अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 52/ मन्त्र 4
कामे॑न मा॒ काम॒ आग॒न्हृद॑या॒द्धृद॑यं॒ परि॑। यद॒मीषा॑म॒दो मन॒स्तदैतूप॑ मामि॒ह ॥
स्वर सहित पद पाठकामे॑न। मा॒। कामः॑। आ। अ॒ग॒न्। हृद॑यात्। हृद॑यम्। परि॑। यत्। अ॒मीषा॑म्। अ॒दः। मनः॑। तत्। आ। ए॒तु॒। उप॑। माम्। इ॒ह ॥५२.४॥
स्वर रहित मन्त्र
कामेन मा काम आगन्हृदयाद्धृदयं परि। यदमीषामदो मनस्तदैतूप मामिह ॥
स्वर रहित पद पाठकामेन। मा। कामः। आ। अगन्। हृदयात्। हृदयम्। परि। यत्। अमीषाम्। अदः। मनः। तत्। आ। एतु। उप। माम्। इह ॥५२.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
काम की प्रशंसा का उपदेश।
पदार्थ
(कामेन) काम [कर्मफल इच्छा] के साथ (कामः) काम [आशा] (हृदयात्) [एक] हृदय से (हृदयं परि) [दूसरे] हृदय में होकर (मा) मुझको (आ अगन्) प्राप्त हुआ है। (अमीषाम्) इन [विद्वानों] का (यत्) जो (अदः) वह (मनः) मनन है, (तत्) वह (माम्) मुझको (इह) यहाँ (उप) आदर से (आ एतु) प्राप्त होवे ॥४॥
भावार्थ
मनुष्य विद्वानों से विद्याएँ प्राप्त करके दृढ़ आशाएँ करता हुआ उन्नति करता रहे ॥४॥
टिप्पणी
४−(कामेन) कर्मफलेच्छया सह (मा) माम् (कामः) अभिलाषः (आ अगन्) गमेर्लुङि च्लेर्लुकि मकारस्य नकारः। आगतवान् (हृदयात्) एकस्य अन्तःकरणात् (हृदयम्) द्वितीयस्य अन्तःकरणम् (परि) प्रति (यत्) (अमीषाम्) विदुषाम् (अदः) तत् (मनः) मननम् (तत्) (आ एतु) प्राप्नोतु (उप) आदरेण (माम्) (इह) अत्र ॥
भाषार्थ
(कामेन) मेरी सात्विक कामना द्वारा (मा) मुझे (कामः) काम्य अमृतत्व (आ अगन्) प्राप्त हो गया है। अर्थात् (हृदयात् परि) मेरी हार्दिक अभिलाषा से (हृदयम्) अभिलषित हार्दिक फल प्राप्त हो गया है। (अमीषाम्) अमृतत्व को प्राप्त इन योगिजनों का (यद्) जो (अदः) वह (मनः) सात्त्विक मन है, (तत्) वैसा मन (इह) इस जीवन में (माम्) मुझे (उप ऐतु) प्राप्त रहे।
टिप्पणी
[कामः=काम्यफल। यथा—“सर्वान् कामान् समश्नुते” (मनुस्मृति १.१२४)। काम=Object and desire (आप्टे)। तथा “कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठाम्” (कठोप० २.११।)]
विषय
प्रेम की पारस्परिकता
पदार्थ
१. (कामेन) = इच्छा से (काम:) = इच्छा (मा) = मुझे (आगन्) = प्राप्त हुई है। वह इच्छा जोकि (हृदयात्) = एक हृदय से (हृदयं परि) = दूसरे हृदय के प्रति हुआ करती है। दूसरा व्यक्ति मुझे चाहता है तो मैं भी उसे चाहनेवाला बनता है। उसकी कामना ने मुझमें भी कामना को पैदा किया है। वस्तुतः प्रेम पारस्परिक ही हुआ करता है। २. (यत्) = जो (अमीषाम्) = उनका-मुझसे दूर स्थित ज्ञानियों का (अदः मन:) = मुझ से दूर गया हुआ मन है (तत् माम् इह उप आ एतु) = वह मुझे यहाँ समीपता से प्राप्त हो। मैं ज्ञानियों का प्रिय बनें।
भावार्थ
प्रेम पारस्परिक हुआ करता है। मैं ज्ञानियों का प्रिय बनूं-मुझे ज्ञानी प्रिय हों।
विषय
‘काग’ परमेश्वर।
भावार्थ
(कामेन) उस कामनामय, संकल्पमय परमेश्वर के द्वारा ही (मा) मुझको भी (कामः) वह काम अर्थात् परस्पर की चाह (आगन्) प्राप्त होती है जो (हृदयात्) एकहृदय से (हृदयं परि) दूसरे हृदय के प्रति हुआ करती है। इसी प्रकार (अमीषाम्) मेरे प्रेमी जनों से अतिरिक्त अन्योजनों का (अदः मनः) मेरे से परे गया हुआ भी मन या अभिलाषा (तत्) वह (माम्) मुझे (इह) यहां (उप आएतु) प्राप्त हो।
टिप्पणी
कामेन मे काम आगाद्द्द्वयोहृदयाद् हृदयं मृत्योः। यदमीषामदः प्रियं तदैत् पमामभि।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्माऋषिः। मन्त्रोक्तः कामो देवता। कामसूक्तन्। १, २, ४ त्रिष्टुभः। चतुष्पदा उष्णिक्। ५ उपरिष्टाद् बृहती। पञ्चर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Kama
Meaning
By Kama, desire and effort, is Kama, hope and ambition, fulfilled, through Kama and dispensation of Divinity. It comes from the heart in response to the heart. May that mind, thought and meditative effort, which was those ancients’ since eternal time, come to me here and now and bless.
Translation
By desire, the desire has come to me, from hear to heart. Whatever be the mind of those yonder ones, may that come to me here.
Translation
This Kama comes to me through Kama, the desire. This passes through one heart to another hear. Whatever is this, mind of these learned ones may come to me here.
Translation
The desire has come to me from the Desire-Incarnate; the heart being attracted by the heart. Let the mind of these, (my relatives) that has gone astray, approach me again, or (let my enemies too be reconciled to me).
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(कामेन) कर्मफलेच्छया सह (मा) माम् (कामः) अभिलाषः (आ अगन्) गमेर्लुङि च्लेर्लुकि मकारस्य नकारः। आगतवान् (हृदयात्) एकस्य अन्तःकरणात् (हृदयम्) द्वितीयस्य अन्तःकरणम् (परि) प्रति (यत्) (अमीषाम्) विदुषाम् (अदः) तत् (मनः) मननम् (तत्) (आ एतु) प्राप्नोतु (उप) आदरेण (माम्) (इह) अत्र ॥
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