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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 90
ऋषिः - वामदेवः कश्यपो वा मारीचो मनुर्वा वैवस्वत अभौ वा
देवता - अग्निः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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जा꣣तः꣡ परे꣢꣯ण꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ य꣢त्स꣣वृ꣡द्भिः꣢ स꣣हा꣡भु꣢वः । पि꣣ता꣢꣫ यत्क꣣श्य꣡प꣢स्या꣣ग्निः꣢ श्र꣣द्धा꣢ मा꣣ता꣡ मनुः꣢꣯ क꣣विः꣢ ॥९०
स्वर सहित पद पाठजा꣣तः꣢ । प꣡रे꣢꣯ण । ध꣡र्म꣢꣯णा । यत् । स꣣वृ꣡द्भिः꣢ । स꣣ । वृ꣡द्भिः꣢꣯ । स꣣ह꣢ । अ꣡भु꣢꣯वः । पि꣣ता꣢ । यत् । क꣣श्य꣡प꣢स्य । अ꣣ग्निः꣢ । श्र꣣द्धा꣢ । श्र꣣त् । धा꣢ । मा꣣ता꣢ । म꣡नुः꣢꣯ । क꣣विः꣢ ॥९०॥
स्वर रहित मन्त्र
जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्भिः सहाभुवः । पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धा माता मनुः कविः ॥९०
स्वर रहित पद पाठ
जातः । परेण । धर्मणा । यत् । सवृद्भिः । स । वृद्भिः । सह । अभुवः । पिता । यत् । कश्यपस्य । अग्निः । श्रद्धा । श्रत् । धा । माता । मनुः । कविः ॥९०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 90
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 10
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 9;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 10
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 9;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में मनुष्य-जन्म ग्रहण किये हुए जीवात्मा को सम्बोधन करके कहा गया है।
पदार्थ
हे जीवात्मन् ! तू (परेण) उत्कृष्ट (धर्मणा) धर्मनामक संस्कार के कारण (जातः) मानवयोनि में जन्मा है, (यत्) क्योंकि तू (सवृद्भिः सह) साथ रहनेवाले सूक्ष्मशरीरस्थ पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच सूक्ष्मभूत और मन तथा बुद्धि, इन सत्रह तत्त्वों के साथ (अभुवः) विद्यमान था। (यत्) क्योंकि (कश्यपस्य) तुझ द्रष्टा का (पिता) पिता अर्थात् मनुष्यशरीरदाता (अग्निः) अग्रणी तेजोमय परमात्मा है, अतः (श्रद्धा) श्रद्धा (माता) तेरी माता के तुल्य हो और तू (स्वयम् मनुः) मननशील, तथा (कविः) मेधावी बन ॥१०॥
भावार्थ
जब जीवात्मा मृत्यु के समय शरीर से निकलता है, तब सूक्ष्म शरीर उसके साथ विद्यमान होता है, और सूक्ष्मशरीरस्थ चित्त में धर्माधर्म नामक शुभाशुभ कर्म-संस्कार आत्मा के साथ जाते हैं। धर्म से वह मनुष्य-जन्म और अधर्म से पशु-पक्षी आदि का जन्म पाता है। जीवात्मा ज्ञानग्रहण के सामर्थ्यवाला होने से कश्यप अर्थात् द्रष्टा है। इसलिए उसे सकल ज्ञान-विज्ञान का संचय करना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर उसका शरीर में जन्म-दाता होता है, अतः पिता की महत्ता का विचार करके उसे जीवन में श्रद्धा को माता के समान स्वीकार करना चाहिए और स्वयं मननशील तथा मेधावी बनना चाहिए ॥१०॥ जो लोग यह कहते हैं कि कश्यप ऋषि का नाम है, श्रद्धा देवी का नाम है और मनु से वैवस्वत मनु का ग्रहण है, उनका मत वेदों में लौकिक इतिहास न होने से संगत नहीं है ॥ इस दशति में परमात्मा से यश, तेज, धन, बल आदि की प्रार्थना, परमात्मा के प्रभाव का वर्णन, अतिथि परमात्मा के प्रति हव्य-समर्पण और उसके पूजन की प्रेरणा होने से तथा परमात्मा को पिता और श्रद्धा को माता के रूप में वर्णित करने से इसके विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है, ऐसा जानो। प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त। प्रथम अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥
पदार्थ
(अग्निः) पापों वासनाओं का शोधक ज्ञानप्रकाशक परमात्मा (यत्) ‘यः’ ‘लिङ्गव्यत्ययः’ जो (कश्यपस्य पिता) सूक्ष्मदर्शी मन को निरुद्ध करने वाले योगी का “कश्यपः पश्यको भवति यत् सर्वं परिपश्यतीति सौक्ष्म्यात्” [तै॰ आ॰ १.८.८] पिता—पालक (श्रद्धा माता) श्रद्धा वाले ‘श्रद्धावतः-मतुब्लोपश्छान्दसः’ श्रद्धा योग में प्रज्ञा के पश्चात् निष्ठा वाले आत्मसमर्पी की माता—मान करने वाला—आश्रय देने वाला “प्रज्ञापूर्वरूपं श्रद्धोत्तररूपम्” [शां॰ आ॰ ३.७] (मनुः कविः) ‘मनोः’ ‘विभक्तिव्यत्ययः’ मनन करने वाले का अनूचान—गुरु है “ये वा अनूचानास्ते कवयः” [ऐ॰ २.२.३८] (यत् सवृद्भिः सहाभुवः) जबकि इनके साथ समागम वर्तन करने वालों के द्वारा सहभाव को प्राप्त हुआ परमात्मा (परेण धर्मणा जातः) अलौकिक अमृतगुण से प्रसिद्ध—साक्षात् हुआ करता है।
भावार्थ
परमात्मा सूक्ष्मदर्शी अभ्यासी का पिता—पालक, श्रद्धायुक्त वैराग्यवान् की माता और मननशील का आचार्य बनकर उनके द्वारा धारणा ध्यान समाधि में परम अमृतगुण के साथ साक्षात् होता है। इस प्रकार वह श्रवण, मनन, निदिध्यासन द्वारा साक्षात् हुआ करता है॥१०॥
विशेष
ऋषिः—मारीचो वामदेवः कश्यपो वा, मनुर्वैवस्वतो वा (वासनाओं को मार देने वाली वैराग्य ज्योतियों से सम्पन्न वननीयदेव वाला या शासन में आने योग्य मन से परमात्मामृत का पानकर्ता या सूर्यसमान ज्ञानप्रसारक परमात्मा का मननकर्ता जन)॥<br>
पदार्थ
(यत्)=क्योंकि (परेण)= सर्वोत्कृष्ट (धर्मणा) = धर्म के द्वारा तू (जात:)- विकसित हुआ है और (यत्)=क्योंकि (सवृद्भिः) = सह यज्ञों के साथ (अभुव:) = तूने अपने जीवन को युक्त किया है, अतः (कश्यपस्य) = तुझ ज्ञानी [ समझदार] का (अग्निः) = आगे ले-चलनेवाला प्रभु (पिता)=रक्षक हुआ है, (श्रद्धा) = सत्य का ही धारण करनेवाला तथा विकास का (माता)=निर्माण करनेवाला बना है, और (कवि:)=क्रान्तदर्शी, ज्ञानी (मनुः) = अवबोध को देनेवाला उपदेष्टा हुआ है।
मनुष्य का सर्वोत्कृष्ट धर्म 'ज्ञान-प्राप्ति' है। ('ब्रह्मचर्यं परो धर्म:')=ब्रह्मचर्य परम धर्म है, ब्रह्म=ज्ञान, चर्=उसका भक्षण | ब्रह्मचारी आचार्यकुल में २४, ३६ वा ४८ वर्ष रहकर ज्ञान का विकास करता है और फिर समय पर गृहस्थ में प्रवेश करता है।
गृहस्थ में उसे यज्ञमय जीवन बिताना है। यज्ञों को (स - वृत्) = साथ होनेवाले कहा है। ये यज्ञ सृष्टि के आरम्भ से ही जीव के साथ होनेवाले सवृत् हैं, मनुष्य को चाहिए कि इन यज्ञों के साथ ही अपना जीवन व्यतीत करे और यज्ञों से ही फूले-फले।
इस प्रकार ज्ञान व यज्ञ - प्रधान जीवनवाले मनुष्य को रक्षक प्रभु आगे ले-चलता हुआ मोक्ष तक पहुँचा देता है। वह अपने जीवन में सत्य - विश्वास के साथ चलता है। यह सच्चा विश्वास उसके उत्कर्ष का साधक होता है।
प्रभु की कृपा से जिसे समय-समय पर क्रान्तदर्शी, तत्त्वज्ञानी उपदेष्टाओं का सङ्ग प्राप्त होता रहता है, वह उत्तम मनवाला बना रहता है। इस प्रकार निर्भयता, सत्य, विश्वास व सौमनस्य से युक्त होकर वह (वामदेव) = उत्तम गुणोंवाला होता है, (कश्यप:) = ज्ञानी बनता है और (मनुः)=औरों को भी अपने जीवन से बोध देनेवाला होता है। ये ही इस मन्त्र के ऋषि हैं।
भावार्थ
हमारा जीवन ज्ञान व यज्ञ के लिए अर्पित हो। हम अपने को प्रभु - रक्षा का अधिकारी बनाएँ, सत्य - विश्वास से युक्त और सत्सङ्ग करनेवाले हों ।
विषय
परमेश्वर की स्तुति
भावार्थ
भा० - हे अग्ने ! तू ( परेण धर्मणा ) = परम उत्कृष्ट तपस्या और सदा चार के बल से ( जातः ) = उत्पन्न या प्रकट हुआ है ( यत् ) = क्योंकि ( सवृद्भिः ) = अपने साथ लगे हुए कर्मचारीगण, इन्द्रियों के ( सह ) = साथ मिलकर ( आभुवः ) = तू सब कार्य करने में समर्थ है । यह अग्नि आत्मा ( कश्यपस्य१ ) = इस ज्ञान के पान करनेहारे मन का ( पिता ) = पालक है और उसकी ( माता ) = जन्मभूमि ( श्रद्धा २ ) = सत्य का धारण करनेहारी बुद्धि है और ( मनुकवि: ) = मननशील क्रान्तदर्शी पुरुष आत्मा ही इसका गुण है।
परमात्मा के पक्ष में ( परेण धर्मणा ) = परम उत्कृष्ट, धारण सामर्थ्य से ( यत् ) = जो ( सवृद्भिः ) = साथ वर्तमान शक्तियों के साथ ( आभुवः ) = विद्यमान है । तू ( कश्यपस्य पिता ) = सूर्य आदि लोक और ज्ञानी पुरुषों का पालक है । ( अग्निः ) = प्रकाशस्वरूप, ( श्रद्धा ) = सत्य का धारक, ( माता ) = जगत् का कर्त्ता, ( मनुः ) = ज्ञानवान् ( कविः ) = मेधावी और पारदर्शी है ।
टिप्पणी
१, कश्यपः पश्यको भवति । शत० ।
२, श्रदिति सत्यनाम, नि० ३ । १० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - वामदेवः कश्यपो वा मारीचि मनुर्वा वैवस्वत उभौ वा ।
छन्द: - अनुष्टुप् ।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ गृहीतमानवजन्मानं जीवात्मानं सम्बोधयन्नाह।
पदार्थः
हे जीवात्मन् ! त्वम् (परेण) उत्कृष्टेन (धर्मणा) धर्माख्येन संस्कारेण निमित्तेन (जातः) मानवयोनौ गृहीतजन्मा वर्तसे, (यत्) यतः (सवृद्भिः१) सह वर्त्तन्ते इति सवृतः तैः सूक्ष्मशरीरस्थैः पञ्चप्राण- पञ्चज्ञानेन्द्रिय-पञ्चसूक्ष्मभूत-मनोबुद्धिरूपैः सप्तदशतत्त्वैः (सह) सार्द्धम् त्वम् (अभुवः) विद्यमानः आसीः। (यत्) यस्मात् (कश्यपस्य) द्रष्टुस्तव। पश्यतीति पश्यकः, वर्णविपर्ययेण कश्यपः। कश्यपः पश्यको भवति, यत् सर्वं परिपश्यतीति तै० आ० १।८।८। (पिता) जनकः (अग्निः) अग्रणीः तेजोमयः परमात्मा विद्यते, तस्मात् (श्रद्धा) श्रद्धा (माता) तव जननीतुल्या भवेत्, त्वं स्वयं च (मनुः) मननशीलः। मनु अवबोधने धातोः स्वृ० उ० १।१० इति उ प्रत्ययः। (कविः) मेधावी च भवेति शेषः। कविरिति मेधाविनाम। निघं० ३।१५।१० ॥
भावार्थः
यदा जीवात्मा मृत्युकाले शरीरान्निस्सरति तदा सूक्ष्मशरीरं तेन सह विद्यमानं भवति, सूक्ष्मशरीरस्थे चित्ते च प्रोता धर्माधर्माख्याः शुभाशुभकर्मसंस्कारा आत्मना सहैव गच्छन्ति। धर्मेण स मनुष्यजन्म, अधर्मेण च पशुपक्ष्यादिजन्मानि प्राप्नोति। जीवात्मा खलु ज्ञानग्रहणसामर्थ्यवत्त्वात् कश्यपो द्रष्टा वा वर्तते, अतस्तेन सकलस्य ज्ञानविज्ञानस्य संचयः कार्यः। यतः परमेश्वरः शरीरे तस्य जन्मदाता भवति, अतः पितुर्महत्त्वं विचार्य तेन जीवने श्रद्धा मातृवत् स्वीकर्त्तव्या, स्वयमपि च मननशीलेन मेधाविना च भाव्यम् ॥१०॥ ये तु ब्रुवन्ति कश्यपः ऋषेर्नाम, श्रद्धा देव्या नाम, मनुश्च वैवस्वत इति तेषां मतं न समञ्जसम्, वेदेषु लौकिकेतिहासाभावात् ॥ अत्र परमात्मनः सकाशाद् यशस्तेजोधनबलादिप्रार्थनात्, परमात्मप्रभाववर्णनाद्, अतिथिं तं प्रति हव्यसमर्पणार्थं तत्पूजार्थं च प्रेरणात्, परमात्मनि पितृत्वेन श्रद्धायां मातृत्वेन वर्णनाच्चैतस्य दशतेः पूर्वदशत्या सह सङ्गतिरस्तीति विजानीत। इति प्रथमे प्रपाठके द्वितीयार्धे चतुर्थी दशतिः। इति प्रथमेऽध्याये नवमः खण्डः ॥
टिप्पणीः
१. सह ये वर्तन्ते गच्छन्ति ते सवृतः, तैः सवृद्भिः, सहयोगलक्षणैषा तृतीया, सहगामिभिः सह—इति वि०। सवृद्भिः सह वर्तमानैः छन्दोभिः—इति भ०। यज्ञे सह वर्तन्ते इति सवृतः ऋत्विजः तैः सह—इति सा०।
इंग्लिश (3)
Meaning
O Soul, thou becomest manifest through austere penance and force of character. Thou art hence competent to perform thy task with the help of thy companions, the organs of senses. Thou art the father of mind, the recipient of knowledge. Faith is Thy mother, and a reflective person thy preceptor.
Meaning
Manifested in existence by supreme law of Dharma, coexistent with its highest concomitant natural powers, Agni, father protector of the soul and pranic energy, omniscient visionary and law giver, emerges in human consciousness from Shraddha, inviolable faith, which is the genitor of divine consciousness.
Translation
O fire divine, born as the loftiest among all, comrade of those who grow with him — the intellectual seers, are his fathers. Truth-based faith is the mother and the inner conscience his adorer.
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अग्निः) પાપો-વાસનાઓના શોધક જ્ઞાનપ્રકાશક પરમાત્મા (यत्) જે ( कश्यपस्य पिता) સૂક્ષ્મદર્શી મનનો નિરોધ કરનારા યોગીના પિતા-પાલક (श्रद्धामाता) શ્રદ્ધાવાળા શ્રદ્ધાયોગમાં પ્રજ્ઞાની પશ્ચાત્ નિષ્ઠાવાળા આત્મસમર્પીની માતા-માન કરનાર - આશ્રય આપનાર (मनुः कविः) મનન કરનારાના અનુચાન - ગુરુ છે (यत् सवृद्भिः सहाभुवः) જ્યારે એની સાથે સમાગમ વર્તન કરનારના દ્વારા સહભાવને પ્રાપ્ત થયેલ પરમાત્મા (परेण धर्मणा जातः) અલૌકિક અમૃતગુણથી પ્રસિદ્ધ - સાક્ષાત્ થયા કરે છે. (૧૦)
भावार्थ
ભાવાર્થ : પરમાત્મા સૂક્ષ્મદર્શી અભ્યાસીના પિતા-પાલક , શ્રદ્ધાયુક્ત વૈરાગ્યવાનની માતા અને મનનશીલના આચાર્ય-ગુરુ બનીને તેના દ્વારા ધારણા , ધ્યાન , સમાધિમાં પરમ અમૃત ગુણ સાથે સાક્ષાત્ થાય છે. આ રીતે તે શ્રવણ , મનન અને નિદિધ્યાસન દ્વારા સાક્ષાત્ થયા કરે છે. (૧૦)
उर्दू (1)
Mazmoon
بھگوان کی نظرِ عنایت سے پردے ہٹ جاتے ہیں
Lafzi Maana
پاپوں کو جلانے والا اگنی پرماتما (پرین دھرمنا) پردھرم کو دھارن کرنے ارتھات ستیہ برہم چریہ، تپ، اُپاسنا آدی پربرہم کی پراپتی کے لئے دیو کرم کرنے والے اُپاسک (سہ وِردبھی سہہ) اپنی دئیوی شکتیوں کے ساتھ (آبھُوہ جاتہ) کے اندر آ کر پرگٹ ہوتا، ظاہر طہور ہوتا ہے۔ تب وہ بھگت کشیپ نام والا ہو جاتا ہے۔ پاربرہم کی کرپا سے اُس کو پربھُو کی نظرِ عنایت، حقیقی نظر مل جاتی ہے۔ اور (یت اگنی) وہ اگنی پرماتما تب اُس دِویہ درشٹی بھگت کا سّچا پتا بن جاتا ہے۔ (شردھا ماتا) شردھا اُس کی ماتا بنتی ہے، اور (منوکوی) من اُس کا شکھشا دینے والا گوُرو ہو جاتا ہے۔
Tashree
پرمیشور پِتا شردھا ماتا اور من گورُو: منش اپنے پاپوں کو بھسم کر کے جب بھگوان کو ساکھشات کرنے کے لئے آگے بڑھتا ہے تو وہ ستیہ برہم چریہ اور اُپاسنا یوگ کو لگاتار کرتا ہوا پربھُو کی آشیرباد پا کر اُس کا پیارا پُتر ہو جاتا ہے۔ شردھا یعنی سچائی سے لبریز اُس کا جیون اُس کی ماتا بنتی ہے اور شُدھ نِرمل من اُس کو راہِ راست پر چلانے والا اُس کا گورُو ہو جاتا ہے۔ جس سے وہ بھگوان کا پرکاش پا کر آنند آنند ہو جاتا ہے۔
آنند بھیا میری مائے ستگورو میں پایا۔
Khaas
(نوان کھنڈ ختم ہوا)
मराठी (2)
भावार्थ
जेव्हा जीवात्मा मृत्यूच्या वेळी शरीरातून निघतो तेव्हा सूक्ष्म शरीर त्याच्याबरोबर वर्तमान असते व सूक्ष्म शरीरस्थ चित्तात धर्माधर्म नावाचे शुभाशुभ कर्मसंस्कार आत्म्याबरोबर जातात. धर्माने तो मनुष्य-जन्म व अधर्माने पशु-पक्षी इत्यादीचा जन्म प्राप्त करतो. जीवात्मा ज्ञानग्रहण करण्यास सामर्थ्यवान असल्यामुळे कश्यप अर्थात् द्रष्टा आहे, त्यासाठी त्याला संपूर्ण ज्ञान-विज्ञानाचा संचय केला पाहिजे. कारण परमेश्वर त्याचा शरीरदाता आहे. त्यासाठी पित्याच्या महत्तेचा विचार करून त्याला जीवनात श्रद्धेला मातेप्रमाणे स्वीकारले पाहिजे व स्वत: मननशील व मेधावी बनले पाहिजे ॥१०॥
टिप्पणी
जे लोक हे म्हणतात, की कश्यप ऋषीचे नाव आहे, श्रद्धा देवीचे नाव आहे व मनुने वैवस्वत मनुचे ग्रहण होते, त्यांचे मत वेदात लौकिक इतिहास नसल्यामुळे योग्य नाही. या दशतिमध्ये परमात्म्याचे यश, तेज, धन, बल इत्यादीची प्रार्थना, परमात्म्याच्या प्रभावाचे वर्णन, अतिथी परमात्म्याला हव्यसमर्पण व त्याच्या पूजेची प्रेरणा असल्यामुळे व परमात्म्याला पिता व श्रद्धेला माता या रूपाने वर्णित करण्याने या विषयाची पूर्वदशतिबरोबर संगती आहे, हे जाणा
विषय
पिता यत्कश्यपस्याग्नि: श्रद्धा माता मनु: कवि: ।।१०।।
शब्दार्थ
हे जीवात्मा, तू (परेण) उत्कृष्ट (धर्मणा) धर्मनाम संस्कारामुळे (जात:) मानव योनीत जन्मला आहेस. (यत्)कारण की तू आतापर्यंत (सवृद्धि सह) सोबत असणाऱ्या सूक्ष्म शरीरस्य पंच प्राणी, पंच ज्ञानेंद्रिये, पंच सूक्ष्मभूत आणि मन, बुद्धी या सतरा तत्त्वांसह (अभुवः) विद्यमान होतास. (यत्) कारण की (कश्यपस्य) तू जो द्रष्टा आहेस त्याचा (पिता) पिता म्हणजे मनुष्य देह देणारा (अग्निः) तो ते ओमय परमात्मा आहे. यामुळे (श्रद्धा) श्रद्धा (माता) तुझ्या मातेप्रमाणे असावी, व्हावी, आणि तू स्वतः (मनु) मननशील आणि (कविः) मेधावी हो. ।। १०।।
भावार्थ
जेव्हा जीवात्मा मृत्युसमयी शरीराहून प्रस्थान करतो त्या वेळी सूक्ष्म शरीर त्याचासह विद्यमान असतो. तसेच सूक्ष्म शरीरात सोबत असणाऱ्या चित्तामध्ये धर्म- अधर्म नाम शुभ - अशुभ कर्मांचे संस्कार आल्यासह जातात. धर्मामुळे त्या जीवास मनुष्य जातो. जीवात्मा ज्ञानग्रहणाने सामर्थ्य असल्यामुळे तो कश्यप म्हणजे द्रष्टा आहे. त्यामुळे त्याने समस्त ज्ञान विज्ञानाचा संचय केला पाहिजे. ज्याअर्थी परमेश्वर त्या आत्म्यास हा शरीर देऊन त्याचा जन्म द्दाता ठरतो, त्याअर्थी आपल्या पित्याच्या महानतेचा विचार करून आल्याने जीवनात श्रद्धेला माता रूपाने मानले पाहिजे आणि स्वतः मननशील व मेघांनी व्हावयास पाहिजे. ।। १०।। काही लोक म्हणतात की या मंत्रात आलेला कश्यप शब्द एका ऋषीचे नाव असून श्रद्धा देवीचे नाव आहे. तसेच येथे मनु शब्दाने वैवस्वत मनु अपेक्षित आहे, पण त्यांचे हे मत चुकीचे आहे. कारण की वेदामध्य्लौकीक इतिहास नाही.।। या दशतिमध्ये परमात्म्यास सुयश, तेज, धन, बल आदींची प्रार्थना केली आहे. याशिवाय या दशतीत परमेश्वराच्या प्रभावाचे वर्णन, अतिथीरूप परमेश्वराप्रत हव्य- समर्पण आणि त्याच्या पूजनधि प्रेरणा वर्णित आहे. येथे परमेश्वराला पिता श्रद्धा भावनेला माता म्हणून वर्णन केले असल्यामुळे या विषयांची संगती यापूर्वीच्या दशतीशी आहे, असे जाणावे.।। प्रथम प्रपाठकातील द्वितीय अर्धाची चतुर्थ दशति समाप्त। प्रथम अध्यायातील नवम खंड समाप्त.
तमिल (1)
Word Meaning
இந்த அக்னி [1] கசியபனின் (தந்தை,) [2] (சிரத்தை) அன்னையாகும், மனுவாகும். கவியுமாவான்(அனைத்தையும் அறிபவன்). தேவர்களோடு சேர்ந்து வளர்பவன். [3] பெரிய தர்மத்தால் பிறப்பவன்.
FootNotes
[1] கசியபனின் - மனத்தின்
[2] சிரத்தை - நிலயம்
[3] பெரிய தர்மத்தால் - உயரிய இயல்பால்
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