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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 54 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 54/ मन्त्र 5
    ऋषिः - भृगुः देवता - कालः छन्दः - त्र्यवसाना षट्पदा विराडष्टिः सूक्तम् - काल सूक्त
    85

    का॒लेऽयमङ्गि॑रा दे॒वोऽथ॑र्वा॒ चाधि॑ तिष्ठतः। इ॒मं च॑ लो॒कं प॑र॒मं च॑ लो॒कं पुण्यां॑श्च लो॒कान्विधृ॑तीश्च॒ पुण्याः॑। सर्वां॑ल्लो॒कान॑भि॒जित्य॒ ब्रह्म॑णा का॒लः स ई॑यते पर॒मो नु दे॒वः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    का॒ले। अ॒यम्। अङ्गि॑राः। दे॒वः। अथ॑र्वा। च॒। अधि॑। ति॒ष्ठ॒तः॒। इ॒मम्। च॒। लो॒कम्। प॒र॒मम्। च॒। लो॒कम्। पुण्या॑न्। च॒। लो॒कान्। विऽधृ॑तीः। च॒। पुण्याः॑। सर्वा॑न्। लो॒कान्। अ॒भि॒ऽजित्य॑। ब्रह्म॑णा। का॒लः। सः। ई॒य॒ते॒। प॒र॒मः। नु। दे॒वः ॥५४.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कालेऽयमङ्गिरा देवोऽथर्वा चाधि तिष्ठतः। इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान्विधृतीश्च पुण्याः। सर्वांल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    काले। अयम्। अङ्गिराः। देवः। अथर्वा। च। अधि। तिष्ठतः। इमम्। च। लोकम्। परमम्। च। लोकम्। पुण्यान्। च। लोकान्। विऽधृतीः। च। पुण्याः। सर्वान्। लोकान्। अभिऽजित्य। ब्रह्मणा। कालः। सः। ईयते। परमः। नु। देवः ॥५४.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 54; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    काल की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    (काले) काल [समय] में (अयम्) यह (अङ्गिराः) अङ्गिराः [ज्ञानवान्] (देवः) व्यवहारकुशल मनुष्य (च) और (अथर्वा) अङ्गिराः [निश्चलस्वभाव ऋषि] (अधि) अधिकारपूर्वक (तिष्ठतः) दोनों स्थित हैं। (इमम्) इस (लोकम्) लोक को (च च) और (परमम्) सबसे ऊँचे (लोकम्) लोक को (च) और (पुण्यान्) पुण्य (लोकान्) लोकों को (च) और (पुण्याः) पुण्य (विधृतीः) विविध धारणशक्तियों को [अर्थात्] (सर्वान्) सब (लोकान्) लोकों को (अभिजित्य) सर्वथा जीतकर, (ब्रह्मणा) ब्रह्म [परमेश्वर] के साथ, (सः) वह (परमः) सबसे बड़ा (देवः) दिव्य (कालः) काल (नु) शीघ्र (ईयते) चलता है ॥५॥

    भावार्थ

    काल के सादर निरन्तर सेवन से मनुष्य ज्ञानी ऋषि होकर और सब व्यवहारों और समाजों में प्रतिष्ठा पाकर परम गति प्राप्त कर आनन्द भोगते हैं ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(काले) (अयम्) (अङ्गिराः) अ० २।१२।४। अगि गतौ-असि, इरुडागमः। ज्ञानवान् पुरुषः (देवः) व्यवहारकुशलः (अथर्वा) अ० ४।१।७। अ+थर्व चरणे गतौ-वनिप्, वकारलोपः। निश्चलस्वभाव ऋषिः (च) (अधि) अधिकृत्य (तिष्ठतः) वर्तेते (इमम्) (च) (लोकम्) दृश्यमानं स्थानम् (परमम्) उत्कृष्टम् (च) (पुण्यान्) शुद्धान् शुभान् (च) (लोकान्) (विधृतीः) विविधधारिकाः शक्तीः (सर्वान्) (लोकान्) (अभिजित्य) अभिभूय (ब्रह्मणा) परमात्मना सह (कालः) (सः) प्रसिद्धः (ईयते) ईङ् गतौ-लट्। गच्छति (परमः) उत्कृष्टः (नु) शीघ्रम् (देवः) दिव्यः ॥

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    भाषार्थ

    (अयम्) यह (देवः) दिव्य (अङ्गिराः) अङ्गिरा, (च) और दिव्य (अथर्वा) अथर्वा (कालेऽधि) काल में (तिष्ठतः) स्थित हैं। (च इमं लोकम्) और इस लोक अर्थात् पृथिवी को, (च परमं लोकम्) तथा परमलोक अर्थात् द्युलोक को, (च पुण्यान् लोकान्) और पुण्यलोकों को, (च पुण्याः विधृतीः) तथा पुण्य धारक साधनों को, तथा (ब्रह्मणा) ब्रह्म के सहारे (सर्वान् लोकान्) सब लोकों को (अभिजित्य) जीत कर (सः कालः) वह काल (परमः देवः) परमदेव अर्थात् ब्रह्म के (नु) सदृश हुआ-हुआ (ईयते) विचरता है।

    टिप्पणी

    [देवः= इससे ज्ञात होता है कि अङ्गिरा और अथर्वा ऋषि कोटि के मनुष्य नहीं, अपितु ये सूर्य चन्द्र आदि की तरह देव हैं। अङ्गिराः=अग्नि और प्राणवायु। “तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य” (यजुः० ३.३)। द्वारा यज्ञियाग्नि को समिधाओं तथा घृत से बढ़ाने का विधान है। इस अग्नि को मन्त्र में “अङ्गिरः” कहा है, जोकि सम्बुध्यन्त पद है। अतः अङ्गिराः=पार्थिव अग्नि। तथा “अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः स्रु चश्चरन्त्यध्वरे” (अथर्व० २०.१०३.३) में अङ्गिरा को यज्ञ में घृताहुति देने का वर्णन है। अतः अङ्गिरा=पार्थिव अग्नि है। तथा अङ्गिराः=प्राण (शतपथ० ६.१.२.८) का भी नाम है। अथर्वा= सूर्य; क्योंकि सूर्य अपने स्थान में स्थित रहता है। अथर्वा= थर्वतिः चरतिकर्मा तत्प्रतिषेधः (निरु० ११.२.१९)। अर्थात् अथर्वा वह है, जो कि चलता नहीं, अपना स्थान नहीं बदलता। उपग्रहों समेत ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, परन्तु सूर्य सौरमण्डल में निज सापेक्षित स्थिति को नहीं बदलता। तथा “दिवि देवा अथर्वाणः” (अथर्व० ११.६.१३) द्वारा अथर्वा देवों की स्थिति द्युलोक में दर्शाई है। सम्भवतः इस मन्त्र में “अथर्वाणः” द्वारा अथर्वा-सूर्य की किरणें अभिप्रेत हों। इस मन्त्र में भी अथर्वाणः को देवाः कहा है, ऋषयः नहीं। इस प्रकार पृथिवीस्थ अग्नि, या अन्तरिक्षस्थ प्राणवायु, और द्युलोकस्थ सूर्य भी काल में ही स्थित हैं। ये नियत कालों में पैदा हुए, तथा नियत कालों तक स्थित रहेंगे। पुण्यान् लोकान्= यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह। तँल्लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना॥ (यजुः० २०.२५) अर्थात् जिस देश में ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवेत्ता वैदिक विद्वान्, तथा क्षत्र अर्थात् क्षतों से प्रजा का त्राण करने वाले क्षत्रिय, परस्पर प्रीतिपूर्वक साथ-साथ विचरते हैं, तथा जिस देश में प्रजा के विद्वान् तथा दिव्य प्रजाजन यज्ञियाग्नि के साथ और अग्रनेताओं के साथ ऐकमत्य में रहते है, उस देश को मैं “पुण्यलोक” जानता हूँ। विधृतीः पुण्याः=ऐसे पुण्यलोकों या पुण्यप्रदेशों का धारण करनेवाले हैं— मन्त्रोक्त उपाय। अर्थात् (१) ब्राह्मणों और क्षत्रियों का परस्पर प्रेमपूर्वक वर्ताव या व्यवहार; (२) तथा इनका परस्पर विचरना अर्थात् परस्पर सहयोग देना; (३) यज्ञों का करना; (४) राष्ट्रों के अग्रनेताओं के साथ ऐकमत्य में रहना। ये उपाय हैं स्वयं पुण्यरूप। ये उपाय हैं— “विधृतीः रूप” अर्थात् राष्ट्रों का विशेष रूप में धारण करनेवाले। इन दोनों काल सूक्तों में यह दर्शाया है कि जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय काल द्वारा नियन्त्रित है। परन्तु स्वयं काल परमेश्वराश्रित है, तथा परमेश्वर की सहायता द्वारा कार्यक्षम होता है।]

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    विषय

    अथर्वा तथा अङ्गिरा का अधिष्ठान वह 'काल'

    पदार्थ

    १. (अयम्) = यह (अङ्गिराः देव:) = अंग-अंग में उद्भूत रसवाला- पूर्ण स्वस्थ, देववृत्ति का पुरुष (च) = तथा (अथर्वा) = [अथ अर्वाङ् एनम् एतास्वेतासु अन्विच्छ। गो० ब्रा० १.१.४] ऊर्ध्वरेता बनकर प्रभु को अपने अन्दर ही देखनेवाला पुरुष (काले) = उस प्रभु में ही (अधितिष्ठत:) = अधिष्ठित होते हैं। २. (इमं च लोकम्) = इस कर्मों के अर्जनस्थानभूत भूमिलोक को, (परमं च लोकम्) = उस फलभोग स्थानभूत उत्कृष्ट स्वर्गलोक को, (पुण्यान् च लोकान) = और अन्य भी पुण्यकार्जित लोकों को, (पुण्याः च विकृती:) = दु:खलेश से असंस्पृष्ट पवित्र लोकों के धारक (सर्वान् लोकान्) = सभी लोकों को (ब्रह्मणा अभिजित्य) = ज्ञान से जीतकर-ज्ञान द्वारा इन लोकों का विजय कर लेने पर (सः कालः) = वह काल नामक प्रभु (ईयते) = जाना जाता है-पाया जाता है। (न) = निश्चय से (परम:देवः) = वह प्रभु ही सर्वोत्कृष्ट देव है।

    भावार्थ

    हम अंगिरा व अथर्वा बनकर प्रभु में स्थित हों। ज्ञान द्वारा सब लोकों का विजय कर लेने पर ही प्रभु की प्राप्ति होती है।

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    विषय

    कालरूप परमशक्ति।

    भावार्थ

    (काले) उस कालरूप परमेश्वर पर (अयम्) यह (अंगिराः) प्रकाशमान (देवः) देव, सूर्य और (अथर्वा च) अथर्वा वायु (अधितिष्ठतः) आश्रित हैं। (कालः) वह सर्वज्ञ, सबका प्रेरक, परमेश्वर (ब्रह्मणा) अपने महान् सामर्थ्य से (इमं लोकं च) इस लोक को (परमं च लोकं च) और उस दूर स्थित उच्च लोक को और (पुण्यान् लोकान् च) समस्त पुण्य लोकों को, समस्त (पुण्याः विधृतीः) पुण्य मर्यादाओं को और (सर्वान् लोकान् अभिजित्य) समस्त लोकों का विजय करके वह (परमः) परम सर्वोच्च (देवः नु) देव (सः) वही (ईयते) जाना जाता है।

    टिप्पणी

    (च०) ‘विधृतीश्च’ इति क्वचित्।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुर्ऋषिः। कालो देवता। २ त्रिपदा गायत्री। ५ त्र्यवसाना षट्पदा विराड् अष्टिः। शेषा अनुष्टुभः। पञ्चर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Kala

    Meaning

    This divine Angira, dynamic fire and pranic energy, and Atharva, constant energy, and this divine sun with its rays, abide in Kala. This earthly region, the highest heavenly region, all auspicious regions, all noble and divine sustainers, indeed all regions of the universe in existence, all these, Kala, having won and held in power by the Supreme Spirit of Brahma, lives on, the ultimate force, refulgent and divine (even when chronogical time and all else is absorbed and still).

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    Translation

    In Time this divine brilliant (Angiras), and this unflinching (Atharvan) stand fast. Conquering this world, and the highest world, and the holy worlds and holy midspaces, and all the worlds by the sacred knowledge, that Time is approached as the highest Lord.

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    Translation

    This Deva Angirah, refulgent fire rests in Kala and Atharva, the air rests on Kala. This very mysterious Kala with the power of Supreme Being conquering, this world, yonder vast space, the pure worlds and the pure regions and all the other worlds moves and flows.

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    Translation

    In the Omnipresent, rest this shining sun and the air. The Omnipotent is known to be the most potent of all; as He stays, conquering, by His Great might, this world, the other world on high, the righteous states and regulations and all the worlds or situations.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(काले) (अयम्) (अङ्गिराः) अ० २।१२।४। अगि गतौ-असि, इरुडागमः। ज्ञानवान् पुरुषः (देवः) व्यवहारकुशलः (अथर्वा) अ० ४।१।७। अ+थर्व चरणे गतौ-वनिप्, वकारलोपः। निश्चलस्वभाव ऋषिः (च) (अधि) अधिकृत्य (तिष्ठतः) वर्तेते (इमम्) (च) (लोकम्) दृश्यमानं स्थानम् (परमम्) उत्कृष्टम् (च) (पुण्यान्) शुद्धान् शुभान् (च) (लोकान्) (विधृतीः) विविधधारिकाः शक्तीः (सर्वान्) (लोकान्) (अभिजित्य) अभिभूय (ब्रह्मणा) परमात्मना सह (कालः) (सः) प्रसिद्धः (ईयते) ईङ् गतौ-लट्। गच्छति (परमः) उत्कृष्टः (नु) शीघ्रम् (देवः) दिव्यः ॥

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