतनानाम्) शत्रु-सेनाओं का, अर्थात् शत्रुभूत कामज-क्रोधज आदि गणों का (तरुता) पराजित करनेवाला है, (यः) और जो (वृत्रहा) पापों का संहारक है, उस (ज्येष्ठम्) गुणों में सबसे श्रेष्ठ तथा अनादि होने से आयु में भी सबसे वृद्ध परमेश्वर की, मैं (गृणे) स्तुति और अर्चना करता हूँ ॥ कामज और क्रोधज गणों का उल्लेख मनु ने इस प्रकार किया है—शिकार करना, जुआ खेलना, दिन में सोना, दूसरों की निन्दा करना, दूसरों की स्त्रियों का सेवन करना, नशा करना, अनुचित रूप से बाजे बजाने में लगे रहना, व्यर्थ इधर-उधर घूमना—ये दस काम के गण हैं। चुगली, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, अर्थशुचि न होना, वाणी और दण्ड की कठोरता होना—ये आठ क्रोध के गण हैं। (मनु. ७।४७, ४८)। साधक की उपासना में विघ्न डालनेवाले इन शत्रुगणों को परमेश्वर पराजित कर देता है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (यः) जो (चर्षणीनाम्) मानुषी प्रजाओं का (राजा) राजा, (रथेभिः) जल, स्थल और अन्तरिक्ष में चलनेवाले यानों से (याता) आवागमन करनेवाला, (अध्रिगुः) न रोकी जा सकने योग्य गतिवाला और (विश्वासाम्) सब (पृतनानाम्) रिपुसेनाओं का (तरुता) पराजेता है, (यः) और जो (वृत्रहा) विघ्नकारी शत्रुओं का संहारक है, उस (ज्येष्ठम्) वीरता आदि गुणों में श्रेष्ठ राजा को, मैं (गृणे) पुकारता हूँ, उसकी स्तुति करता हूँ, उसे प्रोत्साहित करता हूँ, उसका सत्कार करता हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है। परमेश्वर-पक्ष में याता रथेभिः में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥१॥
भावार्थ
जैसे ब्रह्माण्ड का राजराजेश्वर, संकटों से बचानेवाला, किसी से प्रतिहत न होनेवाला, विजयार्थ प्रयत्नशील दिव्य गुणों की सेनाओं को विजय दिलानेवाला, काम-क्रोध आदि की सेनाओं का ध्वंस करनेवाला, ज्येष्ठ और श्रेष्ठ परमात्मा सबके द्वारा उपासना करने योग्य है, वैसे ही बिजली आदि से चलाये जानेवाले विमान आदि यानों से जाने-आनेवाला, समस्त शत्रुओं को जीतनेवाला वीर राष्ट्रनायक भी संकटकाल में प्रजाजनों द्वारा पुकारने योग्य, प्रोत्साहन देने योग्य तथा गुण-कर्मों की प्रशंसा करके कीर्ति गाने योग्य है ॥१॥
पदार्थ
(यः-चर्षणीनां राजा) जो आदित्य के समान ज्ञान से प्रकाशमान जनों का राजा—दीपयिता—ज्ञानदाता “चर्षणयः-मनुष्याः” [निघं॰ २.३] “चर्षणिः- चायितादित्यः” [निरु॰ ५.२४] (रथेभिः-अध्रिगुः-याता) रथों—वेग वाले यानों के द्वारा जाने वालों का उनमें भी अधृतगमन—अप्राप्त गति वाला जाने वाला “अध्रिगुरधृतगमनः” [निरु॰ ५.१०] (विश्वासां पृतनानां तरुता) समस्त युद्ध करने वाली शक्तियों का “युधौ वै पृतनाः” [श॰ ५.२.४.१६] तारक—तारयिता प्रेरक “तरुतारं तारयितारम्” [निरु॰ १०.२९] (यः-वृत्रहा ज्येष्ठः) जो पापाज्ञाननाशक महान् है (गृणे) मैं उसे स्तुति में लाऊँ—उसकी स्तुति करूँ।
भावार्थ
जो सूर्यसमान ज्ञानप्रकाश से प्रकाशमान ज्ञानियों का—आदि ऋषियों का प्रकाशक ज्ञानदाता है, जो तीव्र गतिवाले यानों से जाने वालों का भी—उनमें—उनसे भी अप्राप्त गति वाला विभु—गतिवाला जाने वाला है और समस्त युद्ध करने वाली शक्तियों—विद्युत् आदियों का प्रेरक है जो पाप अज्ञानों का नाशक अति महान् है उसकी मैं स्तुति करता हूँ अर्थात् ज्ञान, गति, शक्ति, पापाज्ञाननिवृत्ति का अधिष्ठाता परमात्मा है उसकी स्तुति करनी चाहिए॥१॥
विशेष
ऋषिः—पुरुहन्मा (बहुतों को अध्यात्म में प्रेरित कर्त्ता)॥<br>
विषय
पुरुहन्मा का जीवन
पदार्थ
इस मन्त्र का ऋषि पुरुहन्मा है- पालक व पूरक गतिवाला। इसका जीवन इतना उत्तम बनता है कि प्रभु कहते हैं कि (गृणे) = मैं इसकी प्रशंसा करता हूँ। हम प्रभु से प्रशंसनीय हों, इससे उत्तम बात क्या हो सकती है? 'गृणे' का अर्थ 'उपदेश देता हूँ' भी होता है। प्रभु ने सृष्टि के प्रारम्भ में अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को वेदज्ञान दिया, क्योंकि ('यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्') =इनका जीवन श्रेष्ठ व निर्दोष था। पुरुहन्मा के जीवन को भी प्रभु निर्दोष समझते हैं- और उसे उपदेश देते हैं। यह निर्दोष जीवन निम्न शब्दों में चित्रित हो रहा है|
१.( यः चर्षणीनां राजा) = जो श्रमशीलों के अन्दर चमकनेवाला है। उत्पादक श्रम करनेवाले पुरुषों का मुखिया है। [चर्षणय:- कर्षणयः]
२. (रथेभिः याता)=इस शरीररूप रथ तथा उसमें जुते हुए ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप घोड़ों, मनरूपी लगाम व बुद्धिरूप सारथि के द्वारा अपने लक्ष्य को प्राप्त करेनेवाला बनता है। ‘रथेभिः’ यह बहुवचन का प्रयोग रथ के सारे अङ्गों के बाहुल्य के विचार से ही हुआ है।
३. (अध्रिगुः)=[अधृतगमनः] - अल्पज्ञता व अल्पशक्तिवश कहीं-कहीं इससे गलती हो ही जाती है—यह लड़खड़ा जाता है, परन्तु असफलताओं से निराश नहीं हो जाता, सँभलकर फिर आगे बढ़ता है। इसी का परिणाम है कि -
४. (विश्वासां पृतनानाम्) = अभ्यास के द्वारा, शक्तियों का विस्तार करनेवालों में यह सबसे आगे बढ़ जाता है, (तरुता) = इन्हें तैर जाता है। ('अति समं क्राम') = इस वेदोपदेश को यह क्रियान्वित करता है।
५. (ज्येष्ठम्)=सभी से आगे बढ़ जाने के कारण ही यह ज्येष्ठ है। (यः वृत्रहा) = यह सब वासनाओं का विनष्ट करनेवाला है। इसे प्रभु प्रशंसित करते हैं और उपदेश देते हैं।
भावार्थ
हमारे जीवनों में भी वह दिन आये जब हम प्रभु से प्रशंसित व उसके उपदेश के अधिकारी समझे जाएँ ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = ( यः ) = जो ( चर्षणीनां ) = द्रष्टा इन्द्रियों या मनुष्यों का ( राजा ) = शासक, प्रकाशक या उनके बीच में स्वतः प्रकाशमान है और जो ( रथेभिः ) = रमण करने, भोग करने के साधन देहों या प्राणेन्द्रियों से ( याता ) = विषयों तक गमन करने हारा, ( अध्रिगुः ) = इन्द्रियों पर वश करने हारा अधिष्टाता है और ( यः ) = जो ( वृत्रहा ) = सब अज्ञानों का नाशक, ( विश्वासां ) = समस्त ( पृतनानां ) = सेनाओं के समान वासनाओं तथा मनुष्यों का ( तरुता ) = विनाशक या पार करनेहारा है उस ( ज्येष्ठम् ) = सब से श्रेष्ठ आत्मा की मैं ( गृणे ) = स्तुति करता हूं । राजा और ईश्वर पक्ष में स्पष्ट है ।
'अध्रिगुः-' अधिकृतशब्दस्य अध्रिभाव इति दे० य० । पृतना इति मनुष्यनाम नि० २ । ४ ।। संग्रामनाम च । नि० २ । १७ ।।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - पुरुहन्मा ।
देवता - इन्द्रः।
छन्दः - बृहती।
स्वरः - मध्यमः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमात्मनो राज्ञश्च गुणान् वर्णयति।
पदार्थः
प्रथमः—परमात्मपरः। (यः) इन्द्रः परमेश्वरः (चर्षणीनाम्) मनुष्याणाम् (राजा) सम्राट्, (रथेभिः) रथैरिव इति लुप्तोपमम्, (याता) सज्जनान् गन्ता, (अध्रिगुः२) अधृतगमनः, शत्रुभिरप्रतिरुद्धगतिः, (विश्वासाम्) समस्तानाम् (पृतनानाम्) शत्रुसेनानाम्, कामजक्रोधजादिगणानाम् (तरुता३) उल्लङ्घयिता, पराजेता वर्तते। तॄ प्लवनसंतरणयोः तृचि ‘ग्रसितस्कभितस्तभित० अ० ७।२।३४’ इति उडागमो निपात्यते। (यः) यश्च इन्द्रः परमेश्वरः (वृत्रहा) पापहन्ता विद्यते, तम् (ज्येष्ठम्) गुणैः (प्रशस्यतमम्), अनादित्वाद् वयसाऽपि च वृद्धतमम्। अतिशयेन प्रशस्यो वृद्धो वेत्यर्थे इष्ठनि ‘ज्य च’ ‘वृद्धस्य च’ अ० ५।३।६१।६२ इति क्रमशः प्रशस्यवृद्धाभ्यां ज्यादेशः। अहम् गृणे स्तौमि अर्चामि वा। गॄ शब्दे, क्र्यादिः, गृणातिः अर्चतिकर्मा। निघं० ३।१४। स्तुतिकर्मा। निरु० ३।५ ॥ कामजक्रोधजगणाः मनुना एवं वर्णिताः—मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः। तौर्य्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्यासूयार्थदूषणम्। वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः। (मु० ७।४७, ४८)। एवं लोभादिगणा अपि विज्ञेयाः। उपासनाप्रतिरोधकान् तान् शत्रुगणान् परमेश्वरः पराजयते ॥ अथ द्वितीयः—राजपरः. (यः चर्षणीनाम्) मानुषीणां प्रजानाम् (राजा) सम्राट्, (रथेभिः) जलस्थलान्तरिक्षयानैः (याता) गन्ता, (अध्रिगुः) अप्रतिरुद्धगमनः, किञ्च (विश्वासाम्) सर्वासाम् (पृतनानाम्) रिपुसेनानाम् (तरुता) पराजेता विद्यते, (यः) यश्च (वृत्रहा) विघ्नकारिणां शत्रूणां हन्ताऽसि, तम् (ज्येष्ठम्) वीरत्वादिगुणैः प्रशस्यतमम् इन्द्रं राजानम् (गृणे) आह्वयामि, स्तौमि, प्रोत्साहयामि, सत्करोमि च ॥१॥ अत्र श्लेषोऽलङ्कारः। परमेश्वरपक्षे ‘याता रथेभिः’ इत्यत्र व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा ॥१॥
भावार्थः
यथा ब्रह्माण्डस्य राजराजेश्वरः संकटेभ्यस्त्राता केनाप्यप्रतिहतो विजयाय प्रयतमानानां दिव्यगुणचमूनां विजयप्रदाता कामक्रोधादिसेनानां ध्वंसको ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च परमात्मा सर्वैरुपासनीयः, तथैव विद्युदादिभिश्चाल्यमानैर्विमानादिभिर्गन्ताऽऽगन्ता सकलशत्रुविजेता वीरो राष्ट्रनायकोऽपि संकटकाले प्रजाजनैराह्वातव्यो गुणकर्मप्रशंसनैः कीर्तनीयश्च ॥१॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।७०।१, अथ० २०।९२।१६, २०।१०५।४ सर्वत्र ‘ज्येष्ठं’ इत्यत्र ज्येष्ठो इति पाठः। साम० ९३३। २. द्रष्टव्यम्—निरु० ५।११ यत्र गवि अधिकृतत्वान्मन्त्रः, तच्छब्दवत्त्वात् प्रशासनम्, अधृतगमनत्वात् कर्मवत्वाच्च अग्निरिन्द्रश्च अध्रिगुशब्दवाच्यानि उक्तानि। ३. विश्वासां तरुता पृतनानां सर्वासां निस्तारिता, जेता सङ्ग्रामभूमीनाम्—इति वि०। तरुता हन्ता—इति भ०। तारकः इति सा०।
इंग्लिश (2)
Meaning
I eulogise that Great God, Who is the Lord of men, attainable through Yogic practices, Immutable in nature, the Punisher of the wicked and ignoble, and the Vanquisher of fighting hosts.
Meaning
I adore Indra, lord supreme, who rules the people, and who is the irresistible and universal mover by waves of cosmic energy, saviour of all humanity, supreme warrior and winner of cosmic battles of the elemental forces and who destroys the evil, darkness and poverty of the world. (Rg. 8-70-1)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (यः चर्षणीनां राजा) જે સૂર્યની સમાન જ્ઞાનથી પ્રકાશમાન જનોના રાજા - દીપયિતા - જ્ઞાનદાતા (रथेभिः अध्रिगुः याता) રથો - વેગવાન વાહનો દ્વારા જનારના તેમાં પણ અધૃતગમન - અપ્રાપ્ત ગતિવાળા જનાર (विश्वासां पृतनानां तरुता) સમસ્ત યુક્ત કરનારી શક્તિઓના તારક - તારનાર પ્રેરક (यः वृत्रहा ज्येष्ठः) જે પાપજ્ઞાનનાશક મહાન છે (गृणे) હું તેને સ્તુતિમાં લાવું - તેની સ્તુતિ કરું . ( ૧ )
भावार्थ
ભાવાર્થ : જે સૂર્ય સમાન જ્ઞાનપ્રકાશથી પ્રકાશમાન જ્ઞાનીઓના - આદિ ઋષિઓના પ્રકાશક જ્ઞાનદાતા છે , જે તીવ્ર ગતિવાળા વાહનો જનારના પણ - તેમાં તેનાથી પણ અપ્રાપ્ત ગતિવાળો વિભુ - ગતિમાન જનાર છે અને સમસ્ત યુદ્ધ કરનારી શક્તિઓ - વિદ્યુત્ આદિનો પ્રેરક છે , જે પાપ અજ્ઞાનોનો નાશક અત્યંત મહાન છે , તેની હું સ્તુતિ કરું છું . અર્થાત્ ( ૧ ) જ્ઞાન , ( ૨ ) ગતિ , ( ૩ ) શક્તિ અને ( ૪ ) પાપ જ્ઞાન નિવૃત્તિ એ ચારેયના અધિષ્ઠાતા પરમાત્મા છે , તેની સ્તુતિ કરવી જોઈએ . ( ૧ )
उर्दू (1)
Mazmoon
شہنشاہوں کا شہنشاہ!
Lafzi Maana
جو پرمیشور منشیوں (چرشنی نام راجہ) کا راجہ ہے، (رتھے بھی یاتا) سُورج چاند تاروں کے رتھوں سے مانو سب جگہ جا آرہا ہے، (ادھری گو) جس کو کوئی روک نہیں کستا، (یہ وِشو اسام پرتنا نام تُروتا) جو سب شیطانی طاقتوں پر فتح پاتا رہتا ہے اور گُناہوں سے نجات دِلاتا ہے، (جیشٹھم گُنے) میں اُس اِیشور کا گُن کیرتن کرتا ہوں۔
Tashree
جیشٹھ سب سے شریشٹھ ہے جو شتُرو سینا کاوجئی، شہنشاہوں کا شہنشاہ چندر سُورج کارتھئی۔
मराठी (2)
भावार्थ
जसा ब्रह्मांडाचा राजराजेश्वर, संकटमोचक, कुणाकडून पराभूत न होणारा, विजय मिळविण्यासाठी प्रयत्नशील, दिव्य गुणांच्या सेनेला विजय प्राप्त करून देणारा, काम, क्रोध इत्यादी सेनेला ध्वस्त करणारा, ज्येष्ठ व श्रेष्ठ परमात्मा सर्वांकडून उपासना करण्यायोग्य आहे, तसेच विद्युत इत्यादीद्वारे चालणारी विमाने इत्यादी यानांनी जाणारा-येणारा, संपूर्ण शत्रूंना जिंकणारा वीर राष्ट्रनायकही संकटकाळात प्रजाजनांद्वारे आमंत्रित करण्यायोग्य, प्रोत्साहन देण्यायोग्य व गुणकर्मांची प्रशंसा करून कीर्तिगान गाण्यायोग्य आहे. ॥१॥
विषय
परमात्मा व राजा यांच्या गुणांचे वर्णन
शब्दार्थ
प्रथम अर्थ - (परमात्मपर) - (यः) जो इंद्र परमेश्वर (चर्षणीनाम्) मनुष्यंचा (राजा) सम्राट आहे, जो (रथेभिः याता) जणू काही त्यांचसह रथाने यात्रा करणारा म्हणजे शीघ्रगामी असून (अधिग्रुः) निर्बाध गतीने जाणारा आणि (विश्वासाम्) सर्व (पृतनानाम्) शत्रुसैन्याचा म्हणजे शत्रूभूत कामज - क्रोधज दोषगणांना (तरुता) पराभूत करणारा आहे आणि (यः) जो (वृत्रहा) पाप-संहारक आहे, त्या (ज्येष्ठम्) गुणामध्ये जो सर्वश्रेष्ठ आहे, तो अनादी असल्यामळे आयूमध्ये सर्वांपेक्षा दीर्घायू आहे. मी त्या परमेश्वराची (गृणे) स्तुतीव अर्चना करतो.।। कामज आणि क्रोधज गुणांचा उल्लेख मनूने या स्वरूपात केला आहे - शिकार करणे, जुगार, दिवसा जोपणे, परनिन्दा, पर स्त्री सेवन, मद्यपान अनुचित रीतीने वाद्य वाजविणे (ढोल ताशे वाजवून उगाच गोंधल घालणे), उगाच निष्कारण इकडे तिकडे भटकणे, हे दहा गण कामकज आहेत. वेडे धाडस करणे, द्रोह, ईर्षा, असूमा, अर्थशुची नसणे (भ्रष्टाचार वा दुराचाराद्वारे धर्नार्जन) कठोर वाणी, कटोर दंड देणे, हे आठ क्रोधज गण आहेत. (मनुस्मृती ७/४७/४८) साधकाच्या उपासनेमध्ये विघ्न व्यलय आणणाऱ्या या शत्रुगणास परमेश्वर पराजित करतो.।। द्वितीय पक्ष - (राजापूर) - (यः) जो (चर्षणीनाम्) मानुषी प्रजेचा (राजा) राजा असून (रथेभिः) जल, स्थल व अंतरिक्षात गती करणाऱ्या यानांद्वारे (याता) येणे-जाणे करतो आणि ज्याच्या (अधिग्रुः) गतीला वा आक्रमणाला कुणी रोकू शकत नाही, तसेच जो (विश्वासाम्) सर्व (पृतनानाम्) शत्रुसैन्याचा (तरूता) पराभव करणारा आहे, याशिवाय (यः) जो (वृत्रहा) विघ्नकारी शत्रूंचा संहारक आहे, त्या (ज्येष्ठम्) वीरत्व आणि गुणात श्रेष्ठ असलेल्या राजाला मी (एक नागरिक, प्रजाजन) (गृणे) हाक मारतो, त्याची स्तुती करतो. त्याला प्रोत्साहन देतो आणि त्याचा सत्कार करतो.।।१।।
भावार्थ
जसे ब्रह्मांडाचा राजराजेश्वर परमेश्वर संकटातून तारणारा, कुणाकडूनही प्रतिहत न होणारा विजयासाठी यत्नशील मनुष्याला दिव्य गुण समूहाद्वारे विजय मिळवून देणारा, काम - क्रोधादीच्या सैन्याला उद्ध्वस्त करणारा आणि ज्येष्ठ व श्रेष्ठ आहे आणि म्हणूनच जो उपासनीय आहे, त्याचप्रमाणे विद्युतादी शक्तीद्वारे चालणाऱ्या विमानादी साधनांनी येणा- जाणारा, समस्त शत्रूंना पराभूत करणारा राष्ट्रनायक राजादेखील संकटकाळी साह्याकरिता प्रजाजनांसाठी आवाहनीय (हाक मारणेसाठी योग्य) आहे. प्रजाजनांनी त्याला हाक मारावी, त्याला वेळी प्रोत्साहन द्यावे आणि त्याच्या गुण, कर्म स्वभावाची प्रशंसा करावी. ।। १।।
विशेष
या मंत्रात श्लेष अलंकार आहे. परमेश्वरपर अर्थामध्ये ‘याता रथेभिःया शब्द प्रयोगात व्यंगोत्प्रेक्षा अलंकार आहे. ।। १।।
तमिल (1)
Word Meaning
விருத்திரனைக் கொல்லுபவனாய் சர்வமான சேனைகளின் தலைவனாய் சிறந்தவனாயுள்ளவனை துதிக்கிறேன். அவன் மனிதர்களின் இராஜாவாய் ரதங்களால் தடையன்னியில் செல்லுகிறான்.
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