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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 8
    ऋषिः - अथर्वा देवता - मन्त्रोक्ताः छन्दः - साम्नी त्रिष्टुप् सूक्तम् - सुरक्षा सूक्त
    44

    इन्द्रं॒ ते म॒रुत्व॑न्तमृच्छन्तु। ये मा॑ऽघा॒यव॑ ए॒तस्या॑ दि॒शोऽभि॒दासा॑त् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्द्र॑म्। ते। म॒रुत्ऽव॑न्तम्। ऋ॒च्छ॒न्तु॒। ये। मा॒। अ॒घ॒ऽयवः॑। ए॒तस्याः॑। दि॒शः। अ॒भि॒ऽदासा॑त् ॥१८.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्रं ते मरुत्वन्तमृच्छन्तु। ये माऽघायव एतस्या दिशोऽभिदासात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्रम्। ते। मरुत्ऽवन्तम्। ऋच्छन्तु। ये। मा। अघऽयवः। एतस्याः। दिशः। अभिऽदासात् ॥१८.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 18; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

    पदार्थ

    (ते) वे [दुष्ट] (मरुत्वन्तम्) शूरों के स्वामी (इन्द्रम्) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवान् परमात्मा] की (ऋच्छन्तु) सेवा करें। (ये) जो (अघायवः) बुरा चीतनेवाले (मा) मुझे (एतस्याः) इस [बीचवाली] (दिशः) दिशा से (अभिदासात्) सताया करें ॥८॥

    भावार्थ

    मन्त्र १ के समान है ॥८॥

    टिप्पणी

    ८−(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (मरुत्वन्तम्) मरुतां शत्रुमारकाणां शूराणां स्वामिनम्। अन्यत् पूर्ववत्॥

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    विषय

    प्राणाग्नि में पापदहन

    पदार्थ

    १. (ये) = जो (अघायवः) = मेरे अशुभ की कामनावाले पापभाव (मा) = मुझे एतस्याः दिश:-इस उत्तर-पूर्व के बीच की दिशा से अभिदासात-क्षीण करते हैं, ते वे मरुत्वन्तम्-प्रशस्त प्राणोंवाले इन्द्रम्-शत्रु-विद्रावक शक्तिशाली प्रभु को ऋच्छन्तु-प्राप्त होकर नष्ट हो जाएँ। २. इस दिशा से 'इन्द्र' मेरा रक्षण कर रहे हैं। वे मुझे शत्रु-विनाश के लिए इन प्रशस्त प्राणों को प्राप्त कराते हैं। इस प्राणसाधना के होने पर इन सब पापमय भावनाओं का दहन हो जाता है। प्राणायामैदहेदोषान् ।

    भावार्थ

    मैं प्रभु-प्रदत्त प्राणों की साधना करता हुआ पापों को दग्ध करनेवाला बनूं।

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    भाषार्थ

    (ये) जो (अघायवः) पापेच्छुक-हत्यारे (एतस्याः दिशः) इस दिशा से (मा) मेरा (अभिदासात्) क्षय करें, (ते) वे (मरुत्वन्तम्) मनुष्यजाति के स्वामी (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर [के न्यायदण्ड] को (ऋच्छन्तु) प्राप्त हों।

    टिप्पणी

    [मरुत्वन्तम्= मरुतः मनुष्या मरणधर्माणः (देखो—सूक्त १७ मन्त्र ८ की टिप्पणी)। इन्द्रम्=इदि परमैश्वर्ये। एतस्याः दिशः= सम्भवतः उत्तर-पूर्व की अवान्तर दिशा या उत्तर दिशा।]

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    विषय

    रक्षा की प्रार्थना।

    भावार्थ

    (ये अघायवः मा उदीच्याः दिशः अभिदासात् ते) जो दोही मेरे ऊपर उत्तर दिशा से आक्रमण करें वे (सप्तऋषिवन्तं विश्वकर्माणं ऋच्छन्तु) सात ऋपियों से युक्त विश्वकर्मा को प्राप्त होकर नष्ट हो जांय। (ये अघायवः मा एतस्याः दिशः अभिदासात्) जो द्रोही उसी दिशा से मुझ पर आक्रमण करते हैं (ते) वे (मरुत्वन्तम् इन्द्रम् ऋच्छन्तु) मरुतों या नाना वायु, शक्तियों या वायु के समान वेगवान् सैनिकों से सम्पन्न इन्द्र सेनापति को प्राप्त होकर नष्ट हों।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता देवताः। १, ८ साम्न्यौ त्रिष्टुभौ, २-६ आर्ष्यनुटुभौ। ५ सम्राड्=स्वराड्। ७, ९, १०, प्राजापत्यास्त्रिष्टुभः। दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Protection and Security

    Meaning

    To the dispensation of Indra, lord omnipotent, who commands the tempestuous windy Maruts of the skies, may they proceed in the course of justice who are of negative and destructive nature and treat and hurt me as an alien, from the same northern direction.

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    Translation

    To the resplendent Lord with Maruts (the cloud-bearing winds), may they go (for their destruction). who of sinful intent invade me from this direction (middle of the north and the east).

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    Translation

    Let............from this region (north).........to Almighty God with Maruta.

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    Translation

    Let those wicked foes, who come with the murderous assault against us, meet their death by approach of our mighty commander, with warriors, possessing the striking power of the furious winds.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (मरुत्वन्तम्) मरुतां शत्रुमारकाणां शूराणां स्वामिनम्। अन्यत् पूर्ववत्॥

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