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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 956
    ऋषिः - त्रय ऋषयः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - जगती स्वरः - निषादः काण्ड नाम -
    32

    त्वं꣢ नृ꣣च꣡क्षा꣢ असि सोम वि꣣श्व꣢तः꣣ प꣡व꣢मान वृषभ꣣ ता꣡ वि धा꣢꣯वसि । स꣡ नः꣢ पवस्व꣣ व꣡सु꣢म꣣द्धि꣡र꣢ण्यवद्व꣣य꣡ꣳ स्या꣢म꣣ भु꣡व꣢नेषु जी꣣व꣡से꣢ ॥९५६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्व꣢म् । नृ꣣च꣡क्षाः꣢ । नृ꣣ । च꣡क्षाः꣢꣯ । अ꣣सि । सोम । विश्व꣡तः꣢ । प꣡व꣢꣯मान । वृ꣣षभः । ता꣢ । वि । धा꣣वसि । सः꣢ । नः꣣ । पवस्व । व꣡सु꣢꣯मत् । हि꣡र꣢꣯ण्यवत् । व꣣य꣢म् । स्या꣣म । भु꣡व꣢꣯नेषु । जी꣣व꣡से꣢ । ॥९५६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वं नृचक्षा असि सोम विश्वतः पवमान वृषभ ता वि धावसि । स नः पवस्व वसुमद्धिरण्यवद्वयꣳ स्याम भुवनेषु जीवसे ॥९५६॥


    स्वर रहित पद पाठ

    त्वम् । नृचक्षाः । नृ । चक्षाः । असि । सोम । विश्वतः । पवमान । वृषभः । ता । वि । धावसि । सः । नः । पवस्व । वसुमत् । हिरण्यवत् । वयम् । स्याम । भुवनेषु । जीवसे । ॥९५६॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 956
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आगे पुनः परमात्मा का ही विषय है।

    पदार्थ

    हे (सोम) सब जगत् को उत्पन्न करनेवाले, शुभ गुणों के प्रेरक परमात्मन् ! (त्वम्) आप (विश्वतः) सब ओर (नृचक्षाः) सब मनुष्यों के द्रष्टा (असि) हो। हे (पवमान) पवित्रकर्ता ! हे (वृषभ) सुखों की वर्षा करनेवाले ! आप (ता) उन दृश्यमान सब वस्तुओं में (विधावसि) व्याप्त हो। (सः) वह आप (वसुमत्) निवासक धन से युक्त, (हिरण्यवत्) सुवर्ण से युक्त, ज्योति से युक्त, वर्चस् से युक्त और यश से युक्त ऐश्वर्य को (नः) हमारे लिए (पवस्व) प्राप्त कराओ। (वयम्) हम (भुवनेषु) भूलोकों में (जीवसे) जीने के लिए (स्याम) समर्थ हों ॥२॥

    भावार्थ

    जो परमेश्वर सर्वद्रष्टा, सर्वान्तर्यामी, धन-धान्य,चाँदी-सोना, राज्य आदि देनेवाला, ज्योतिप्रदाता, कीर्तिप्रदाता, आरोग्यप्रदाता और दीर्घायुप्रदाता है, उसकी उपासना करके उसके रक्षण तथा मार्ग-प्रदर्शन में हम सदा ही रहें ॥२॥

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    पदार्थ

    (पवमान सोम) धारारूप में प्राप्त होने वाले शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (वृषभ) सुखवर्षक (नृचक्षाः-असि) मुमुक्षुजनों को देखता है—जानता है कौन से हैं (ता त्वं विश्वतः-विधावसि) तू उन सुखों को प्राप्त कराने सब ओर विविध गुणों से जाता है प्राप्त होता है (सः) वह तू (वसुवित्-हिरण्यवित् पवस्व) मोक्षवास प्राप्त करानेवाला अमृत प्राप्त कराने वाला हमें प्राप्त हो (वयं भुवनेषु जीवसे स्याम) हम लोकों में जीने के लिए समर्थ होवें॥२॥

    विशेष

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    विषय

    उत्तम जीवन

    पदार्थ

    हे (सोम) = सकल जगत् के उत्पादक! (पवमान) = सम्पूर्ण जीवों को पवित्र करनेवाले ! (वृषभ) = सब कामनाओं के पूरक प्रभो ! १. (त्वम्) = आप (विश्वतः) = सर्वत्र (नृचक्षाः असि)  =मनुष्यों के द्रष्टा [Look after] तथा ध्यान करनेवाले हैं । २. आप (ताः विधावसि) = उन्हें विशेषरूप से शुद्ध करनेवाले हैं [धाव्=शुद्धि]। आपका स्मरण ही उन्हें पवित्र करनेवाला है। ३. (सः नः) = वे आप हमारे लिए (वसुमत्) = उत्तमता से युक्त - निवास के लिए उपयोगी (हिरण्यवत्) = ज्योति व तेज से युक्त धन (पवस्व) = प्राप्त कराइए । ४. जिससे (वयम्) = हम (भुवनेषु) = इन लोकों में (जीवसे) = उत्तम जीवन बिताने के लिए (स्याम) = समर्थ हों ।

    भावार्थ

    प्रभु हमें उत्तम धन प्राप्त कराते हैं जिससे हम जीवन को उत्तमता से बिताते हैं ।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे (सोम) सबके प्रेरक ! आप (विश्वतः) सब प्रकार से और सर्वत्र (नृचक्षाः) सब मनुष्यों को देखने हारे हैं। हे (पवमान) समस्त हृदयों में प्रकट होने हारे ! हे (वृषभ) समस्त सुखों के वर्षक ! आप ही (ताः) इन प्रजानों में (वि धावसि) नाना प्रकार से व्यापक हो रहे हैं। (सः) वह आप (वसुमद्) वास योग्य प्राणों से युक्त (हिरण्यवत्) हिरण्य आदि सम्पत्तियों वाले, या आत्मा से युक्त ऐश्वर्य को 17:03 (नः पवस्व) हमें प्रदान करें। (वयं) हम (भुवनेषु) लोकों में (जीवसे) दीर्घ जीवन प्राप्त करने के (स्याम) समर्थ हों।

    टिप्पणी

    ‘तत्वा विप्रा’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—त्रय ऋषिगणाः। २ काश्यपः ३, ४, १३ असितः काश्यपो देवलो वा। ५ अवत्सारः। ६, १६ जमदग्निः। ७ अरुणो वैतहव्यः। ८ उरुचक्रिरात्रेयः ९ कुरुसुतिः काण्वः। १० भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ११ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्वा १२ मनुराप्सवः सप्तर्षयो वा। १४, १६, २। गोतमो राहूगणः। १७ ऊर्ध्वसद्मा कृतयशाश्च क्रमेण। १८ त्रित आप्तयः । १९ रेभसूनू काश्यपौ। २० मन्युर्वासिष्ठ २१ वसुश्रुत आत्रेयः। २२ नृमेधः॥ देवता—१-६, ११-१३, १६–२०, पवमानः सोमः। ७, २१ अग्निः। मित्रावरुणौ। ९, १४, १५, २२, २३ इन्द्रः। १० इन्द्राग्नी॥ छन्द:—१, ७ नगती। २–६, ८–११, १३, १६ गायत्री। २। १२ बृहती। १४, १५, २१ पङ्क्तिः। १७ ककुप सतोबृहती च क्रमेण। १८, २२ उष्णिक्। १८, २३ अनुष्टुप्। २० त्रिष्टुप्। स्वर १, ७ निषादः। २-६, ८–११, १३, १६ षड्जः। १२ मध्यमः। १४, १५, २१ पञ्चमः। १७ ऋषभः मध्यमश्च क्रमेण। १८, २२ ऋषभः। १९, २३ गान्धारः। २० धैवतः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनः परमात्मन एव विषयमाह।

    पदार्थः

    हे (सोम) सर्वजगदुत्पादक शुभगुणप्रेरक परमात्मन् ! (त्वम् विश्वतः) सर्वतः (नृचक्षाः) सर्वेषां नृणां द्रष्टा (असि) वर्तसे। हे (पवमान) पवित्रकर्तः, (वृषभ) सुखवर्षक ! त्वम् (ता) तानि दृश्यमानानि सर्वाणि वस्तूनि (वि धावसि) व्याप्नोषि। (सः) तादृशः त्वम्(वसुमत्) वासकधनयुक्तम्, (हिरण्यवत्) सुवर्णयुक्तं ज्योतिर्युक्तं वर्चोयुक्तं यशोयुक्तं च ऐश्वर्यम्। [ज्योतिर्वै हिरण्यम्। तां० ब्रा० ६।६।१०, वर्चो वै हिरण्यम्। तै० ब्रा० १।८।९।१, यशो वै हिरण्यम्। ऐ० ब्रा० ७।१८।] (नः) अस्मभ्यम् (पवस्व) प्रापय। (वयम् भुवनेषु) भूलोकेषु (जीवसे) जीवितुम् (स्याम) प्रभवेम ॥२॥

    भावार्थः

    यः परमेश्वरः सर्वद्रष्टा सर्वान्तर्यामी धनधान्यरजतसुवर्णराज्यादिप्रदो ज्योतिष्प्रदो यशस्प्रद आरोग्यप्रदो दीर्घायुष्प्रदश्चास्ति तमुपास्य तन्मार्गप्रदर्शने च वयं सदैव वर्तेमहि ॥२॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।८६।३८।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, Thou beholdest men from every side, O Pure God, the Showerer of joys. Thou art pervading Thy subjects. Pour down upon us wealth in treasure and in gold. May we have strength to live long under different circumstances !

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    Meaning

    O Soma, you are constant watchful guardian of humanity all round in all ways. O lord pure and purifying, vigorous and generous, you cleanse us with all those powers of yours. Pray purify and energise us so that we may be prosperous with peaceful settlement and golden graces of wealth, honour and excellence to live happy in the regions of the world. (Rg. 9-86-38)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (पवमान सोम) ધારારૂપમાં પ્રાપ્ત થનાર શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! તું (वृषभ) સુખવર્ષક (नृचक्षाः असि) મુમુક્ષુજનોને દેખે છે-જાણે છે. કોણ છે એ (ता त्वं विश्वतः विधावसि) તું તે સુખોને પ્રાપ્ત કરાવવા સર્વત્ર વિવિધ ગુણોથી જાય છે-પ્રાપ્ત થાય છે. (सः) તે તું (वसुवित् हिरण्यवित् पवस्व) મોક્ષવાસ પ્રાપ્ત કરાવનાર, અમૃત પ્રાપ્ત કરાવનાર અમને પ્રાપ્ત થા. (वयं भुवनेषु जीवसे स्याम) અમે લોકોમાં જીવવા માટે સમર્થ બનીએ. (૨)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो परमेश्वर सर्व द्रष्टा, सर्वान्तर्यामी, धनधान्य, चांदी-सोने, राज्य इत्यादी देणारा, ज्योतिप्रदाता, कीर्तिप्रदात, आरोग्यप्रदाता व दीर्घायू प्रदाता आहे, त्याची उपासना करून त्याचे रक्षण व मार्गदर्शन करण्यास आम्ही सदैव असावे. ॥२॥

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