अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 5
ऋषिः - अप्रतिरथः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
सूक्तम् - एकवीर सूक्त
39
ब॑लविज्ञा॒यः स्थवि॑रः॒ प्रवी॑रः॒ सह॑स्वान्वा॒जी सह॑मान उ॒ग्रः। अ॒भिवी॑रो अ॒भिष॑त्वा सहो॒जिज्जैत्र॑मिन्द्र॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ गो॒विद॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठब॒ल॒ऽवि॒ज्ञा॒यः। स्थवि॑रः। प्रऽवी॑रः। सह॑स्वान्। वा॒जी। सह॑मानः। उ॒ग्रः। अ॒भिऽवी॑रः। अ॒भिऽस॑त्वा। स॒हः॒ऽजित्। जैत्र॑म्। इ॒न्द्र॒। रथ॑म्। आ। ति॒ष्ठ॒। गो॒ऽविद॑न् ॥१३.५॥
स्वर रहित मन्त्र
बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः। अभिवीरो अभिषत्वा सहोजिज्जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोविदम् ॥
स्वर रहित पद पाठबलऽविज्ञायः। स्थविरः। प्रऽवीरः। सहस्वान्। वाजी। सहमानः। उग्रः। अभिऽवीरः। अभिऽसत्वा। सहःऽजित्। जैत्रम्। इन्द्र। रथम्। आ। तिष्ठ। गोऽविदन् ॥१३.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(बलविज्ञायः) बल का जाननेहारा (स्थविरः) पुष्टाङ्ग [वा वृद्ध अर्थात् अनुभवी], (प्रवीरः) बड़ा वीर, (सहस्वान्) बड़ा बली, (वाजी) बड़ा ज्ञानी [वा अन्नवाला], (सहमानः) हरानेवाला, (उग्रः) प्रचण्ड, (अभिवीरः) सब ओर वीरों को रखनेवाला, (अभिसत्वा) सब ओर युद्धकुशल विद्वानों को रखनेवाला, (सहोजित्) बल से जीतनेवाला, (गोविदन्) पृथिवी के देशों [वा वाणियों] को जाननेवाला होकर, (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [महाप्रतापी सेनापति] (जैत्रम्) विजयी (रथम्) रथ पर (आ तिष्ठ) बैठ ॥५॥
भावार्थ
अपने और शत्रु के बल को जाननेवाला सेनाध्यक्ष अपने युद्धकुशल वीरों और युद्ध सामग्री के साथ चढ़ाई करे ॥५॥
टिप्पणी
यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१०३।५, यजुर्वेद १७।३५ और सामवेद−उ० ९।३।२ ॥ ५−(बलविज्ञायः) कर्मण्यण्। पा० ३।२।१। इत्यण्। आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७।३।३३। इति युगागमः। बलस्य ज्ञाता (स्थविरः) म० १। पुष्टाङ्गः। बलविद्यावृद्धः (प्रवीरः) प्रकृष्टो वीरः शूरः (सहस्वान्) महाबली (वाजी) ज्ञानवान्। अन्नवान् (सहमानः) अभिभवनशीलः (उग्रः) तीव्रतेजाः (अभिवीरः) अभितो वीरा यस्य सः (अभिसत्वा) अ० ५।२०।८। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु-क्वनिप्, दस्य तः। अभितः सत्वानो युद्धविद्वांसो यस्य सः (सहोजित्) बलेन जेता (जैत्रम्) जेतृ-अण् प्रज्ञादिः। जेतारम्। विजयिनम् (इन्द्र) हे महाप्रतापिन् सेनापते (रथम्) युद्धयानम् (आ तिष्ठ) आरोह (गोविदन्) गाः पृथिवीदेशान् वाचो वा जानन् सन् ॥
विषय
जैत्ररथ का आरोहण
पदार्थ
१. गतमन्त्र का उपासक (बलविज्ञायः) = बल के कारण प्रसिद्ध होता है [Known for his vigour] (गोविदन्) = वेदवाणियों का ज्ञाता बनकर (जैत्रं रथम् आतिष्ठ) = विजयशील शरीर-रथ पर आसीन हो। तुझमें बल व ज्ञान का समन्वय हो-यह समन्वय तुझे विजयी बनाए। (अभिवीरः अभिषत्वा) [सत्वा] = तू वीरता की ओर चलनेवाला हो और सत्त्वगुण की ओर चलनेवाला हो ज्ञान की ओर । तूने वीरता व ज्ञान दोनों को अपनाना है। २. (स्थविर:) = स्थिरमति का बनना है और (प्रवीरः) = खूब वीर बनना है। (सहस्वान्) = ज्ञानी बनकर सहनशक्तिवाला [Toleration] बनना है और (वाजी) = शक्तिशाली होना है। (सहमान:) = ज्ञान के द्वारा सहनशक्तिवाला व (उग्र:) = तेजस्वी बनना है। संक्षेप में (सहोजित्) = तूने सहस् के द्वारा शत्रुओं का विजेता होना है।
भावार्थ
हम अपने जीवनों में बल व ज्ञान का समन्वय करते हुए सदा विजयी बनें।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे ऐश्वर्य के स्वामिन् तथा शत्रुओं के विदारक या द्रावक सेनापति! आप (बलविज्ञायः) अपने सैनिक बल को जानते, (स्थविरः) वृद्ध तथा अनुभवी, (प्रवीरः) प्रकृष्ट वीर, (सहस्वान्) अत्यन्त बलवान्, (वाजी) अन्नसामग्री से भरपूर, (सहमानः) सहनशील, (उग्रः) तीव्र तेजस्वी, (अभिवीरः) वीर सैनिकों से घिरे हुए, (अभिषत्वा) शत्रु विनाशक सैनिकों वाले, (सहोजित्) तथा निजबल से विजेता हैं। (गोविदन्) आप पृथिवी की समस्याओं को जानते हुए, विजयार्थ (जैत्रम्) विजयी (रथम्) रथ में (आतिष्ठ) आ बैठिये। [इन्द्रः= इन्दन् शत्रूणां दारयिता द्रावयिता वा” (निरु০ १०.१.८)।]
विषय
इन्द्र, राजा और सेनापति का वर्णन।
भावार्थ
(बलविज्ञायः) अपने और पराये के बल, सेनाबल को भली प्रकार जानने वाला अथवा सब द्वारा यही हमारा बल है ऐसा जाना हुआ (स्थविरः) युद्ध में स्थिर या पुराना अनुभवी (प्रवीरः) उत्कृष्ट वीर्यवान् सुवीर (सहस्वान्) बलवान् (वाजी) वीर्यवान् अन्न, बल से सम्पन्न (उग्रः) अति भयकारी (सहमानः) शत्रु को पराजित करता हुआ (अभिवीरः) साथ अपने दायें बायें वीर्यवान् नाना वीर पुरुषों को लिये हुए (अभिषत्वा) साक्षात् अधिक सत्व-बल को धारण करने वाला अथवा चारों तरफ़ अपने मोर्चे बैठाने वाला या मुकाबले पर डटने वाला, अथवा चारों ओर बलवान् पुरुषों से घिरा या बलवान् पुरुषों से भी बढ़कर बलवान् (सहोजित्) सबके बलों का विजेता ही राजा इन्द्र है। हे (इन्द्र) इन्द्र ऐश्वर्यवान् राजन् ! हे (गोविदन्) गौ पृथिवी को अपने वश करने हारे तू (रथम् आतिष्ठ) विजयी रथ पर बैठ।
टिप्पणी
(तृ०) ‘सहोजाः’ (च०) ‘गोवित्’ इति साम० ऋ०। (च०) ‘जैत्रायैरथमातिष्ठ कोविदम्’ इति पैप्प० स०। ‘गोविदम्’ इति क्वचित्।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अप्रतिरथ ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Sole Hero
Meaning
Indra, tactical organizer of deployable forces, venerable, strong, undisturbed and invulnerable, stout and brave, challenging, impetuous, blazing steadfast, commander of the brave, highly intelligent, valiant, illustrious, pray ascend the chariot of victory over the rebellious lands.
Translation
O resplendent one (army-chief), having full information of - the opposing army, senior-most, valiant, full of strength, agile, overwhelming the foes formidable, ready to engage every warrior, surrounded by servants, born out of strength as if, appreciator of praises, may you mount your conquering chariot now. (Yv. XVII.37).
Translation
He is conspicuous by his strength, sturdy great fighter mighty fierce, victorious and all subduing. O mighty ruler, you possess in an overcoming might, having your brave fighters, making strategies, over-powering others with might and winning the statesmen and priests mount this chariot of victory.
Translation
The worthy commander is he, who knows well his own might as well as the striking potentialities of his adversary, is steadfast and unmoved even in reverses, is uncommonly brave, is courageous, powerful and equipped with ample supplies of provisions, arms and military strategy, able to subdue and strike terror among the enemy forces, surrounded by the brave warriors on all sides, bravely facing the enemy on all fronts, the conqueror, who can subdue the powers of all. O Controller of the earth, enthrall yourself in this chariot or plane.
Footnote
cf. Rig, 10.103.4.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१०३।५, यजुर्वेद १७।३५ और सामवेद−उ० ९।३।२ ॥ ५−(बलविज्ञायः) कर्मण्यण्। पा० ३।२।१। इत्यण्। आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७।३।३३। इति युगागमः। बलस्य ज्ञाता (स्थविरः) म० १। पुष्टाङ्गः। बलविद्यावृद्धः (प्रवीरः) प्रकृष्टो वीरः शूरः (सहस्वान्) महाबली (वाजी) ज्ञानवान्। अन्नवान् (सहमानः) अभिभवनशीलः (उग्रः) तीव्रतेजाः (अभिवीरः) अभितो वीरा यस्य सः (अभिसत्वा) अ० ५।२०।८। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु-क्वनिप्, दस्य तः। अभितः सत्वानो युद्धविद्वांसो यस्य सः (सहोजित्) बलेन जेता (जैत्रम्) जेतृ-अण् प्रज्ञादिः। जेतारम्। विजयिनम् (इन्द्र) हे महाप्रतापिन् सेनापते (रथम्) युद्धयानम् (आ तिष्ठ) आरोह (गोविदन्) गाः पृथिवीदेशान् वाचो वा जानन् सन् ॥
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