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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 56 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 56/ मन्त्र 6
    ऋषिः - यमः देवता - दुःष्वप्ननाशनम् छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - दुःस्वप्नानाशन सूक्त
    55

    वि॒द्म ते॒ सर्वाः॑ परि॒जाः पु॒रस्ता॑द्वि॒द्म स्व॑प्न॒यो अ॑धि॒पा इ॒हा ते॑। य॑श॒स्विनो॑ नो॒ यश॑से॒ह पा॑ह्या॒राद्द्वि॒षेभि॒रप॑ याहि दू॒रम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वि॒द्म। ते॒। सर्वाः॑। प॒रि॒ऽजाः। पु॒रस्ता॑त्। वि॒द्म। स्व॒प्न॒। यः। अ॒धि॒ऽपाः। इ॒ह। ते॒। य॒श॒स्विनः॑। नः॒। यश॑सा। इ॒ह। पा॒हि॒। आ॒रात्। द्वि॒षेभिः॑। अप॑। या॒हि॒। दू॒रम् ॥५६६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विद्म ते सर्वाः परिजाः पुरस्ताद्विद्म स्वप्नयो अधिपा इहा ते। यशस्विनो नो यशसेह पाह्याराद्द्विषेभिरप याहि दूरम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विद्म। ते। सर्वाः। परिऽजाः। पुरस्तात्। विद्म। स्वप्न। यः। अधिऽपाः। इह। ते। यशस्विनः। नः। यशसा। इह। पाहि। आरात्। द्विषेभिः। अप। याहि। दूरम् ॥५६६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 56; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    निद्रा त्याग का उपदेश।

    पदार्थ

    (स्वप्न) हे स्वप्न ! (पुरस्तात्) सामने [रहनेवाले] (ते) तेरे (सर्वाः) सब (परिजाः) परिवारों [काम, क्रोध, लोभ आदि] को (विद्म) हम जानते हैं, और [उस परमेश्वर को] (विद्म) हम जानते हैं (यः) जो (इह) यहाँ पर (ते) तेरा (अधिपाः) बड़ा राजा है। (यशस्विनः नः) हम यशस्वियों को (यशसा) धन [वा कीर्ति] के साथ (इह) यहाँ पर (पाहि) पाल (द्विषेभिः) वैर भावों के साथ (आरात्) दूर (दूरम्) दूर (अप याहि) तू चला जा ॥६॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि स्वप्न वा आलस्य के कारण अर्थात् काम क्रोध आदि को त्याग कर परमेश्वर के आश्रय से यशस्वी होकर अपनी सम्पत्ति और कीर्ति को बनाये रक्खें, और कभी परस्पर द्वेष न करें ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(विद्म) जानीम (ते) तव (सर्वाः) (परिजाः) जनसनखनक्रम०। पा० ३।२।६७। परि+जनी प्रादुर्भावे-विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। वा० ६।४।४१। अनुनासिस्य आकारः। परिजनान्। कामक्रोधलोभादीन् (पुरस्तात्) अग्रे वर्तमानाः (विद्म) (स्वप्न) (यः) (अधिपाः) स्वामी। परमेश्वर इत्यर्थः (इह) अत्र (ते) तव (यशस्विनः) कीर्तियुक्तान् (नः) अस्मान् (यशसा) धनेन। कीर्त्या (इह) (पाहि) रक्ष (आरात्) दूरे (द्विषेभिः) द्वेषैः (अप याहि) अपगच्छ (दूरम्) ॥

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    भाषार्थ

    (पुरस्तात्) पहिले से (ते) तेरे (सर्वाः) सब (परिजाः) परिजनों अर्थात् परिवारों को (विद्म) हम जानते हैं। (स्वप्न) हे स्वप्न! (विद्म) हम जानते हैं उसे, (यः) जो कि (इह) इस जीवन में (ते) तेरा (अधिपाः) पालक है। (नः) हम (यशस्विनः) यशवालों को (यशसा) यश के साथ (इह) इस जीवन में (पाहि) सुरक्षित कर। (द्विषेभिः) द्वेष और द्वेषजन्य भावनाओं समेत तू (आरात्) हमारे समीप से (दूरम्) हम से दूर (अप याहि) चला जा।

    टिप्पणी

    [परिजाः= स्वप्न में जो अवाञ्छित घटनाएँ होती रहती हैं, वे स्वप्न के परिवार हैं। स्वप्न का अधिपा अर्थात् पालक है— रजोगुण और तमोगुण। स्वप्न में जो द्वेषवृत्तियां जागरित हो जाती हैं, उन समेत स्वप्न को दूर भगाने का वर्णन मन्त्र में है। स्वप्नों से रहित होने के लिए दृढ़संकल्प, रागद्वेष से शून्य, तथा निरालस होना चाहिए। मन्त्र में दुःस्वप्न का वर्णन है।]

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    विषय

    द्वेष आदि के स्वप्नों से दूर

    पदार्थ

    १. हे (स्वप्न) = स्वप्न! हम (ते) = तेरे (पुरस्तात् सर्वाः परिजा:) = पुरस्ताद्गामी सब परिजनों को [काम, क्रोध, लोभ को] (विद्म) = जानते हैं। तू इन काम-क्रोध आदि के कारण ही उत्पन्न होता है। हे स्वप्न ! (इह) = यहाँ (यः) = जो (ते) = तेरा (अधिपा:) = स्वामी है-जिसके कारण तू अभिभूत रहता है-दबा रहता है, किसी प्रकार का अशुभ नहीं कर पाता, उसे भी (विद्म) = जानते हैं। प्रभु ही वे अधिपा हैं। प्रभु-स्मरण करने पर अनिष्टकर स्वप्न आते ही नहीं। २. (यशस्विनः) = यशस्वी कर्मों के कारण यश को प्राप्त करनेवाले (न:) = हम लोगों को इह-इस जीवन में (यशसा) = यश से (आरात्) = प्रभु के समीप में (पाहि) = सुरक्षित कर। हम कभी अशुभ स्वप्न न देखें। हे स्वप्न ! (द्विषेभिः) = सब द्वेष की वृत्तियों के साथ तू हमसे (दूरम् अपयाहि) = सुदूर देश में चला जा। हमें द्वेष आदि के स्वप्न न आते रहें।

    भावार्थ

    काम-क्रोध आदि से दूर होकर हम अशुभ स्वप्नों से बचें। यशस्वी कर्मों को करते हुए यशवाले स्वप्नों को ही देखें। हम कभी स्वप्न में द्वेष आदि दुर्भावों से पीड़ित न हों।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Svapna

    Meaning

    We know in advance all your sources and all your attendants and off-shoots, and we know who is your protector and who is your controller here in this human state. Protect and promote those of us with honour and fame who are honourable and famous, and if there be any jealous adversaries and enemies with you, go far away along with them.

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    Translation

    We know all your attendant that go before you; we know, O dream, who is your overlord here. May you protect us, the glorious ones, with glory here: go far away along with the malicious ones.

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    Translation

    This sleep is that whose dire consequences reap the men doing evils and without sleep the men of good act attain good life. This sleep overcomes the tired and weary mind and with its fettering power drawses the cognitive activity.

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    Translation

    O sleepiness, we already know the evils, born of thee and also him who is your controller here. Letest thee protect us, the meritorious with renown in this world, even from a distance. Go away to a great distance along with thy evil effects.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(विद्म) जानीम (ते) तव (सर्वाः) (परिजाः) जनसनखनक्रम०। पा० ३।२।६७। परि+जनी प्रादुर्भावे-विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। वा० ६।४।४१। अनुनासिस्य आकारः। परिजनान्। कामक्रोधलोभादीन् (पुरस्तात्) अग्रे वर्तमानाः (विद्म) (स्वप्न) (यः) (अधिपाः) स्वामी। परमेश्वर इत्यर्थः (इह) अत्र (ते) तव (यशस्विनः) कीर्तियुक्तान् (नः) अस्मान् (यशसा) धनेन। कीर्त्या (इह) (पाहि) रक्ष (आरात्) दूरे (द्विषेभिः) द्वेषैः (अप याहि) अपगच्छ (दूरम्) ॥

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