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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 37 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 4
    ऋषिः - अथर्वा देवता - अग्निः छन्दः - पुरउष्णिक् सूक्तम् - बलप्राप्ति सूक्त
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    ऋ॒तुभ्य॑ष्ट्वार्त॒वेभ्यो॑ मा॒द्भ्यः सं॑वत्स॒रेभ्यः॑। धा॒त्रे वि॑धा॒त्रे स॒मृधे॑ भू॒तस्य॒ पत॑ये यजे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऋ॒तुऽभ्यः॑। त्वा॒। आ॒र्त॒वेभ्यः॑। मा॒त्ऽभ्यः। स॒म्ऽव॒त्स॒रेभ्यः॑। धा॒त्रे। वि॒ऽधा॒त्रे। स॒म्ऽऋधे॑। भू॒तस्य॑। पत॑ये। य॒जे॒ ॥३७.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्यः संवत्सरेभ्यः। धात्रे विधात्रे समृधे भूतस्य पतये यजे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ऋतुऽभ्यः। त्वा। आर्तवेभ्यः। मात्ऽभ्यः। सम्ऽवत्सरेभ्यः। धात्रे। विऽधात्रे। सम्ऽऋधे। भूतस्य। पतये। यजे ॥३७.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 37; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    बल की प्राप्ति का उपदेश –॥

    पदार्थ

    [हे परमात्मन् !] (ऋतुभ्यः) ऋतुओं के लिये, (आर्तवेभ्यः) ऋतुओं में उत्पन्न पदार्थों के लिये, (माद्भ्यः) महीनों के लिये, (संवत्सरेभ्यः) वर्षा के लिये, (धात्रे) पोषक पुरुष के लिये, (विधात्रे) बुद्धिमान् जन के लिये, (समृधे) बढ़ती करनेवाले के लिये और (भूतस्य) प्राणीमात्र के (पतये) रक्षक पुरुष के लिये (त्वा) तुझे (यजे) मैं पूजता हूँ ॥४॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को योग्य है कि अपने समस्त समय और समस्त पदार्थों को संसार के हित में लगाकर परमात्मा की उपासना करते रहें ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(ऋतुभ्यः) ऋतूनां हिताय (त्वा) (आर्तवेभ्यः) ऋतुषु भवेभ्यः पदार्थेभ्यः (माद्भ्यः) मासेभ्यः (संवत्सरेभ्यः) वर्षेभ्यः (धात्रे) पोषकाय (विधात्रे) मेधाविने-निघ०३।१५ (समृधे) समर्धयित्रे। वर्धयित्रे (भूतस्य) प्राणिमात्रस्य (पतये) पालकाय (यजे) पूजयामि ॥

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    भाषार्थ

    हे अग्निशमक परमेश्वर! (ऋतुभ्य:) ऋतुओं से (आतवेभ्यः) ऋतुजन्य पदार्थों से (माद्भ्यः) मासों से (संवत्सरेभ्यः) और वर्षों से (समृधे) समृद्धि प्राप्त करने के लिये, (धात्रे) धारण-पोषण करनेवाले, (विधात्रे) विधियों के विधाता, (भूतस्य) और भूत भौतिक जगत् और प्राणिजगत् के (पतये) रक्षक पालक तथा स्वामी आप की प्राप्ति के लिए (त्वा यजे) मैं आप का यजन करता हूं, आप देव का पुजन तथा संग करता हुं, तथा आप के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं। [यजे= यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु।]

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    विषय

    'धात्रे-विधात्रे, समृधे, भूतस्य पतये' यजे

    पदार्थ

    १. हे प्रभो! (ऋतुभ्य:) = ऋतुओं के लिए (त्वा यजे) = मैं आपका पूजन करता हूँ। आपके पूजन से मुझे ऋतुओं की अनुकूलता हो। (आर्तवेभ्य:) = ऋतुओं में उत्पन्न होनेवाले फूल-फलों के लिए मैं आपका उपासन करता हूँ। मुझे उनकी अनुकूलता प्राप्त हो। (माभ्यः संवत्सरेभ्यः) = महीनों व वर्षों के लिए मैं आपका पूजन करता हूँ। आपका पूजन मेरे मासों व वर्षों को उत्तम व सफल बनाए। २. मैं (धात्रे) = सृष्टि का धारण करनेवाले, (विधात्रे) = सृष्टि का निर्माण करनेवाले, (समृधे) = सब प्रकार के ऐश्वर्योवाले (भूतस्य पतये) = सब प्राणियों के स्वामी आपके लिए (यजे) = अपना अर्पण करता हूँ। आपने ही मेरे जीवन-रथ का सारथि बनकर इसे लक्ष्य-स्थान पर पहुँचाना है।

    भावार्थ

    प्रभु-पूजन से हमारे लिए ऋतुओं, मासों ब वर्षों को अनुकूलता प्रास हो। हम उस प्रभु के प्रति अपना अर्पण करें जोकि 'धाता, विधाता, समृद्ध व भूतपति' है। सूक्त का ऋषि 'अथर्वा' गुग्गुल आदि पदार्थों का यथायोग करता हुआ स्वस्थ बनता है -

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    विषय

    वीर्य, बल की प्राप्ति।

    भावार्थ

    हे अग्ने ! राजन् (त्वा) तुझको (ऋतुभ्यः) ऋतुओं अर्थात् राजसभा के सदस्यों के लिये, (आर्तवेभ्यः) उनके समान अन्य प्रजाधिकारियों के लिये (मादभ्यः) संवत्सर प्रजापति के अधीन मासों के समान आदित्य प्रजा के अधिकारियों के लिये और (संवत्सरभ्यः) वर्ष के समान अन्य प्रजापतियों, प्रजापालक भूपतियों के लिये अर्थात् उनपर शासन करने के लिये वरण करता हूं। और (धात्रे) राष्ट्र के धारण करने वाले, (विधात्रे) कानून विधान करने वाले, (समृधे) देश को सम्पन्न करने या राज्य कार्य में शत्रुओं को वश करने वाले (भूतस्यपतये) समस्त प्राणियों के पालक उस परमेश्वर या महान् राजा का (यजे) मैं संगति—लाभ करूं। देखो अथर्व० ५। २। ८। ३१॥ प्रायः हस्तलिपियों में इस मन्त्र की प्रतीक मात्र दी है ‘ऋतुभिष्ट्वेत्येका’ सायण ने भाष्य में ३। १०। १० को दोहराया है। ह्विटनि ने ५। २८। १३ को दोहराया है। अथर्व सर्वानुक्रमणी में ‘ऋतुभ्यष्ट्वार्त्तवेभ्यः’ लिखा है। अतः जो मन्त्र दिया है वही ठीक है।

    टिप्पणी

    अस्याः स्थाने ह्विटनिग्रीफिथादयः अथर्व० ५। २८। १३ इति ऋचं पुनरावर्त्तयन्ति। तदसत्। ‘ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यः’ तिस्पष्टमनुक्रमणिका वचनात्। सायणोल्लेखाच्च॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। अग्निर्देवता। १ त्रिष्टुप्। २ आस्तारपंक्तिः। ३ त्रिपदा महाबृहती। ४ पुरोष्णिक्। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Health and Energy

    Meaning

    I light the holy fire, offer fragrant havi and meditate on you, Agni, together with friends and fellow citizens for favour of the seasons, for gifts of the seasons, for months and years, in honour of Dhata, the sustainer, Vidhata, ordainer and law-giver, giver of prosperity, and protector of all living forms.

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    Translation

    I adopt you for the sake of the seasons and Season-groups, for months and years, for the sustainer and the creator for the enricher and the Lord of all existence.

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    Translation

    I accept this fire for surpassing strength, and energy, for vigor, for over-powering splendor, for overcoming spirit and for the protection of the nation through a hundred autumns.

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    Translation

    I seek union with thee for peacefully enjoying the main seasons i.e., hot, rainy and the cold ones; and similarly passing the intervening season i.e. the autumn, the mild winter and the spring; for months; for years, for production; for administration; for progress and prosperity; and for the Lord of all creatures or the king, the master of all his subjects.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(ऋतुभ्यः) ऋतूनां हिताय (त्वा) (आर्तवेभ्यः) ऋतुषु भवेभ्यः पदार्थेभ्यः (माद्भ्यः) मासेभ्यः (संवत्सरेभ्यः) वर्षेभ्यः (धात्रे) पोषकाय (विधात्रे) मेधाविने-निघ०३।१५ (समृधे) समर्धयित्रे। वर्धयित्रे (भूतस्य) प्राणिमात्रस्य (पतये) पालकाय (यजे) पूजयामि ॥

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