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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 779
    ऋषिः - अहमीयुराङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    13

    य꣡स्य꣢ ते स꣣ख्ये꣢ व꣣य꣡ꣳ सा꣢स꣣ह्या꣡म꣢ पृतन्य꣣तः꣢ । त꣡वे꣢न्दो द्यु꣣म्न꣡ उ꣢त्त꣣मे꣢ ॥७७९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । सख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । व꣣य꣢म् । सा꣣सह्या꣡म꣢ । पृ꣣तन्यतः꣢ । त꣡व꣢꣯ । इ꣣न्दो । द्युम्ने꣢ । उ꣣त्तमे꣢ ॥७७९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्य ते सख्ये वयꣳ सासह्याम पृतन्यतः । तवेन्दो द्युम्न उत्तमे ॥७७९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    यस्य । ते । सख्ये । स । ख्ये । वयम् । सासह्याम । पृतन्यतः । तव । इन्दो । द्युम्ने । उत्तमे ॥७७९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 779
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में पुनः उन्हीं से प्रार्थना की गयी है।

    पदार्थ

    हे (इन्दो) तेजस्वी जगदीश्वर, आचार्य और राजन् ! (यस्य ते) जिन आपकी (सख्ये) मित्रता में (वयम्) हम हैं, वे हम लोग (पृतन्यतः) सेना से चढ़ाई करनेवाले आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को (सासह्याम)अतिशय रूप से बार-बार पराजित कर देवें और (तव) आपके दिये हुए (उत्तमे) उत्तम (दयुम्ने) यश में,हम रहें ॥२॥

    भावार्थ

    सबको चाहिए कि परमेश्वर की उपासना करके, गुरु को शिष्यभाव से प्राप्त करके और राजा की सहायता पाकर सब काम, क्रोध आदि आन्तरिक रिपुओं को एवं बाह्य शत्रुओं को निर्मूल करके यशस्वी बनें ॥२॥

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    पदार्थ

    (यस्य ते) जिस तुझ शान्तस्वरूप परमात्मा के (सख्ये) सखापन में (वयम्) हम (पृतन्यतः) संघर्ष करते हुए—प्रहार करते हुए काम आदि दोषों को (सासह्याम) निरन्तर सहन करें—दबा सकते हैं (इन्दो) हे रसीले परमात्मन्! (तव-उत्तमे द्युम्ने) तेरे उत्तम द्योतमान यशोबल में हम स्थिर रहें।

    भावार्थ

    परमात्मा के मित्रभाव में काम आदि प्रहारक दोषों को हम दबा सकते हैं उसके उत्तम यशोबल में हम स्थिर रहें॥२॥

    विशेष

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    विषय

    शत्रु- धर्षण

    पदार्थ

    हे (इन्दो) = शक्तिशाली परमात्मन् ! (वयम्) = हम (तव) = तेरी उस (उत्तमे) = सर्वोत्कृष्ट द्युम्ने ज्योति में हों (यस्य ते) = जिस तेरी (सख्ये) = मित्रता में (पृतन्यतः) = हमपर आक्रमण करनेवाले रोगादि को (सासह्याम) = पराभूत कर सकें ।

    इस संसार में मनुष्य वासनाओं से आक्रान्त होता है । वासनाओं के साथ वह संघर्ष करता है । इस संघर्ष में मनुष्य अपने को अशक्त अनुभव करता है, परन्तु प्रभु को मित्र बनाकर उसके साहाय्य से यह इन वासनाओं को जीत पाता है। प्रभु के उत्तम ज्ञान के प्रकाश में अन्धकार में पनपनेवाली वासनाएँ ठहर नहीं पाती । एवं, इस संसार में जीव के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात प्रभु की मित्रता है—यही उसे इस भवसागर से पार तैराती है। प्रभु की मित्रता को चाहने व पानेवाला 'अमहीयु' है - यह पार्थिव भोगों की कामना से ऊपर उठ गया है । इन भोगों से ऊपर उठ जाने के — कारण ही ‘आङ्गिरस' है – शक्तिशाली है । 

    भावार्थ

    प्रभु की मित्रता में हम काम-क्रोधादि शत्रुओं का धर्षण करनेवाले हों ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (इन्दो) ऐश्वर्यवन् ! (यस्य ते) जिस तेरे (सख्ये) मित्र भाव में रहते हुए (पृतन्यतः) सेनाएं लेकर चढ़ाई करने हारे विरोधियों को (सासह्याम) पराजित करें उस (तव) तेरे (उत्तम) उत्तम (द्युम्नम्) तेज या ऐश्वर्य या बल के अधीन हम सदा रहें।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनस्तानेव प्रार्थयते।

    पदार्थः

    हे (इन्दो) तेजस्विन् जगदीश्वर आचार्य नृपते वा ! (यस्य ते) यस्य तव (सख्ये) सखित्वे (वयम्) वयं स्मः, ते वयम् (पृतन्यतः) पृतनया अभिगच्छतः आन्तरान् बाह्यांश्च शत्रून् (सासह्याम) अतिशयेन पुनः पुनः पराभवेम। अपि च (तव) त्वदीये, त्वया प्रदत्ते (उत्तमे) उत्कृष्टतमे (द्युम्ने) यशसि, स्याम इति शेषः ॥२॥

    भावार्थः

    सर्वैः परमेश्वरमुपास्य, गुरुं शिष्यत्वेनोपगम्य, नृपतेश्च साहाय्यं प्राप्य सर्वान् कामक्रोधादीनान्तरान् बाह्यांश्च रिपून् निर्मूल्य यशस्विभिर्भाव्यम् ॥२॥

    टिप्पणीः

    २. ऋ० ९।६१।२९, ‘अस्य॑ ते स॒ख्ये व॒यं तवे॑न्दो द्यु॒म्न उ॑त्त॒मे। सा॒स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तः ॥’ इति पाठः।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    In Thy friendship, O God, Most Sublime and Glorious, may we subdue all those who war with us !

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    Meaning

    O lord of truth, beauty and generosity, within the fold of your friendship and in the state of your highest honour and excellence, let us face and win over all the adversaries. (Rg. 9-61-29)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (यस्य ते) જે તારા શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્માની (सख्ये) મિત્રતામાં (वयम्) અમે (पृतन्यतः) સંઘર્ષ કરતાં-પ્રહાર કરતાં કામ આદિ દોષોને (सासह्याम) નિરંતર સહન કરીએ-દબાવી શકીએ (इन्दो) હે રસવાન પરમાત્મન્ ! (तव उत्तमे द्युम्ने) તારા ઉત્તમ પ્રકાશમાન યશોબળમાં અમે સ્થિર રહીએ. (૨)

     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્માના મિત્રભાવમાં અમે કામ આદિ પ્રહારક દોષોને દબાવી-સામનો કરી શકીએ છીએ, તેના ઉત્તમ યશોબળમાં અમે સ્થિર રહીએ. (૨)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    सर्वांनी परमेश्वराची उपासना करून, गुरूला शिष्यभावाने पत्करून, राजाचे साह्य प्राप्त करून काम, क्रोध इत्यादी आंतरिक रिपूंना व बाह्य शत्रूंचा नायनाट करून यशस्वी बनावे ॥२॥

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