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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 47 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 47/ मन्त्र 1
    ऋषिः - गोपथः देवता - रात्रिः छन्दः - पथ्याबृहती सूक्तम् - रात्रि सूक्त
    284

    आ रा॑त्रि॒ पार्थि॑वं॒ रजः॑ पि॒तुर॑प्रायि॒ धाम॑भिः। दि॒वः सदां॑सि बृह॒ती वि ति॑ष्ठस॒ आ त्वे॒षं व॑र्तते॒ तमः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ। रा॒त्रि॒। पार्थि॑वम्। रजः॑। पि॒तुः। अ॒प्रा॒यि॒। धाम॑ऽभिः। दि॒वः। सदां॑सि। बृ॒ह॒ती। वि। ति॒ष्ठ॒से॒। आ। त्वे॒षम्। व॒र्त॒ते॒। तमः॑ ॥४७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ रात्रि पार्थिवं रजः पितुरप्रायि धामभिः। दिवः सदांसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। रात्रि। पार्थिवम्। रजः। पितुः। अप्रायि। धामऽभिः। दिवः। सदांसि। बृहती। वि। तिष्ठसे। आ। त्वेषम्। वर्तते। तमः ॥४७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 47; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    रात्रि में रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (रात्रि) हे रात्रि ! (पार्थिवम्) पृथिवी संबन्धी (रजः) लोक, (पितुः) पिता [मध्यलोक] के (धामभिः) स्थानों के साथ [अन्धकार से] (आ) सर्वथा (अप्रायि) भर गया है। (बृहती) बड़ी तू (दिवः) प्रकाश के (सदांसि) स्थानों को (वि तिष्ठसे) व्याप्त होती है, (त्वेषम्) चमकीला [ताराओंवाला] (तमः) अन्धकार (आ वर्तते) आकर घेरता है ॥१॥

    भावार्थ

    पृथिवी की गोलाई, और सूर्य के चारों और दैनिक घुमाव के कारण, पृथिवी का आधा भाग प्रत्येक समय सूर्य से आड़ में रहता है, अर्थात् प्रत्येक क्षण आधे भाग में अन्धकार और आधे में प्रकाश होता जाता है। अन्धकार समय को रात्रि कहते हैं। रात्रि में तारे और चन्द्र चमकते दीखते हैं। मनुष्य रात्रिसमय को यथावत् काम में लावें ॥१–॥

    टिप्पणी

    यह मन्त्र यजुर्वेद में है-३६।३२ और-निरुक्त ९।२९ में भी व्याख्यात है ॥ १−(आ) समन्तात् (रात्रि) हे रात्रि (पार्थिवम्) पृथिवीसम्बन्धि (रजः) लोकः (पितुः) पालकस्य। मध्यलोकस्य (अप्रायि) प्रा पूरणे-कर्मणि लुङ्। अपूरि (धामभिः) स्थानैः सह (दिवः) प्रकाशस्य (सदांसि) स्थानानि (बृहती) महती त्वम् (वितिष्ठसे) व्याप्नोषि (आ) समन्तात् (त्वेषम्) ताराभिर्दीप्यमानम् (वर्तते) विद्यते (तमः) अन्धकारः ॥

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    भाषार्थ

    (रात्रि) हे रात्रि! (पितुः) पितृभूत या पालक पर्जन्य के (धामभिः) स्थानों समेत, तू ने (पार्थिवं रजः) पृथिवीलोक को (अप्रायि) निज स्थिति से भर दिया है। (बृहती) बहुत फैलकर तू (दिवः) द्युलोक के (सदांसि) स्थानों में भी (वि तिष्ठसे) विविध खण्डों में स्थित होती है, जब कि (त्वेषं तमः) चमकता अन्धकार (आ वर्तते) रात्रि में आ जाता है।

    टिप्पणी

    [वैदिक वर्णन परमेश्वर कवि के काव्यरूप हैं। इसीलिए परमेश्वर को कवि (यजुः० ४०.८), और वेद को काव्य (अथर्व० १०.८.३२) कहा है। कविता की दृष्टि से रात्री का सम्बोधन हुआ है। समग्र सूक्त का वर्णन कवि सम्मत शैली का है। पितुः= अथर्ववेद में पर्जन्य को पिता कहा है यथा— “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु (१२.१.१२)। पितृभूत पर्जन्य के स्थान हैं, अन्तरिक्ष लोक। दिवः=रात्री में द्युलोक में नक्षत्र और तारागण चमकते हैं, और इनके मध्यान्तरालों में नील-नभ के खण्ड दृष्टिगोचर होते हैं। इन्हें “त्वेषंतमः” कहा है।]

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    विषय

    रात्रि अन्धकारमयी

    पदार्थ

    १. (रात्रि) = हे रात्रि! तुझसे यह (पार्थिवं रज:) = पृथिवी में होनेवाले गिरि, नदी, समुद्रादि प्रदेश, (पितु:) = अन्तरिक्षलोक के (धामभि:) = सब स्थानों के साथ (आ अप्रायि) = समन्तात् अन्धकार से भर दिया गया है, अर्थात् सब ओर अन्धकार-ही-अन्धकार है। २. (बृहती) = महती सर्वत्र व्यापी तू (दिवः सदासि) = द्युलोक के स्थान में भी (वितिष्ठसे) = विशेषकर स्थित होती है। उस द्युलोक में भी (आ) = चारों ओर (त्वेषम्) = तारों की दीप्तिवाला (तम:) = अन्धकार वर्तते है। रात्रि के समय चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार हो जाता है। धुलोक तारों से दीप्त है, परन्तु फिर भी है अन्धकार ही।

    भावार्थ

    रात्रि आती है और सब पार्थिव लोक अन्तरिक्ष के प्रदेशों के साथ अन्धकार से परिपूर्ण हो जाते है। तारों से चमकते हुए होने पर भी द्युलोक के प्रदेश अन्धकारमय ही होते |

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Ratri

    Meaning

    The great night comes and covers the regions of the earth and the firmament. Away from the regions of the sun, her progenitor, it stays and eclipses the areas of light, and the darkness remains until the light comes again with the morning.

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    Subject

    To Rátri (Night) : for protection

    Translation

    O night, the terrestrial space has been filled with the lights of the father (i.e., heaven). Mighty you spread forth upto the abodes of the sky. The glowful darkness pervades all around.

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    Translation

    The terrestrial realm has been filled with the Dhann, the twinklina stars of God who is father of all. This spreads ail the great worlds and places of heaven. The darkness full of night-lustre over-whelming all, is night.

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    Translation

    O night, terrestrial places along with places of the firmament have been with darkness of thine, that art well established in the vast regions of the heavens. The darkness, shining with light from stars, has engulfed everything.

    Footnote

    cf. Nirukta, 9.29.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह मन्त्र यजुर्वेद में है-३६।३२ और-निरुक्त ९।२९ में भी व्याख्यात है ॥ १−(आ) समन्तात् (रात्रि) हे रात्रि (पार्थिवम्) पृथिवीसम्बन्धि (रजः) लोकः (पितुः) पालकस्य। मध्यलोकस्य (अप्रायि) प्रा पूरणे-कर्मणि लुङ्। अपूरि (धामभिः) स्थानैः सह (दिवः) प्रकाशस्य (सदांसि) स्थानानि (बृहती) महती त्वम् (वितिष्ठसे) व्याप्नोषि (आ) समन्तात् (त्वेषम्) ताराभिर्दीप्यमानम् (वर्तते) विद्यते (तमः) अन्धकारः ॥

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