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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 30/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अथर्वा देवता - विश्वे देवाः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायुप्राप्ति सूक्त
    86

    ये वो॑ देवाः पि॒तरो॒ ये च॑ पु॒त्राः सचे॑तसो मे शृणुते॒दमु॒क्तम्। सर्वे॑भ्यो वः॒ परि॑ ददाम्ये॒तं स्व॒स्त्ये॑नं ज॒रसे॑ वहाथ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये । व॒: । दे॒वा॒: । पि॒तर॑: । ये । च॒ । पु॒त्रा: । सऽचे॑तस: । मे॒ । शृ॒णु॒त॒ । इ॒दम् । उ॒क्तम् ।सर्वे॑भ्य: । व॒: । परि॑ । द॒दा॒मि॒ । ए॒तम् । स्व॒स्ति । ए॒न॒म् । ज॒रसे॑ । व॒हा॒थ॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ये वो देवाः पितरो ये च पुत्राः सचेतसो मे शृणुतेदमुक्तम्। सर्वेभ्यो वः परि ददाम्येतं स्वस्त्येनं जरसे वहाथ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये । व: । देवा: । पितर: । ये । च । पुत्रा: । सऽचेतस: । मे । शृणुत । इदम् । उक्तम् ।सर्वेभ्य: । व: । परि । ददामि । एतम् । स्वस्ति । एनम् । जरसे । वहाथ ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 30; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजतिलक-यज्ञ के उपदेश।

    पदार्थ

    (देवाः) हे विजयी देवताओ ! और (ये) जो (वः) तुम्हारे (पितरः) पितृगण (च) और (ये) जो (पुत्राः) पुत्रगण हैं, वह तुम सब (सचेतसः) सावधान हो कर (मे) मेरे (इदम्) इस (उक्तम्) वचन को (शृणुत) सुनो। (सर्वेभ्यः वः) तुम सबको मैं (एतम्) इसे [अपने को] (परि ददामि) सौंपता हूँ (एनम्) इस पुरुष के लिये [मेरे लिये] (स्वस्ति) कल्याण और मङ्गल (जरसे) स्तुति के अर्थ (वहाथ) तुम पहुँचाओ ॥२॥

    भावार्थ

    जो बुद्धिमान् मनुष्य शास्त्रवित् विजयशील वृद्ध, युवा और ब्रह्मचारियों की सेवा में आत्मसमर्पण करता है, वह पुरुष उन महात्माओं के सत्सङ्ग, उपदेश और सत्कर्मों से लाभ उठाकर संसार में अपनी स्तुति फैलाता है ॥२॥ टिप्पणी−(जरसे) शब्द का अर्थ “स्तुति के लिये” निघण्टु ३।१४। निरु० १०।८। और सायणभाष्य ऋग्वेद १।२।२। के प्रमाण से किया है। यहाँ पर सायणभाष्य में “जरायै, जराप्राप्तिपर्यन्तम्। बुढ़ापे के लिये, बुढ़ापे के आने तक” जो अर्थ है, वह असंगत है, वेद में जीवन को स्वस्थ और स्तुतियोग्य रखने का उपदेश है। देखो−अथर्ववेद, का० ६ सू० १२० म० ३ ॥ यत्रा॑ सु॒हार्दः॑ सु॒कृतो॒ मद॑न्ति वि॒हाय॒ रोगं॑ त॒न्वः स्वायाः॑। अश्लो॑णा॒ अङ्गैरह्रुताः स्व॒र्गे तत्र॑ पश्येम पितरौ च पुत्रान् ॥ जहाँ पर पुण्यात्मा मित्र अपने शरीर का रोग छोड़ कर आनन्द भोगते हैं, वहाँ पर स्वर्ग में बिना लंगड़े हुए और अङ्गों से बिना टेढ़े हुए हम माता-पिता और पुत्रों को देखते रहें। और देखो यजुर्वेद २५।२१। तथा ऋग्वेद १।८९।८। भ॒द्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्यजत्राः। स्थि॒रैरङ्गै॑स्तुष्टुवास॑स्त॒नूभि॒र्व्य॑शेमहि दे॒वहितं यदायुः ॥ हे विद्वान् जनो ! कानों से हम शुभ सुनते रहें, हे पूज्य महात्माओ ! आँखों से हम शुभ देखते रहें। दृढ़ अङ्गों और शरीरों से स्तुति करते हुए हम लोग वह जीवन पावें, जो विद्वानों का हितकारक है ॥

    टिप्पणी

    २−पितरः। १।२।१। पालकाः, उत्पादकाः। पुत्राः। १।११।५। आत्मजाः। स-चेतसः। समान+चिती ज्ञाने−असुन्। समानस्य छन्दसि०। पा० ६।३।८४। इति सभावः। समानचित्ताः, एकमनस्काः। शृणुत। श्रु श्रवणे−लोट्। आकर्णयत। इदम्। वक्ष्यमाणम्। उक्तम्। वच कथने−क्त। वचिस्वपियजादी०। पा० ६।१।१५। इति संप्रसारणम्। वचनम्। वः। युष्मभ्यम्। परिददामि। रक्षणार्थं दानं परिदानं समर्पणम्। रक्षितुं प्रयच्छामि, समर्पयामि। एतम्। आत्मानम्। स्वस्ति। सावसेः। उ० ४।१८१। सु+अस सत्तायां−ति। आशीर्वादम्, क्षेमम्। एनम्। माम् प्रति। जरसे। जरतेस्तौतीत्यर्चतिकर्माणौ−निघ० ३।१४। जरा स्तुतिर्जरते−स्तुतिकर्मणः। निरु० १०।८। यथा। वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः। ऋ० १।२।२। जरन्ते=स्तुवन्ति, जरितारः=स्तोतारः, इति सायणस्तद्भाष्ये। जॄ स्तुतौ, नैरुक्तधातुः। यद्वा। गॄ शब्दे=स्तुतौ असुन्, गकारस्य जकारः। स्तुत्यर्थम्। प्रशंसाप्राप्त्यर्थम्। वहाथ। वह प्रापणे−लेट्। द्विकर्मकः। यूयं प्रापयत ॥

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    विषय

    तीन पीढ़ियों का उत्तरदायित्व

    पदार्थ

    १. घर में व्यक्तियों को देववृत्ति का तो होना ही चाहिए। प्रभु जब घर में इन देववृत्ति के सन्तानों को भी सन्तान प्राप्त कराते हैं तब कहते हैं-हे (देवा:) = देववृत्ति के पुरुषो! ये (व: पितर:) = जो आपके पितस्थानीय बड़े व्यक्ति हैं, ये (च पुत्रा:) = और जो तुम्हारे पुत्र हैं वे सब के-सब (सचेतसः) = पूरी चेतनावाले होते हुए (मे) =  मेरे (इदम् उक्तम्) = इस कथन को (शृणुत) = सुनो कि (व: सर्वेभ्यः) = तुम सबके लिए मैं (एतम्) = इस वर्तमान सन्तान को (परिददामि) - प्राप्त कराता हूँ। आप इसका इस सुन्दरता से पालन करो कि (एनम्) = इसे (स्वस्ति) = कल्याणपूर्वक (जरसे) = जरावस्था तक-पूर्णायुष्य के लिए (बहाथ) - ले-चलनेवाले होओ। आप इसप्रकार से इसका पालन करो कि यह पूर्ण जीवन को प्राप्त करे। २. यहाँ मन्त्र में सन्तान के पिता को 'देवपुत्र' शब्द से स्मरण किया है। देवपुत्र होने से वे सन्तानों को उत्तम बनाएंगे ही। सन्तान के पितामह यहाँ 'देव' कहे गये हैं। प्रपितामह 'देवपितर' कहे गये हैं। इसप्रकार प्रपितामह, पितामह व पिता-सभी के संस्कार देवत्व को लिये हुए हैं-ये सन्तानों को उत्तम बनाएंगे ही। चतुर्थ पीढ़ी के समय इन तीनों का ही जीवित होना सम्भव है। ये ही अपनी क्रियाओं से सन्तान को प्रभावित करनेवाले हो सकते हैं, अत: इनका उत्तरादायित्व स्पष्ट है। ये सन्तान-निर्माण के लिए जागरूक रहेंगे तो सन्तान दीर्घजीवी व उत्तम क्यों न बनेंगे?

    भावार्थ

    सन्तान प्रपितामह, पितामह व पिता से विशेषरूप से प्रभावित होती है, अत: वे सन्तान को उत्तम बनाने का पूर्ण ध्यान करें।

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    भाषार्थ

    (देवाः) हे गुरुदेवो! (ये) जो (वः) तुम्हारे (पितरः ) पिता-माता हैं, (ये च पुत्राः) और जो पुत्र हैं, (सचेतसः) वे एकचित्त होकर (मे) मेरे ( इदम् उक्तम्) इस कथन को (श्रृणुत) सुनो कि (वः सर्वेभ्यः) तुम सबके प्रति (एतम्) इस ब्रह्मचारी को (परिददामि) मैं सौंपता हूँ, (एनम् ) इसे (स्वस्ति) कल्याणपूर्वक (जरसे) जरावस्था के लिये (वहाथ) तुम प्राप्त कराओ।

    टिप्पणी

    [ब्रह्मचर्याश्रम में गुरुओं के पितर अर्थात् माता-पिता आदि बुजुर्ग भी रहते हैं, और गुरुओं के पुत्र भी। ब्रह्मचारी का पिता, ब्रह्मचारी की रक्षा के लिये उन सबके प्रति कहता है कि मैं तुम सबके प्रति इसे सौंपता हूँ, तुम सब एकचित्त होकर इसकी रक्षा करो, और इस प्रकार इसे सुरक्षित करो कि यह जरावस्था तक पहुँच सके, उससे पूर्व इसकी मृत्यु न हो। वहाथ= वह प्रापणे (भ्वादिः)।

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    विषय

    प्रजा का राजा के प्रति कर्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( देवाः ) विद्वान् राष्ट्रवासिगणो ! आप लोग ( सचेतसः ) एकचित्त होकर, सावधान होकर ( मे ) मुझ-राष्ट्र-पुरोहित का या सभापति का ( इदम् ) यह ( उक्तं ) वचन ( शृणुत ) सुनो कि ( ये ) जो ( वः ) आप लोगों के ( पितरः ) जीवन के परिपालक मां, बाप और वृद्ध गुरु, आचार्य लोग हैं ( ये च पुत्राः ) और जो पुत्र आपको संकटों से रक्षा करनेहारे हैं मैं ( वः सर्वेभ्यः ) आप सबके (स्वस्ति) हित के लिये ( एतं ) इस राष्ट्रपति को ( परिददामि ) सबके ऊपर अधिष्ठातृ रूप से राष्ट्रसेवा के कार्य में समर्पित करता हूं । आप लोग भी (जरसे) वृद्ध अवस्था तक उत्तम प्रकार से ( एतं बहाथ ) आदरपूर्वक इसका शासन धारण करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    आयुष्कामोऽथर्वा ऋषिः। विश्वेदेवाः देवताः। वस्वादिदेवस्तुतिः । १, २, ४ त्रिष्टुभः। ३ शाकरगर्भा विराड् जगती । चतुर्ऋचं सूक्तम् ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Health and Full Age

    Meaning

    O Devas, divine powers of nature and humanity, noble citizens of the nation, parental seniors and their children of the younger generation, all who are supporters and protectors of the land, be alert and wide awake, and listen carefully to this word of mine: I declare and dedicate this man, this leader, this ruler to you all and commit you all for your common good to support and serve him to the last day of life.

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    Translation

    O enlightened ones, may those among you, who are fathers and who are sons, listen intently to these words uttered by me. I entrust this man wholly to your charge. Looking after him well carry him to the full span of life.

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    Translation

    O Ye men of watch and ward; hear of my state priest's word very attentively. I coronate this king for the prosperity of all of you who are fathers and mothers and who are sons and daughters, You accept to obey him till his old age.

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    Translation

    Listen, one-minded, to the word ‘1 utter, the sons, O learned persons, among you, and the fathers ! I trust this man to all of you: preserve him happily, and remain under his sways till your old age.

    Footnote

    I refers to the Purohit, who officiates at the coronation. ‘This man’ refers to the King.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−पितरः। १।२।१। पालकाः, उत्पादकाः। पुत्राः। १।११।५। आत्मजाः। स-चेतसः। समान+चिती ज्ञाने−असुन्। समानस्य छन्दसि०। पा० ६।३।८४। इति सभावः। समानचित्ताः, एकमनस्काः। शृणुत। श्रु श्रवणे−लोट्। आकर्णयत। इदम्। वक्ष्यमाणम्। उक्तम्। वच कथने−क्त। वचिस्वपियजादी०। पा० ६।१।१५। इति संप्रसारणम्। वचनम्। वः। युष्मभ्यम्। परिददामि। रक्षणार्थं दानं परिदानं समर्पणम्। रक्षितुं प्रयच्छामि, समर्पयामि। एतम्। आत्मानम्। स्वस्ति। सावसेः। उ० ४।१८१। सु+अस सत्तायां−ति। आशीर्वादम्, क्षेमम्। एनम्। माम् प्रति। जरसे। जरतेस्तौतीत्यर्चतिकर्माणौ−निघ० ३।१४। जरा स्तुतिर्जरते−स्तुतिकर्मणः। निरु० १०।८। यथा। वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः। ऋ० १।२।२। जरन्ते=स्तुवन्ति, जरितारः=स्तोतारः, इति सायणस्तद्भाष्ये। जॄ स्तुतौ, नैरुक्तधातुः। यद्वा। गॄ शब्दे=स्तुतौ असुन्, गकारस्य जकारः। स्तुत्यर्थम्। प्रशंसाप्राप्त्यर्थम्। वहाथ। वह प्रापणे−लेट्। द्विकर्मकः। यूयं प्रापयत ॥

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    बंगाली (3)

    पदार्थ

    (দেবাঃ) হে বিজয়ী বিদ্বানগণ! (য়ে) যাহারা (বঃ) তোমাদের (পিতরঃ) পিতা (য়ে) যাহারা (পুত্রাঃ) পুত্র, তোমরা সকলে (সচেতসঃ) সাবধান হইয়া (মে) আমার (ইদং) এই (উক্তং) বচনকে (শৃণুত) শুন (সর্বেভ্যঃ বঃ) তোমাদের সকলের নিকট (এতম্) আমাকে (স্বস্তি) কল্যাণ (জরসে) স্তুতির জন্য (বহাথ) পৌছাও।।

    भावार्थ

    হে বিজয়ী বিদ্বানগণ! তোমাদের পিতা, তোমাদের পুত্র এবং তোমরা সকলে সাবধান হইয়া আমার এই বচনকে শ্রবণ কর। তোমাদের সকলের নিকটে আমাদিগকে সমর্পন করিতেছি, আমাদের কল্যাণ বিধান কর।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    য়ে বো দেবাঃ পিতরো য়ে চ পুত্রাঃ সচেতসো মে শৃণুতেদমুক্তম্ । সর্বেভ্যো বঃ পরি দদাভ্যেতং স্বস্ত্যেনং জরসে বহাথ।।

    ऋषि | देवता | छन्द

    অথবা (আয়ুষ্কামঃ)। বিশ্বে দেবাঃ। ত্রিষ্টুপ্

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    मन्त्र विषय

    (রাজসূয়যজ্ঞোপদেশঃ) রাজতিলক যজ্ঞের জন্য উপদেশ।

    भाषार्थ

    (দেবাঃ) হে বিজয়ী দেবতাগণ ! এবং (যে) যে (বঃ) তোমাদের (পিতরঃ) পিতৃগণ (চ) এবং (যে) যে (পুত্রাঃ) পুত্রগণ রয়েছে, সেই তোমরা সবাই (সচেতসঃ) সাবধান হয়ে/সাবধানতাপূর্বক (মে) আমার (ইদম্) এই (উক্তম্) বচন (শৃণুত) শোনো/শ্রবণ করো। (সর্বেভ্যঃ বঃ) তোমাদের সবার মধ্যে (এতম্) এই [নিজেকে] (পরি দদামি) সমর্পণ করি। (এনম্) এই পুরুষের জন্য [আমার জন্য] (স্বস্তি) কল্যাণ এবং মঙ্গল (জরসে) স্তুতির অর্থ (বহাথ) তোমরা প্রেরণ করো ॥২॥

    भावार्थ

    যে বুদ্ধিমান মনুষ্য শাস্ত্রবিদ বিজয়শীল বৃদ্ধ, যুবক এবং ব্রহ্মচারীদের সেবায় আত্মসমর্পণ করেন, সেই পুরুষ সেই মহাত্মাদের সৎসঙ্গ, উপদেশ এবং সৎকর্মসমূহ থেকে লাভ প্রাপ্ত হয়ে সংসারে নিজের স্তুতি বিস্তার করবেন ॥২॥ টিপ্পণী−(জরসে) শব্দের অর্থ “স্তুতির জন্য” নিঘণ্টু ৩।১৪। নিরু০ ১০।৮। এবং সায়ণভাষ্য ঋগ্বেদ ১।২।২। এর প্রমাণ দ্বারা করা হয়েছে। এখানে সায়ণভাষ্যে “জরায়ৈ, জরাপ্রাপ্তিয়র্যন্তম্। বৃদ্ধ অবস্থার জন্য, বৃদ্ধ অবস্থা আসা পর্যন্ত” যে অর্থ রয়েছে, তা অসংগত। বেদে জীবনকে সুস্থ এবং স্তুতিযোগ্য রাখার উপদেশ রয়েছে। দেখুন−অথর্ববেদ, কা০ ৬ সূ০ ১২০ ম০ ৩ ॥ যত্রা॑ সু॒হার্দঃ॑ সু॒কৃতো॒ মদ॑ন্তি বি॒হায়॒ রোগং॑ ত॒ন্বঃ স্বায়াঃ॑। অশ্লো॑ণা॒ অঙ্গৈরহ্রুতাঃ স্ব॒র্গে তত্র॑ পশ্যেম পিতরৌ চ পুত্রান্ ॥ যেখানে পুণ্যাত্মা মিত্র নিজের শরীরের রোগ ত্যাগ করে আনন্দ ভোগ করেন, সেখানে স্বর্গে বিনা পঙ্গুতে এবং অঙ্গসমূহের বিনা হানিতে আমরা মাতা-পিতা এবং পুত্রদেরকে দেখতে থাকব। এবং দেখুন যজুর্বেদ ২৫।২১। তথা ঋগ্বেদ ১।৮৯।৮। ভ॒দ্রং কর্ণেভিঃ শৃণুয়াম দেবা ভ॒দ্রং প॑শ্যেমা॒ক্ষভি॑র্যজত্রাঃ। স্থি॒রৈরঙ্গৈ॑স্তুষ্টুবাস॑স্ত॒নূভি॒র্ব্য॑শেমহি দে॒বহিতং যদায়ুঃ ॥ হে বিদ্বানগণ ! কান দ্বারা আমরা শুভ শুনতে থাকব, হে পূজ্য মহাত্মাগণ ! চোখ দ্বারা আমরা শুভ দেখতে থাকব। দৃঢ় অঙ্গসমূহ এবং শরীর দ্বারা স্তুতি করতে করতে আমরা সেই জীবন লাভ করব, যা বিদ্বানদের হিতকারক হয়॥

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    भाषार्थ

    (দেবাঃ) হে গুরুদেবগণ ! (যে) যে (বঃ) তোমাদের (পিতরঃ) পিতা-মাতা রয়েছে, (যে চ পুত্রাঃ) এবং যে পুত্র রয়েছে, (সচেতসঃ) তাঁরা একচিত্ত হয়ে (মে) আমার (ইদম্ উক্তম) এই বিবৃতিকে (শৃণুত) শ্রবণ করুন/করুক (বঃ সর্বেভ্যঃ) তোমাদের সকলের প্রতি (এতম্) এই ব্রহ্মচারীকে (পরিদদামি) আমি সমর্পণ করি, (এনম্) একে (স্বস্তি) কল্যাণপূর্বক (জরসে) জরাবস্থার জন্য (বহাথ) তুমি প্রাপ্ত করাও।

    टिप्पणी

    [ব্রহ্মচর্যাশ্রমে গুরুদের পিতর অর্থাৎ মাতা-পিতা আদি গুরুজনও থাকে, এবং গুরুর পুত্রও। ব্রহ্মচারীর পিতা, ব্রহ্মচারীর রক্ষার জন্য তাঁদের সকলের প্রতি বলছে যে, আমি তোমাদের সকলের প্রতি একে[এই ব্রহ্মচারীকে] সমর্পণ/সমর্পিত করছি, তোমরা সবাই একচিত্ত হয়ে এর/ব্রহ্মচারীর রক্ষা করো, এবং এমনভাবে একে সুরক্ষিত করো যাতে জরাবস্থা পর্যন্ত পৌঁছোতে পারে, তার পূর্বে এর মৃত্যু যেন না হয়। বহাথ=বহ প্রাপণে (ভ্বাদিঃ)।]

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