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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 857
ऋषिः - सप्तर्षयः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
19
त꣡र꣢त्समु꣣द्रं꣡ पव꣢꣯मान ऊ꣣र्मि꣢णा꣣ रा꣡जा꣢ दे꣣व꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् । अ꣡र्षा꣢ मि꣣त्र꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णस्य꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ प्र꣡ हि꣢न्वा꣣न꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥८५७॥
स्वर सहित पद पाठत꣡रत्꣢꣯ । स꣣मु꣢द्रम् । स꣣म् । उद्र꣢म् । प꣡व꣢꣯मानः । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । रा꣡जा꣢꣯ । दे꣣वः꣢ । ऋ꣣त꣢म् । बृ꣣ह꣢त् । अ꣡र्ष꣢꣯ । मि꣣त्र꣡स्य꣢ । मि꣣ । त्र꣡स्य꣢꣯ । व꣡रु꣢꣯णस्य । ध꣡र्म꣢꣯णा । प्र । हि꣣न्वानः꣢ । ऋ꣣त꣢म् । बृ꣣ह꣢त् ॥८५७॥
स्वर रहित मन्त्र
तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत् । अर्षा मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत् ॥८५७॥
स्वर रहित पद पाठ
तरत् । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । पवमानः । ऊर्मिणा । राजा । देवः । ऋतम् । बृहत् । अर्ष । मित्रस्य । मि । त्रस्य । वरुणस्य । धर्मणा । प्र । हिन्वानः । ऋतम् । बृहत् ॥८५७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 857
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में स्नातक का वर्णन है।
पदार्थ
शिष्य (राजा) तेज से दीप्त तथा (देवः) विद्वान् होता हुआ (बृहत् ऋतम्) महान् सत्य ज्ञान, सत्य आचरण और सत्य ब्रह्मानन्द को (ऊर्मिणा) तरङ्गरूप में (पवमानः) अपने आत्मा में प्रवाहित करता हुआ (समुद्रम्) ब्रह्मचर्याश्रमरूप समुद्र को (तरत्) तैर जाता है, अर्थात् स्नातक बन जाता है। आगे प्रत्यक्षरूप से वर्णन है—हे विद्वान् स्नातक ! तू (मित्रस्य) मैत्री के निर्वाहक तथा (वरुणस्य) शिष्य रूप में तुझे वरनेवाले आचार्य के (धर्मणा) उपदिष्ट धर्म के अनुसार, जनसमाज में (बृहत्) महान् सत्यज्ञान, सत्य आचरण और सत्य ब्रह्मानन्द को (हिन्वानः) प्रेरित करता हुआ (अर्ष) गति कर, व्यवहार कर ॥२॥ अथर्ववेद में स्नातक का वर्णन इस रूप में किया गया है—ब्रह्मचारी देदीप्यमान ज्ञान को अपने अन्दर धारण करता है। उसके अन्दर सब दिव्य गुण समाविष्ट हो जाते हैं। हे ब्रह्मचारी, तू प्राण, अपान, व्यान, वाणी, मन, हृदय, ब्रह्म, मेधा इन सबकी शक्ति को अपने अन्दर उत्पन्न करता हुआ हमें भी चक्षु, श्रोत्र, यश, अन्न, रेतस्, रक्त एवं पाचनशक्ति प्रदान कर। इन सब शक्तियों को ब्रह्मचारी ज्ञानसलिल के पृष्ठ ब्रह्मचर्याश्रमरूप समुद्र में तप करता हुआ प्राप्त करता है। वह जब स्नातक बनता है तब अन्यों का धारक-पोषक और पीतवेषधारी होकर पृथिवी पर बहुत चमकता है। (अथ० ११।५।२४-२६) ॥
भावार्थ
स्नातकों को चाहिए कि गुरुओं से अध्ययन किये हुए सब लौकिक और आध्यात्मिक ज्ञान को समाज में फैलाएँ ॥२॥
पदार्थ
(देवः पवमानः-राजा) सुखदाता प्राप्त होने वाला सोम राजा शान्तस्वरूप सर्वत्र राजमान परमात्मा (बृहत्-ऋतम्) महान् अमृतरूप “ऋतममृतमित्याह” [जै॰ २.१६०] (समुद्रम्-ऊर्मिणा तरत्) हृदयाकाश को “अयं समुद्रः....यदन्तरिक्षम्” [जै॰ १.१६५] अपनी ज्योतिः—तरङ्ग से प्राप्त होता है (मित्रस्य वरुणस्य) प्राण अपान के “प्राणापानौ मित्राषरुणौ” [तां॰ ६.१०.५.९] (धर्मणा) धर्म से—प्राणसमान अपानसमान बनकर (ऋतं बृहत्-हिन्वानः) महान् अमृत—मोक्ष की ओर उपासक को प्रेरित करता हुआ—उन्नत करता हुआ (प्रार्ष) साक्षात् होता है।
भावार्थ
सुखदाता प्राप्त होने वाला शान्तस्वरूप सर्वत्र राजमान महान् अमृत परमात्मा हृदयावकाश में अपनी ज्योतितरङ्ग से प्राप्त होता है प्राण अपान के समान बन उपासक को महान् अमृत मोक्ष की ओर प्रेरित करने के हेतु साक्षात् होता है॥२॥
विशेष
<br>
पदार्थ
(पवमानः) = अपने जीवन को पवित्र बनाता हुआ व्यक्ति (ऊर्मिणा) = शरीर में वीर्य की अर्ध्वगति के द्वारा [ऊर्मि=current] (समुद्रम्) = [कमो हि समुद्रः] काम को (तरत्) = तर जाता है । वस्तुतः जब मनुष्य वीर्य की ऊर्ध्वगति का निश्चय कर लेता है, तभी वासना को जीत पाता है। इसका परिणाम यह होता है कि यह (राजा) = बड़े नियमित व दीप्त जीवनवाला बनता है [राजृ=regulate, दीप्त] (देवः) = इसमें दिव्य गुण उत्तरोत्तर बढ़ते जाते हैं । (बृहत् ऋतम्) = उस महान् सत्यस्वरूप प्रभु को (अर्ष) = यह प्राप्त करता है। संसार में सारा उत्थान काम के विजय पर ही आश्रित है। इसका विजय कर लिया तो उत्थान है—इससे हम जीते गये तो पतन । इसको जीतकर हम प्रभु के समीप पहुँचते हैं।
(मित्रस्य वरुणस्य) = प्राणापान के (धर्मणा) = धारण के द्वारा (प्र हिन्वानः) = शक्ति को प्रकर्षेण ऊर्ध्वप्रेरित करता हुआ साधक (बृहत् ऋतम्) = उस अनन्त सत्य प्रभु को (अर्ष) = पाता है। मन काम का सर्वप्रधान अधिष्ठान है। प्राणापान से मनोनिरोध होता है। इसके निरुद्ध हो जाने पर काम निरुद्ध हो जाता है । काम को वशीभूत कर लेनेवाला व्यक्ति स्वास्थ्य व ज्ञान की दीप्ति से तो चमकता ही है [राजा], उसमें दिव्य गुणों का निवास होता है [देव] । इस प्रकार शरीर को स्वस्थ, मन को निर्मल तथा मस्तिष्क को दीप्त बनाकर वह व्यक्ति ('बृहत् ऋतम्') = प्रभु को पाने का अधिकारी बन जाता है । इस सारे मार्ग का मूल 'प्राणापान की साधना' है – यही प्राणायाम है और वास्तव में योग का एकदेश होते हुए भी यही 'योगमार्ग' है ।
भावार्थ
प्राणापान की साधना से हम काम को जीतें, उससे हम स्वास्थ्य व ज्ञान से चमकेंगे। हममें दिव्य गुण होंगे और देव बनकर हम उस महादेव के अत्यन्त समीप हो जाएँगे ।
विषय
missing
भावार्थ
(पवमानः) लमस्त मलों को शोधन करने हारा (राजा) सूर्य के समान योगी (देवः) विद्वान् (ऊर्मिणा) अपनी उच्चगति द्वारा (बृहत्) बड़े (ऋतम्) सत्यज्ञान स्वरूप परिपक्व (समुद्र) समस्त रसों के आश्रय ब्रह्म को (तरत्) प्राप्त हो जाता है। और (मित्रस्य) सबके स्नेहशील प्राणस्वरूप (वरुणस्य) सब पापों के निवारक परमात्मा को (धर्मणा) यम नियम पूर्वक प्राप्त धारक बल से, या सदाचार से (हिन्वानः) सन्मार्ग में गति करता हुआ स्वयं (बृहत्) बड़े (ऋतं) सत्य ज्ञानस्वरूप अनन्त को ब्रह्म (प्र अर्ष) प्राप्त होता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
missing
संस्कृत (1)
विषयः
अथ स्नातको वर्ण्यते।
पदार्थः
शिष्यः (राजा) तेजसा राजमानः (देवः) विद्वांश्च सन् (बृहत् ऋतम्) महत् सत्यज्ञानं सत्याचरणं सत्यं ब्रह्मानन्दं च (ऊर्मिणा) तरङ्गेण (पवमानः) स्वात्मनि प्रवाहयन् (समुद्रम्) ब्रह्मचर्याश्रमरूपम् अर्णवम् (तरत्) तरति, स्नातको भवति। सम्प्रति प्रत्यक्षकृतमाह—हे विद्वन् स्नातक ! त्वम् (मित्रस्य) मैत्रीनिर्वाहकस्य, (वरुणस्य) शिष्यरूपेण तव वरणकर्तुः आचार्यस्य (धर्मणा) उपदिष्टधर्मानुसारम्, जनसमाजे (बृहत्) महत् सत्यज्ञानं सत्याचरणं सत्यं ब्रह्मानन्दं च (हिन्वानः) प्रेरयन् (अर्ष) गच्छ, व्यवहर। [ऋषी गतौ, तुदादिः] ॥२॥ अथर्ववेदः स्नातकं वर्णयन्नेवमाह—ब्र॒ह्म॒चा॒री ब्रह्म॒ भ्राज॑द् बिभर्ति॒ तस्मि॑न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ स॒मोताः॑। प्रा॒णा॒पा॒नौ ज॒नय॒न्नाद् व्या॒नं वाचं॒ मनो॒ हृद॑यं॒ ब्रह्म॑ मे॒धाम् ॥ चक्षुः॒ श्रोत्रं॒ यशो॑ अ॒स्मासु॑ धे॒ह्यन्नं॒ रेतो॒ लोहि॑तमु॒दर॑म् ॥ तानि॒ कल्प॑द् ब्रह्मचा॒री स॑लि॒लस्य॑ पृ॒ष्ठे तपो॑ऽतिष्ठत् त॒प्यमा॑नः समुद्रे। स स्ना॒तो ब॒भ्रुः पि॑ङ्ग॒लः पृ॑थि॒व्यां ब॒हु रो॑चते। (अथ० ११।५।२४-२६) इति ॥
भावार्थः
स्नातकैर्गुरुभ्योऽधीतं सर्वमपि लौकिकमाध्यात्मिकं च ज्ञानं समाजे प्रसारणीयम् ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ९।१०७।१५ ‘अर्षा’ इत्यत्र ‘अर्ष॑न्’ इति पाठः।
इंग्लिश (2)
Meaning
A learned Yogi, the purifier of all moral weaknesses, through his wisdom, attains to God, the Embodiment of all true knowledge. Treading the path of virtue, through his excellent character, he realises the Eternal God, the Saviour and Friend unto all.
Translator Comment
He refers to the Yogi.
Meaning
Across the ocean of existence, pure, purifying and flowing by waves of ecstasy, refulgent generous divine ruler of life, itself the law of expansive universe, radiating by and with the Dharma of Mitra, spirit of love, and Varuna, spirit of justice, inspiring and stimulating the universal law of truth and advancement, rolls Soma. (Rg. 9-107-15)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (देवः पवमानः राजा) સુખદાતા પ્રાપ્ત થનાર સોમ રાજા શાન્ત સ્વરૂપ સર્વત્ર રાજમાન પરમાત્મા (बृहत् ऋतम्) મહાન અમૃતરૂપ (समुद्रम् ऊर्मिणा तरत्) હૃદયાકાશમાં પોતાના જ્યોતિ-તરંગથી પ્રાપ્ત થાય છે. (मित्रस्य वरुणस्य) પ્રાણ અપાનના (धर्मणा) ધર્મથી-પ્રાણસમાન અપાન સમાન બનીને (ऋतं बृहत् हिन्वानः) મહાન અમૃત-મોક્ષની તરફ ઉપાસકને પ્રેરિત કરીને-ઉન્નત કરીને (प्रार्ष) સાક્ષાત્ થાય છે. (૨)
भावार्थ
ભાવાર્થ : સુખદાતા, પ્રાપ્ત થનાર, શાન્ત સ્વરૂપ, સર્વત્ર રાજમાન, મહાન અમૃત પરમાત્મા હૃદયાકાશમાં પોતાના જ્યોતિ તરંગ દ્વારા પ્રાપ્ત થાય છે. પ્રાણ અને અપાનની સમાન બનીને ઉપાસકને મહાન અમૃતમોક્ષની તરફ પ્રેરિત કરવા માટે સાક્ષાત્ થાય છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
स्नातकांनी गुरूंकडून अध्ययन केलेले लौकिक व आध्यात्मिक ज्ञान समाजात पसरवावे. ॥२॥
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