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अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 12 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 12/ मन्त्र 5
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - आसुरी गायत्री छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    44

    प्र पि॑तृ॒याणं॒पन्थां॑ जानाति॒ प्र दे॑व॒यान॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । पि॒तृ॒ऽयान॑म् । पन्था॑म् । जा॒ना॒ति॒ । प्र । दे॒व॒ऽयान॑म् ॥१२.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र पितृयाणंपन्थां जानाति प्र देवयानम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । पितृऽयानम् । पन्थाम् । जानाति । प्र । देवऽयानम् ॥१२.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 12; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।

    पदार्थ

    (पितृयाणम्) पितरों [पालनकर्ता बड़े लोगों] के चलने योग्य (पन्थाम्) मार्ग को (प्र) भले प्रकार (जानाति) जान लेता है, (देवयानम्) और देवताओं [विद्वानों] के चलने योग्य [मार्ग]को (प्र) भले प्रकार [जान लेता है] ॥५॥

    भावार्थ

    गृहस्थ को योग्य है किआदरपूर्वक विद्वान् मर्यादापुरुष सत्यव्रतधारी अतिथि की आज्ञा से उत्तम-उत्तमकर्म करता रहे, जिससे उसकी मर्यादा और कीर्ति संसार में स्थिर होवे ॥४-७॥

    टिप्पणी

    ५−(प्र) प्रकर्षेण (पितृयाणम्) पालयितृभिर्गन्तव्यम् (पन्थाम्) पन्थानम् (जानाति) वेत्ति (प्र) (देवयानम्) विद्वद्भिर्गन्तव्यम् ॥

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    विषय

    अतिथि सत्कार व गृहरक्षण

    पदार्थ

    १. (सः) = वह गृहस्थ (य:) = जो (एवम्) = इस गति के स्रोत प्रभु को (विदुषा) = जाननेवाले व्रात्येन व्रतीपुरुष से (अतिसृष्टः) = अनुज्ञा दिया हुआ (जुहोति) = अग्निहोत्र करता है, (प्र पितृयाणं पन्थों जानाति) = पितृयाण मार्ग को जानता है और (देवयानं प्र)[जानाति] = देवयानमार्ग को भी जानता है। बड़ों के आदेश में चलना ही पितृयाणमार्ग है और दिव्यगुणों को प्राप्त करानेवाला मार्ग ही देवयान है। घर पर आये हुए मान्य अतिथि से अनुज्ञा लेकर अग्निहोत्र आदि में प्रवृत्त होने से घर में पितयाण व देवयान मार्गों की नींव पड़ती है। २. (य:) = जो (एवं विदुषा) = गति के स्रोत प्रभु के ज्ञाता व्रात्य से (अतिसृष्टः जुहोति) = अनुज्ञा दिया हुआ अग्निहोत्र करता है, वह (देवेषु) = देवों के विषय में (न आवश्चते) = अपने कर्तव्य को क्षीण नहीं करता, अर्थात् उनके विषय में अपने कर्तव्य का पालन करता है (अस्य हुतं भवति) = इसका अग्निहोत्र ठीक सम्पन्न होता है तथा (अस्मिन् लोके) = इस जगत् में (अस्य आयतनम्) = इसका घर (परिशिष्यते) = विनाश से बचा रहता है, अर्थात् इस घर में विलास आदि की वृत्तियों उत्पन्न होकर इसके विनाश का कारण नहीं बनती।

    भावार्थ

    विद्वान व्रती अतिथि से अनुजा लेकर ही अग्निहोत्र आदि में प्रवत्त होने से उस अतिथि का मान बना रहता है और गृहस्थ के घर में उत्तम प्रथाएँ बनी रहती हैं जो घर को विनष्ट नहीं होने देती।

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    भाषार्थ

    (सः) वह गृहस्थी मानो (पितृयाणम्) पितृपरम्परा द्वारा चले आए (पन्थाम्) शिष्टाचार के मार्ग को (प्र जानाति) ठीक प्रकार जानता है, और (देवयानम्) विद्वानों द्वारा चले आए मार्ग को भी (प्र) ठीक प्रकार जानता है, (५)

    टिप्पणी

    [पितृयाणम् = माता-पिता की परम्परा द्वारा चलाई गई अतिथियज्ञ की पद्धति। देवयानम् = विद्वान् लोगों द्वारा चलाई गई अतिथियज्ञ की पद्धति]

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    विषय

    अतिथि यज्ञ।

    भावार्थ

    (यः) जो (एवं) इस प्रकार से (विदुषा व्रात्येन अतिसृष्टः) विद्वान् व्रात्य से आज्ञा पाकर (जुहोति) अग्निहोत्र करता है (सः) वह (पितृयाणं पन्थाम्) पितृयाण मार्ग को (प्रजानाति) भली प्रकार जान लेता है और (देवयानं प्र) देवयान मार्ग के तत्व को भी जान लेता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १ त्रिपदा गायत्री, २ प्राजापत्या बृहती, ३, ४ भुरिक् प्राजापत्याऽनुष्टुप् [ ४ साम्नी ], ५, ६, ९, १० आसुरी गायत्री, ८ विराड् गायत्री, ७, ११ त्रिपदे प्राजापत्ये त्रिष्टुभौ। एकादशर्चं द्वादशं पर्यायसूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    He knows the path of the yajnic forefathers, he knows the path of the Devas by which men rise.

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    Translation

    He comes to know thoroughly the path traversed by the elders, (and) the path traversed by the enlightened ones.

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    Translation

    Knows indeed the path of enlightened persons (Devayana) and the path of Yajnik fathers and grand-fathers (Pitriyana),

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    Translation

    Well knows the path of the elders and that of the sages.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(प्र) प्रकर्षेण (पितृयाणम्) पालयितृभिर्गन्तव्यम् (पन्थाम्) पन्थानम् (जानाति) वेत्ति (प्र) (देवयानम्) विद्वद्भिर्गन्तव्यम् ॥

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