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अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 7 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - त्रिपदा निचृत गायत्री छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    395

    स म॑हि॒मासद्रु॑र्भू॒त्वान्तं॑ पृथि॒व्या अ॑गच्छ॒त्स स॑मु॒द्रोऽभ॑वत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स: । म॒हि॒मा । सद्रु॑: । भू॒त्वा । अन्त॑म् । पृ॒थि॒व्या: । अ॒ग॒च्छ॒त् । स: । स॒मु॒द्र: । अ॒भ॒व॒त् ॥७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स महिमासद्रुर्भूत्वान्तं पृथिव्या अगच्छत्स समुद्रोऽभवत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स: । महिमा । सद्रु: । भूत्वा । अन्तम् । पृथिव्या: । अगच्छत् । स: । समुद्र: । अभवत् ॥७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 7; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    परमात्माकी व्यापकता का उपदेश।

    पदार्थ

    (सः) वह [व्रात्यपरमात्मा] (महिमा) महिमास्वरूप और (सद्रुः) वेगवान् (भूत्वा) होकर (पृथिव्याः)पृथिवी के (अन्तम्) अन्त को (अगच्छत्) पहुँचा है, (सः) वह [परमात्मा] (समुद्रः)अन्तरिक्षरूप [अनादि, अनन्त] (अभवत्) हुआ है ॥१॥

    भावार्थ

    परमात्मा अपनी बड़ाईके कारण विद्वानों को पृथिवी से आगे अन्तरिक्ष के समान अनादि अनन्त जान पड़ता है॥१॥

    टिप्पणी

    १−(सः) व्रात्यः परमात्मा (महिमा) महत्-इमनिच्। महास्वरूपः (सद्रुः)हरिमितयोर्द्रुवः। उ० १।३४। सह+द्रु गतौ-कु, डित्। वेगवान् (भूत्वा) (अन्तम्)सीमाम् (पृथिव्याः) भूमेः (अगच्छत्) प्राप्तवान् (सः) (समुद्रः)अन्तरिक्षसदृशः (अभवत्) ॥

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    विषय

    महिमा-सद्रुः, समुद्रः

    पदार्थ

    १. (स:) = वह व्रात्य (महिमा) = [मह पूजायाम] पूजा की वृत्तिवाला-प्रभुपूजनपरायण तथा (सद्रुः) = द्रुतगति से युक्त-अतिकर्मनिष्ठ (भूत्वा) = होकर (पृथिव्याः अन्तम्) = पृथिवी के अन्त को पार्थिव भागों की समाप्ति को (आगच्छत्) = प्राप्त हुआ और परिणामतः (सः) = वह व्रात्य (समुद्रः) = अत्यन्त आनन्द-[मोद]-मय जीवनवाला हुआ। पार्थिव भागों से ऊपर उठकर प्रभुस्मरणपूर्वक कर्तव्यकर्मों में प्रवृत्त होना ही आनन्द का मार्ग है। २. (तम्) = उस व्रात्य को (प्रजापति: च परमेष्ठी च) = प्रजारक्षक, परम स्थान में स्थित प्रभु, (पिता च पितामहः च) = पिता और पितामह, (आपः च श्रद्धा च) = [आपः रेतो भूत्वा] शरीरस्थ रेत:कण और श्रद्धा की भावना (वर्ष भूत्वा) = आनन्द की वृष्टि का रूप धारण करके (अनुवर्तयन्त) = अनुकूलता से कर्मों में प्रवृत्त करते हैं। 'प्रभु प्रेरणा, बड़ों की प्रेरणा तथा शक्ति और श्रद्धा' इसे कर्तव्य-कर्मों में प्रेरित करते हैं। यह उन्हीं में आनन्द का अनुभव करता है। ३. (एनम्) = इस व्रात्य को आप: शरीरस्थ रेत:कण (आगच्छन्ति) = समन्तात् प्राप्त होते है। (एनम्) = इसे श्रद्धा-श्रद्धा आगच्छति-प्राप्त होती है। (एनम्) = इसे (वर्षम्) = आनन्द की वृष्टि (आगच्छति) = प्राप्त होती है। ये उस व्रात्य को प्राप्त होती हैं जो (एवं वेद) = इस प्रकार कर्तव्यकर्मों में प्रवृत्त होने के महत्व को समझ लेता है। वह यह समझ लेता है कि परमेष्ठी बनने का उपाय प्रजापति बनना ही है, अर्थात् सर्वोच्च स्थिति तभी प्राप्त होती है जब हम प्रजारक्षणात्मक कर्मों में प्रवृत्त हों।

    भावार्थ

    व्रात्य प्रभुपूजन-परायण होकर कर्तव्यकर्मों में लगा रहता है, पार्थिव भोगों से ऊपर उठकर आनन्दमय जीवनवाला होता है। इसे प्रभु-प्रेरणा, बड़ों की प्रेरणा तथा शक्ति और श्रद्धा सदा कर्मों में प्रेरित करती हैं।

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    भाषार्थ

    (सः) वह व्रात्य-संन्यासी (महिमा) महिमारूप (भूत्वा) हो कर (सद्रुः) द्रुतगति से (पृथिव्याः) पार्थिव शरीर के (अन्तम्) प्रान्त भाग अर्थात् शिरःस्थ सहस्रारचक्र तक (अगच्छत्) पहुँचा। (सः) वह वहां (समुद्रः) योग मुद्रा सम्पन्न (अभवत्) हो गया।

    टिप्पणी

    [महिमा = व्रात्य की इतनी महिमा बढ़ी कि वह शरीरधारी-महिमा रूप हो गया, अर्थात् वह महामहिम हो गया। सद्रुः = स+ द्रु (गतौ), द्रुत गति वाला, अथवा शीघ्र ही। पृथिव्याः= पृथिव्याः शरीरम् (अथर्व० ५/१०/८), "पृथिवी शरीरम् " (अथर्व० ५/९/७ ) इन मन्त्रों में पृथिवी द्वारा शरीर का ग्रहण प्रतीत होता है। क्योंकि शरीर रूपान्तर है, पृथिवी का। जैसे कि कहा है कि “Qust thou art to dust returneth", अर्थात् तुम मिट्टी हो, मिट्टी में ही वापिस लौट जाते हो। समुद्रः= मुद्रयासहितः (योग मुद्रा सहित; स्वरूपावस्थिति) शरीर के प्रान्तभाग अर्थात् सिर में "सहस्रारचक्र" है, जहां पहुंच कर, अर्थात् ध्यानावस्थित हो कर योगी परमगति को प्राप्त हो जाता है]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    He became greatness at the fastest, went to the end of the earth and cosmos, and became the vast ocean of Infinity.

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    Subject

    Vratyah

    Translation

    He, the majesty personified, becoming fluid went to the end of the earth. He becomes Ocean.

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    Translation

    He (Vratya) becoming moving majesty walks towards the end of the earth. He becomes sea.

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    Translation

    The Majestic and Powerful God pervaded the entire earth, and became beginningless and endless like space.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(सः) व्रात्यः परमात्मा (महिमा) महत्-इमनिच्। महास्वरूपः (सद्रुः)हरिमितयोर्द्रुवः। उ० १।३४। सह+द्रु गतौ-कु, डित्। वेगवान् (भूत्वा) (अन्तम्)सीमाम् (पृथिव्याः) भूमेः (अगच्छत्) प्राप्तवान् (सः) (समुद्रः)अन्तरिक्षसदृशः (अभवत्) ॥

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