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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 341
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    36

    को꣢ अ꣣द्य꣡ यु꣢ङ्क्ते धु꣣रि꣢꣫ गा ऋ꣣त꣢स्य꣣ शि꣡मी꣢वतो भा꣣मि꣡नो꣢ दुर्हृणा꣣यू꣢न् । आ꣣स꣡न्ने꣢षामप्सु꣣वा꣡हो꣢ मयो꣣भू꣡न्य ए꣢꣯षां भृ꣣त्या꣢मृ꣣ण꣢ध꣣त्स꣡ जी꣢वात् ॥३४१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कः꣢ । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । यु꣣ङ्क्ते । धुरि꣢ । गाः । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । शि꣡मी꣢꣯वतः । भा꣣मि꣡नः꣢ । दु꣣र्हृणायू꣢न् । दुः꣣ । हृणायू꣢न् । आ꣣स꣢न् । ए꣣षाम् । अप्सुवा꣡हः꣢ । अ꣣प्सु । वा꣡हः꣢꣯ । म꣣योभू꣢न् । म꣣यः । भू꣢न् । यः । ए꣣षाम् । भृत्या꣢म् । ऋ꣣ण꣡ध꣢त् । सः । जी꣣वात् ॥३४१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून् । आसन्नेषामप्सुवाहो मयोभून्य एषां भृत्यामृणधत्स जीवात् ॥३४१॥


    स्वर रहित पद पाठ

    कः । अद्य । अ । द्य । युङ्क्ते । धुरि । गाः । ऋतस्य । शिमीवतः । भामिनः । दुर्हृणायून् । दुः । हृणायून् । आसन् । एषाम् । अप्सुवाहः । अप्सु । वाहः । मयोभून् । मयः । भून् । यः । एषाम् । भृत्याम् । ऋणधत् । सः । जीवात् ॥३४१॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 341
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 5; मन्त्र » 10
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 11;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    इन्द्र देवतावाले भी अगले मन्त्र में इन्द्र को क्योंकि सत्य प्रिय है, अतः सत्य का विषय वर्णित है।

    पदार्थ

    प्रथम—अध्यात्म पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज (शिमीवतः) कर्मवान्, आलस्यरहित, (भामिनः) तेजस्वी, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) नदी की धाराओं के सदृश बाधाओं के बीच से भी वहन कर ले जानेवाले, (मयोभून्) सुखप्रापक (गाः) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-प्राण-मन-बुद्धि रूप बैलों को (ऋतस्य) सत्यरूप रथ के (धुरि) धुरे में (युङ्क्ते) जोड़ेगा। (एषाम्) गतिशील (एषाम्) इन पूर्वोक्त इन्द्रियादिरूप बैलों के (आसन्) मुख में (यः) जो मनुष्य (भृत्याम्) उन-उनके उत्कृष्ट ग्राह्यविषयरूप जीविकाद्रव्य को (ऋणधत्) वृद्धि के साथ प्रदान करेगा, (सः) वह (जीवात्) प्रशस्त जीवन से युक्त होगा ॥ यहाँ ‘सत्य के धुरे में’ इस कथन से सत्य में रथ का आरोप ध्वनित होता है। सत्य के धुरे में सामान्य बैल क्योंकि नहीं जोड़े जा सकते, अतः आरोप के विषय बैलों में आरोप्यमाण इन्द्रियादि गृहीत होते हैं। इन्द्रियादि में बैलों का आरोप होने से ही उनके मुख की भी कल्पना कर ली गयी है। अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज, संकट के समय (शिमीवतः) कर्मशूर, (भामिनः) क्षात्र तेज से युक्त, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) युद्धयात्रा में नदी, समुद्र आदि के जलों में युद्धपोत को खेकर ले जानेवाले, (मयोभून्) शत्रुओं को जीतकर राष्ट्रवासियों को सुख देनेवाले (गाः) गतिशील सैनिकों को (ऋतस्य) राष्ट्ररूप यज्ञ के (धुरि) रक्षा के धुरे में (युङ्क्ते) नियुक्त करेगा? राजा ही नियुक्त करेगा, यह अभिप्राय है। (आसन्नेषाम्) जिनके तरकस में बाण हैं अर्थात् जिन्होंने प्रचुर शस्त्रास्त्रों का संचय किया हुआ है, ऐसे (एषाम्) इन सैनिकों के (यः) जो राजा (भृत्याम्) वेतन को (ऋणधत्) समय-समय पर बढ़ायेगा (सः) वह राजा (जीवात्) शत्रु-विजय करके प्रजाओं के साथ चिरकाल तक जीवित रहेगा ॥१०॥ इस मन्त्र में अध्यात्म और अधिराष्ट्र उभयविध अर्थ वाच्य होने से श्लेषालङ्कार है ॥१०॥

    भावार्थ

    सत्य के ज्ञानार्थ तथा प्रचारार्थ आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों का यथोचित उपयोग मनुष्यों को करना चाहिए, और राष्ट्र के शासक राजा को चाहिए कि राष्ट्र के रक्षक सैनिकों का भरपूर वेतन-प्रदान आदि से सत्कार करे ॥१०॥ इस दशति में तार्क्ष्य नाम से परमेश्वर का स्मरण करने, इन्द्र-पर्वत के युगल की स्तुतिपूर्वक इन्द्र का स्तवन करने, उसके सख्य की याचना करने, इन्द्रिय-रूप गौओं का महत्त्व वर्णन करने तथा राजा, सैनिक आदि अर्थों के भी सूचित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥ चतुर्थ प्रपाठक का प्रथम अर्ध समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥

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    पदार्थ

    (अद्य) इस वर्तमान समय में (ऋतस्य) शरीर रथ की “शरीरं रथमेव तु” [कठो॰ ३.३] (धुरि) धुरा में (शिमीवतः) कर्मप्रवृत्ति वाले “शिमी कर्म नाम” [निघं॰ २.१] (भामिनः) स्वविषय ग्रहण में दीप्ति वाले (दुर्हृणायून्) दुर्धर्षणीय—स्व—वेग वाले—(अप्सुवाहः) रूपादि आप्तव्य विषय को प्राप्त करने वाले (मयोभून्) कल्याण को भावित करने वाले (गाः) इन्द्रिय वृषभों को (कः-युङ्क्ते ) प्रजापति परमात्मा युक्त करता है “प्रजापतिर्वै कः” [तै॰ स॰ १.६.८.५] (यः) जो उपासक (एषाम्-आसन्) इनके मुख में (एषाम्) इनकी (भृत्याम्) भरण क्रिया को—यथावत् धारण क्रिया को—शुभ प्रवृत्ति को (ऋणधत्) परिचरित करता है—जीवन में लाभ लेता है “ऋणद्धि परिचरणकर्मा” [निघं॰ ३.५] (सः-जीवात्) वह संसार में वास्तविक जीवन धारण करता है—जीता है।

    भावार्थ

    शरीररथ की धुरा में कर्मशील विषय दीप्ति वाले दुर्धर्षणीय—कठिनता से वश में आने योग्य रूपादि विषय प्राप्त कराने वाले, सुख दिलाने वाले, इन्द्रिय बैलों को परमात्मा युक्त करता है, परन्तु जो उपासक इनके मुख में उचित शुभ भरण-पोषण देता है वह संसार में वस्तुतः जीता है॥१०॥

    विशेष

    ऋषिः—गोतमः (परमात्मा में अत्यन्त गति करने वाला)॥<br>

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    विषय

    सामाजिक जीवन

    पदार्थ

    कोई भी व्यक्ति अपने को केवल अपने परिवार में ही सीमित करके नहीं रख सकता। उसे समाज से सम्बद्ध होना ही पड़ता है। समाज में आकर इस वामदेव गौतम का जीवन निम्न प्रकार का होता है- १. (कः)=प्रजापति (अद्य) = आज (धुरि) = अग्रभाग में (युंक्ते) = इसे जोतता है। वामदेव ने प्रभु को अपना सखा बनाया है [ त्वा सखायः] और उस प्रभु ने प्रेरणा देकर इसे कार्यक्षेत्र में अग्रभाग में नियत किया है। सामाजिक हित के कार्य करनेवालों का यह मुखिया बनता है। २. (ऋतस्य गाः) = [ युंक्ते ] - प्रभु इसके साथ सत्य की वाणियों को जोड़ते हैं। यह कभी असत्य की ओर झुकाववाला नहीं होता। यह प्रिय सत्य का ही उच्चारण करता है। ३. (शिमीवतः) =‘शिमी' कर्म का नाम है - उन कर्मों का जिनमें कि मनुष्य व्यग्र न होकर शान्त रह पाता हैं ये अव्यग्रता से महान् से महान् कार्य को करनेवाले होते हैं, ४. (भामिनः) = ये तेजस्वी होते हैं, ५. (दुणायून्) = ये बुराई के लिए लया अनुभव करते हैं। [हृणीय – feal ashamed at] ६.( एषाम्) = इनके (आसन्) = मुख में प्रभु (युंक्ते) = उन वाणियों को जोड़ते हैं जोकि (अप्सुवाहः) = उन्हें कर्मों में ले चलनेवाली हैं और (मयोभून्) = कल्याण को जन्म देनेवाली हैं, अर्थात् इनकी वाणी किसी का हृदय दुखाने के लिए तो कभी उच्चरित होती ही नहीं; और यह क्रियारूप में परिणत होती है ।

    इस प्रकार के जीवनवाले व्यक्ति ही समाज का हित कर सकते हैं, (य:) = जो (एषाम्) = इन व्यक्तियों की (भृत्याम्) = दासता को (ऋणधत्) = प्राप्त होता है, (स जीवात्) = वही जीये, अर्थात् जीवन तो उस ही व्यक्ति का सफल है जोकि इस प्रकार के लोगों का दास बनता है- ऐसे ही लोगों का अनुगामी बनता है।

    भावार्थ

    हमारा सामाजिक जीवन निम्न प्रकार का हो - हम सदा कार्यों में लगे रहें, सत्यवादी हों – अव्यग्र तेजस्वी व बुराई से शर्म करनेवाले हों। हमारी वाणी कल्याणकर व क्रिया में परिणत होनेवाली हो ।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( अद्य ) = वर्त्तमान में ( ऋतस्य ) = इस गतिमान् जीवित देहरूप रथ के ( धुरि ) = धुरा में ( शिमीवतः ) = कामना करने हारे ( भामिनः ) = आवेश से युक्त, ( दुः-हृणायुन् ) = दुःशील ( अप्सुवाहः ) = अपने अभिलाषित पदार्थों में शरीर को लेजाने वाले ( मयोभून् ) = सुख उत्पन्न करने हारे ( गाः ) = बैलों के समान, इन्द्रियों को ( कः ) = कौन ( युंक्ते ) = लगाता है ? ( एषां आसन् ) = इनके मुख में ( यः ) = जो ( एषां ) = इनकी ( भृत्यां ) = भरण पोषण सामग्री को ( ऋणधत् ) = उत्तम रूप से देता है और उनका पालन पोषण करता है ( सः ) = वह ही ( जीवात् ) = जीवन धारण करता है ।


     

    टिप्पणी

    ३४१ - 'आसन्निषून्हृत्स्वसो' इति ऋ० ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - गोतम:।

    देवता - इन्द्रः।

    छन्दः - त्रिष्टुभ्।

    स्वरः - धैवतः

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेन्द्रदेवताकेऽपि मन्त्रे ऋतप्रियत्वादिन्द्रस्य ऋतविषयमाह।

    पदार्थः

    प्रथमः—अध्यात्मपरः। (कः) को जनः (अद्य) अस्मिन् दिने (शमीवतः) कर्मवतः, न तु अलसान्। शिमीति कर्मनाम। निघं० २।१। (भामिनः) तेजस्विनः, (दुर्हृणायून्२) दुष्टप्रसह्यान्, (अप्सुवाहः) अप्सु नदीधारासु इव बाधासु अपि ये वहन्ति तान्। अत्र ‘तत्पुरुषे कृति बहुलम्। अ० ६।३।१४’ इति सप्तम्या अलुक्। कृदुत्तरपदप्रकृतिस्वरः। (मयोभून्) सुखप्रापकान्। मयः इति सुखनाम। मयः भावयन्ति ये तान्। (गाः) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-प्राण-मनोबुद्धिरूपान् वृषभान् (ऋतस्य३) सत्यरूपस्य रथस्य (धुरि) धुरायाम् (युङ्क्ते) योजयिष्यति। (एषाम्) गतिशीलानाम्। एषन्ति गच्छन्तीति एषः तेषाम्, एष गतौ प्रयत्ने चेति धातोः क्विपि रूपम्। (एषाम्) एतेषां पूर्वोक्तानां इन्द्रियादिरूपाणां बलीवर्दानाम् (आसन्) आस्ये। ‘पद्दन्नोमास्० अ० ६।१।६३’ इति आस्यशब्दस्य आसन्नादेशः। ‘सुपां सुलुक्० अ० ७।१।३९’ इति सप्तम्या लुक्। (यः) यो जनः (भृत्याम्) भृतिम्। भृञ् भरणे धातोः ‘संज्ञायां समजनिपदनिषद०। अ० ३।३।९९’ इति उदात्तः क्यप्। (ऋणधत्४) ऋध्नोति, एतेषां पुष्ट्यै यथायोग्यम् उत्कृष्टं ग्राह्यविषयरूपं भोजनं प्रयच्छति। ऋध्नोतेः वृद्ध्यर्थाद् व्यत्ययेन श्नम्, लेटि रूपम्। (सः) असौ (जीवात्) प्रशस्तजीवनयुक्तो भविष्यति। जीवधातोर्लेटि रूपम् ॥ अत्र सत्यस्य धुरि इति वचनात् सत्ये रथारोपो व्यज्यते। सत्यरूपस्य रथस्य धुरि च सामान्या गावः बलीवर्दाः न योजयितुं शक्यन्ते इति गोरूपेषु आरोपविषयेषु आरोप्यमाणानि इन्द्रियादीनि गृह्यन्ते। इन्द्रियादिषु गोत्वारोपादेव तेषां मुखमपि कल्प्यते। अतिशयोक्तिरलङ्कारः ॥ अथ द्वितीयः—राष्ट्रपरः। (कः) को जनः (अद्य) संकटमये दिवसे (शिमीवतः) कर्मशूरान्, (भामिनः) क्षात्रतेजोयुक्तान्, (दुर्हृणायून्) दुष्प्रधृष्यान्, (अप्सुवाहः) युद्धयात्रायां नदीसागरादीनांजले रथवहनशीलान्, (मयोभून्) शत्रून् विजित्य राष्ट्रवासिभ्यः सुखप्रदायकान् (गाः) गतिशीलान् सैनिकान् (ऋतस्य) राष्ट्रयज्ञस्य (धुरि) रक्षाधुरि (युङ्क्ते) नियोजयिष्यति ? जनराड् नृपतिरेव नियोजयिष्यतीति भावः। (आसन्नेषाम्) आसनि तूणीररूपे आस्ये एषः इषवो येषां ते आसन्नेषाः, तेषाम् सञ्चितप्रभूतशस्त्रास्त्राणामित्यर्थः। ऋग्वेदे ‘आसन्निषून्५’ इति पाठादयमर्थः पदपाठमननुसरन्नपि कृतः। बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वम्। (एषाम्) एतेषां सैनिकानाम् (यः) राजा (भृत्याम्) वेतनम् (ऋणधत्) काले काले वर्द्धयेत् (सः) असौ राजा (जीवात्) प्रजाभिः सह चिरं जीवेत् शत्रुविजयेन ॥१०॥ मन्त्रेऽस्मिन्नध्यात्माधिराष्ट्ररूपोभयविधार्थयोर्वाच्यत्वाच्छ्लेषालङ्कारः ॥१०॥

    भावार्थः

    सत्यस्य ज्ञानार्थं प्रसारार्थं चात्ममनोबुद्धिप्राणेन्द्रियाणां यथायोग्यमुपयोगो जनैः कार्यः। किञ्च राष्ट्रशासकेन नृपतिना राष्ट्ररक्षकाः सैनिकाः पुष्कलवेतनप्रदानादिना सत्कार्याः ॥१०॥ अत्र तार्क्ष्यनाम्ना परमेश्वरादेः स्मरणाद्, इन्द्रपर्वतयुगलस्य स्तुतिपूर्वकं चेन्द्रस्य स्तवनात्, तत्सखित्वयाचनाद्, इन्द्रियरूपाणां गवां महत्त्ववर्णनाद्, नृपसैनिकाद्यर्थानां चापि सूचनाद् एतद्दशत्यर्थस्य पूर्वदशत्यर्थेन सह संगतिरस्तीति वेद्यम् ॥ इति चतुर्थे प्रपाठके प्रथमार्द्धे पञ्चमी दशतिः ॥ इति चतुर्थे प्रपाठके प्रथमार्द्धः ॥ इति तृतीयेऽध्याये एकादशः खण्डः ॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० १।८४।१६ ‘आसन्निषून् हृत्स्वसो’ इति पाठः। अथ० १८।१।६ ऋषिः अथर्वा, देवता यमः, पाठः ऋग्वेदवत्। २. शत्रुभिर्दुर्लभं हृणं प्रसह्यकरणं येषां ते दुर्हृणास्त इवाचरन्तीति दुर्हृणायवस्तान्। ‘क्याच्छन्दसि’ इत्युः प्रत्ययः—इति ऋ० १।८४।१६ भाष्ये द०। ३. ऋतस्य सत्यस्य सर्वगतस्य वा इन्द्रस्य—इति वि०। ऋतस्य सत्यस्य इन्द्रस्य—इति भ०। ऋतस्य गच्छतः इन्द्रसम्बन्धिनो रथस्य—इति सा०। ४. ऋणधत्, ऋण वृद्धौ इत्यस्येदं रूपम्—इति वि०। ऋध्यात् समर्धयेत्—इति भ०। ५. आ॒सन्ऽइ॑षून्—इति पदपाठः। ‘आसन्निषून् येषामासनि आस्ये मुखप्रदेशे शत्रूणां प्रहरणार्थमिषवो बाणा बद्धास्तान्’—इति ऋ० १।८४।१६ भाष्ये सा०।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    In the pilgrimage for search after Truth undertaken for the acquisition of truth, he who diverts his lascivious, turbulent, sinful organs to philanthropic acts, really enjoys life.

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    Meaning

    Who joins the bullocks to the front yoke of the chariot of Truth to-day as ever? The Lord Ruler of the universe. And he who joins the men of noble action, heroes of passion and righteousness, maintain peace and joy, may he who joins these to truth and promotes these servants of truth to prosperity live long. (Rg. 1-84-16)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अद्य) આ વર્તમાન સમયમાં (ऋतस्य) શરીર રથની (धुरि) અગ્રભાગમાં (शिमीवतः) કર્મ પ્રવૃત્તિવાળા (भामिनः) સ્વવિષય ગ્રહણમાં દિપ્તીવાળા (दुर्हृणायून्) દુર્ધર્ષણીય-સ્વ-વેગવાળા (अप्सुवाहः) રૂપાદિ પ્રાપ્તવ્ય વિષયને પ્રાપ્ત કરનાર (मयोभून्) કલ્યાણની ભાવના કરનાર (गाः) ઇન્દ્રિય વૃષભો બળદોને (कः युङ्क्ते) પ્રજાપતિ પરમાત્મા યુક્ત કરે છે-જોડે છે (यः) જે ઉપાસક (एषाम् आसन्) એના મુખમાં (एषाम्) એની (भृत्याम्) ભરણ ક્રિયાને-યથાવત્ ધારણ ક્રિયાને-શુભ પ્રવૃત્તિને (ऋणधत्) પરિચરિત કરે છે-જીવનમાં લાભ લે છે, (सः जीवात्) તે સંસારમાં વાસ્તવિક જીવન ધારણ કરે છે-જીવે છે. (૧૦)
     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : શરીરની ધુરામાં-અગ્રભાગમાં કર્મશીલ વિષય દીપ્તિવાળા દુર્ધર્ષણીય-કઠિનતાથી વશમાં રહેનાર રૂપાદિ વિષય પ્રાપ્ત કરાવનાર, સુખ પ્રદાન કરનાર, ઇન્દ્રય રૂપ બળદોને પરમાત્મા યુક્ત કરે છે-જોડે છે, પરન્તુ જે ઉપાસક એના મુખમાં ઉચિત શુભ ભરણ-પોષણ આપે છે, તે સંસારમાં ખરેખર જીવે છે. (૧૦)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    کون زندہ ہے؟ سچ بولنے والا!

    Lafzi Maana

    (کہ ادّیہ رِتسیہ دُھری گاہُ نیکتے) کون ہے جو آج کے زمانہ میں ستیہ کی دُھری میں بانی کو جتتا ہے یعنی حق کی آواز کو بلند کرتا ہے اور پھر اُس کا ملنا تو اور مشکل ہے جو آدمی کہ (شمی وتہ بھامِنہ بُرہنایُون) اُس ستیہ بانی کے مطابق جس کا عمل ہو اور پھر اُس ستیہ بانی کو بِنا جھجک اور خوف کے برملا بول سکے؟ ہاں! ایسی ستیہ بانی اورک رم (ایشام آسن) اُن عابد اُپاسکوں کے ہوتے ہیں کہ جن کے (اپ سُوواہ) رس اور لہو کے اندر ایک ایک رگ میں اُس کا پرواہ چل رہا ہے۔ بلاشک ایسی ستیہ بانی کے نتائج یا ثمر (میوبھُون) لاانتہا خوشیوں کو دینے والے ہوتے ہیں، (یہ اشیام بُھوتیام رِن دھت سہ جِیوات) جو آدمی اِس ستیہ بانی کا بندہ بے دام ہو جاتا ہے، وہی حقیقت میں زندہ ہے۔ دوسرے تو مَرے سمان ہیں۔ (مہا پُرشوں کے جیون شاہد ہیں)۔

    Tashree

    ہے کون ایسا آج جو بے خوف ہو کر سچ کہے، جیسا کہے، ویسا کرے، بندہ خُدا وہ ہی جِئے۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    सत्य ज्ञान व प्रचार यासाठी आत्मा, मन, बुद्धी, प्राण व इंद्रियांचा माणसांनी यथायोग्य उपयोग केला पाहिजे व राष्ट्राचा शासक असलेल्या राजाने राष्ट्ररक्षक सैनिकांना भरपूर वेतन प्रदान करून सत्कार करावा ॥१०॥

    टिप्पणी

    या दशतिमध्ये तीर्क्ष्य नावाने परमेश्वराचे स्मरण करणे इंद्र-पर्वत युगुलचे स्तुतिपूर्वक इंद्राचे स्तवन करणे, त्याच्या सख्यत्वाची याचना करणे, इंद्रियरूप - गाईचे महत्त्व दर्शविणे व राजा, सैनिक इत्यादी अर्थ सूचित करणे, यामुळे या दशतिच्या विषयाची पूर्व दशतिच्या विषयाबरोबर संगती आहे

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    विषय

    मंत्र-देवता इंद्र असून इंद्राला सत्य प्रिय आहे. म्हणून मंत्राचा विषय - सत्य।

    शब्दार्थ

    (प्रथम अर्थ) (अध्यात्मपर अर्थ) - (कः) असा कोण माणूस आहे की जो (अघ) आज (शिभीवतः) कर्मशील, निरालस्य, (भामिनः) तेजस्वी तसेच (दुर्हृणावून्) दुष्य राजेय (अप्सु वाहः) नदीच्या धारा सदृश असणाऱ्या विघ्न बाधांना दूर करीत पुढे जाणाऱ्या (मयोभून्) सुखप्रापक (गाः) ज्ञानेंद्रिय - कर्मेंद्रियरूप बैलांना (ऋतस्य) सत्यरूप रथाच्या (ध्रुरि) धुरीमध्ये (मुड्क्ते) जुंपू शकेल ? (प्रबळ इंद्रियांना कोणीतरी वश करू शकेल का ?नाठाळ बैलाला जसे गाडीत जुंपणे कठीण, तद्वत इंद्रिय दमनही अति कठीण कर्म आहे.) (एषाम्) गतिशील (एषाम्) या इंद्रियरूप बैलांच्या (आसन्) मुखामध्ये (यः) जो माणूस (भृत्याम्) त्यांच्या प्रत्येकाच्या ग्रहणीय विषयरूप जीविकाद्रव्याला (ऋणधत्) वाढवील (सः) तोच (जीवात्) प्रशस्त जीवन जगेल. (जसे नाठाळ बैलाच्या नाकात वेस़ण घालून त्यास वश आणतात, तद्वत इंद्रियांना वश करावे.)।। येथे ‘सत्याच्या धुरीमध्ये’ या शब्दावरून सत्यावर रथाचा आरोप ध्वनित होत आहे. सत्याच्या जूमध्ये साधारण बैलांना जुंपता येत नाही, म्हणून बैलांवरून आरोप्य माण इंद्रिये येथे अभिप्रेत आहेत. इंद्रियांवर बैलांचा आरोप केल्यामुळे बैलांच्या मुखाची कल्पनादेखील येथे केली आहे. करिता इथे अतिशयोक्ती अलंकार आहे.।। द्वितीय अर्थ - (राष्ट्रपर अर्थ) - (कः) कोण आहे जो (अघ) आज म्हणजे संकटकाळी (शिमीवतः) कर्मवीर (भामिनः) क्षात्र-तेजाने युक्त (दुर्हृणायून) दुष्पराजेय (अप्सुवाहः) युद्धाच्या काळी नदी, समुद्र आदींच्या जलावर जलयान, नावे व युद्धपोत घेऊन जाणाऱ्या तसेच (मयोभून्) शत्रूंना जिंकून राष्ट्रवासीजनांना सुखी करणाऱ्या (गाः) गतिशील सैनिकांना (ऋतस्य) राष्ट्ररूप यज्ञाच्या (धुरि) रक्षणरूप धुरीमध्ये (युड्क्ते) प्रयुक्त करील ? आशय असा की हे महान कर्म राजाच करू शकेल. (आसन्नेषाम्) ज्यांच्या भात्यामध्ये बाण आहेत म्हणजे ज्यांनी पुष्कळ शास्त्र संचचय केला आहे, अशा (़एषाम्) या सैनिकांचे (यः) (भृत्याम्) वेतन (यः) जो राजा वेळोवेळी वाढवील (सः) तो राजा (जीवात्) शत्रु-विजय संपादित करून प्रजेसह दीर्घकाळ जीवित राहील. ।। १०।।

    भावार्थ

    मनुष्यांनी सत्याचे ज्ञान आणि प्रचार यासाठी आपल्या आत्मा, मन, बुद्धी, प्राण आणि इंद्रिये यांचा यथोचित उपयोग करावा. तसेच राष्ट्राच्या शासकाने राष्ट्राचे जे रक्षक, त्या सैनिकांना उचित वेतन, पुरस्कार आदींद्वारे सत्कार केला पाहिजे. ।। १०।। या दशतीमध्ये तार्क्ष्य नावाने परमेश्वराचे स्मरण, इंद्र-पर्वत मुगलाची स्तुती आणि इंद्राचे स्तवन, त्याच्याशी सख्यत्वाची याचना, इंद्रियरूप गायींचे महत्त्व व राजा, सैनिक आदी अर्थांची सूचना यामुळे या दशतीतील विषयांच्या अर्थाशी मागील दशतीच्या विषयांशी संगती जाणावी.।। चतुर्थ प्रपाठकातील प्रथम अर्घाची पाचवी दशती समाप्त। चतुर्थ प्रपाठकाचे प्रथम अर्घ समाप्त. तृतीय अध्यायामधील अकरावा खंड समाप्त।।

    विशेष

    या मंत्रात अध्यात्मपर आणि राष्ट्रपर असे दोन अर्थ वाच्य असल्यामुळे येथे श्लेष अलंकार आहे. ।। १०।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    எவன் பிரசாபதி யக்ஞத்தினுடைய நிர்வாகத்தில் இன்று வேத மொழிகளைச் சேர்த்து செயல்களுடன் சொலிப்பவனாய் கொல்லுவதற்றுள்ள
    [1](அப்சுவாகனான) சுகமளிப்பவனை எவன் சாமக்கிரியைகளால்
    நிறைவேற்றுகிறானோ அவன் (நீடுழிகாலம் வாழ்கிறான்).

    FootNotes

    [1].அப்சுவாகனான - விருப்பத்தில் செல்லுபவரான.

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